Monday, 11 November 2024

पीरा बइठे कथरी ओढ़े .... काबर ?

 पीरा बइठे कथरी ओढ़े ....

       काबर ?

सिर पर धूप आंख में सपने ...

     7 नवम्बर 1947 बने जग जग ले सुरुज उये रहिस होही तभे तो गुजराती , गांधीवादी विचार धारा ल मनइया  परिवार मं बाबू लइका के जनम होइस , दू झन बहिनी के बाद भाई आइस त महतारी बाप हुलस के नांव धरिन मुकुंद लाल सोनी ....। ओ समय दुर्ग साहित्यिक केंद्र रहिस त मुकुंद बाबू कविता लिखे लगिन ...धीरे बाने कवि सम्मेलन के मंच संचालन त काव्य पाठ करे लगिन ...। उन हिंदी , छत्तीसगढ़ी , उर्दू , गुजराती चारों भाषा मं लिखयं । मोती असन अक्षर , ड्राइंग , पेंटिंग घलाय करे लगिन । 

     छत्तीसगढ़ी ग़ज़ल ल जन जन तक पहुंचाए के श्रेय मुकुंद कौशल ल हे । तभो गीत , ग़ज़ल , कविता , कहानी , निबंध , समीक्षा असन विधा मन घलाय उंकर लेखनी के सिंगार करे हें । हिंदी अउ छत्तीसगढ़ी के बारह ठन काव्य संग्रह प्रकाशित हे । आकाशवाणी , दूरदर्शन के सम्मानित साहित्यकार रहिन । 

    आज उंकर ग़ज़ल के सुरता बहुत आवत हे । ग़ज़ल जेला महफ़िल के शान कहे जाथे ओमा व्यंग के धार तिलमिलवा देथे ....बानगी देखव 

            " सरकारी दफ्तर मं गांधी के फोटू , 

               सूरा के मुंह मा जस लीम के मुखारी । " 

कलम के धार देखे लाइक हे । ओइसे भी बहुत सहज गोठ ल भी उंकर कलम बड़ ऊंचाई मं पहुंचा देथे । ग़ज़ल के तकनीकी खूबी तो सराहे लाइक हे त चिरचरित प्रेम प्रसंग ले दुरिहा आम आदमी के जिनगी के दुख पीरा , संसो रिस सबो ल ग़ज़ल के रुप मं लिखना मुकुंद के ही कौशल आय । 

     " अब तक गाएन खूब ददरिया अउ करमा 

       अब हमन ला आल्हा गाए बर परही । " 

                नवा उपमा , उपमान खोज के पाठक तीर मढ़ा देथें मुकुंद कौशल ....देखव न ?

" सावन भादों कस बरसत हे दुख पीरा 

 हम हिम्मत के खुमरी पहिरे रेंगत हन ..। " 

       समाज के हर रंग मं रिगबिग ले ग़ज़ल ल रंग देहे के कौशल मुकुंद के कलम तीर रहिस हे । मूलतः  उन प्रेम के कवि रहिन ...तभो राजनीति के धूप , छांव , अंधियारी , उजियारी ल बनेच लिखे हें ...। 

 " अब तो तोरे घर अंगना हर 

  मोरे घर जइसे लगथे । " 

      एहर आय प्रेम मं तोर मोर के भेद के मेटा जाना । 

थोरकिन हिंदी के अंगना डहर चलिन का जी ....हाथ छानी देवत हें मुकुंद लाल सोनी ....

" स्नेह संचारित हुआ स्वर की शिराओं में , 

        आज फिर उसने अधर पर बांसुरी रख दी । " 

  " बिन कहे सब कह दिया निःशब्द हो उसने 

    और चुपके से कनक पर कांकरी रख दी । " 

           मुकुंद कौशल की जन्मतिथि हे आज का करवं अब तो जीवेत् शरद: शतम् , जुग जुग जियव बड़े भाई नइ कहि सकंव न ? 

उन तो हांथ मं धरा देहे हें किताब " पीरा बइठे कथरी ओढ़े " लालटेन घलाय तो बुता गेहे । 

सुरता तो कोकरो कहे ल सुनय नहीं , हरके बरजे ल मानय नहीं त काय करवं ....हाथ जोड़ के मूड़ नवाये के सिवाय ..🙏

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