Saturday, 24 January 2026

छत्तीसगढ़ी व्यंग्य मुसुवा के इंटरव्यू

 छत्तीसगढ़ी व्यंग्य

 मुसुवा के इंटरव्यू

वीरेन्द्र सरल

राजधानी के तीर राष्ट्रीय राज मार्ग म मुसुवा मन ल दल के दल आवत देख के मय बक खा गेंव। गुने लगेंव मुसुवा मन बर कोन्हों परिवार नियोजन कार्यक्रम चले रहितिस तब इंखर संख्या अतेक नई बाढ़े रहितिस। पूरा राजमार्ग म कब्जा कर डारे हे बिया मन। हो सकथे कहूँ मेर मुसुवा मेला लगे होही । नहीं ते कहूँ मेर इंखर राष्ट्रीय सम्मेलन होवत होही तिहां जावत होही बपरा मन फेर उंखर चाल-ढाल म अइसन कोई उत्साह नई दिखत रिहिस। थोथना ल ओथारे लरघाय असन रेंगत रिहिन बिचारा मन। कोरोना काल म जउन पीड़ा शहर ले गांव लहुटत प्रवासी मजदूर मन के शकल म दिखत रिहिस उही पीड़ा अभी मुसुवा मन के शकल म दिखत रिहिस। थोड़किन अउ ध्यान से देखेंव तब का देखथंव सब मुसुवा मन के माथ म टीका लगे हावे। मोर भीतरी के पत्रकार जाग गे। मन होइस एकाध झन मुसुवा संग गोठ-बात करके सच ल जाने के कोशिश करंव।

  बने मोठ-डांट मुसुवा ल ज उन ल उंखर संगवारी मन घुस मुसुवा साहब कहत रिहिन उही ल राम रमुआ करके माइक धरे-धरे महुँ ओखर पाछु-पाछु रेंगत पूछेंव- मुसुवा साहब नमस्कार! सबले पहली हमर चैनल म आपके बहुत -बहुत स्वागत हे। आप अतेक झन एकेच संग कहाँ ले आवत हव अउ कहाँ ले जावत हव? अउ तुंहर माथ म ये टीका कोन लगाय हावे? का कहूँ मेर आप मन के स्वागत सत्कार होय हे?

 घुस मुसुवा अपन पीड़ा ल पियत किहिस - हमन कवर्धा ले आवत हन भैया। हमर मन ऊपर आरोप लगे हे कि हमन सात करोड़ के बाइस हजार किवंटल धान ल सफाचट कर दे हन। हमर माथ के ये टीका कलंक के टीका आय अभी अउ सुनई आय हे कि बागबाहरा म घला हमर गोटियार सगा मन ऊपर पांच करोड़ के धान ल खाय के आरोप लगे हे। जब ले ये कलंक के टीका माथ म लगे हे, हमर मन के सामाजिक बहिष्कार होगे हे। समाज म हमर इज्जत दु कौड़ी के नई रहिगे हे। समाज ल तो छोड़ घर म घला हमर मुसुवाईन मन रात दिन गारी-बखाना देवत हे। बिला के मेन गेट ल बन्द करके भीतरी ले मोर मुसुवाईन मोला घेरी -बेरी आई हेट यू अउ डोंट टच मी कहत हे। समाज म सब झन पहिली घुस मुसुवा कहिके सम्मान करय तेमन अब घूसखोर मुसुवा कहिके अपमान करत हे। हमन मुसुवा अन ददा, घूसखोर मनखे या कोन्हों बाबू, साहब , नेता या मंत्री नोहन जउन अतेक अपमान ल सही सकन। मन होथे मुसुवा दवई खा के आत्महत्या कर लेवन फेर संगवारी मन किहिन कि कलंक के टीका लगाय-लगाय मरबो तब तो नरक म घला ठउर नई मिलही तेखर ले  सात करोड़ के धान खवैय्या मुसुवा मन के पकड़ात ले हमन ल लड़ना पड़ही। हमर पेट ल देख के तुही मन अंदाज लगाव कि का अतेक धान ल खा के हमन पचा पाबो? बदहजमी म मर जबो ददा बदहजमी म। हमर पेट अउ मुँहूं के साइज ल देख के तो आरोप लगातिस बेईमान मन। हमन मनखे नोहन ददा कि पशुचारा, कोयला, गिट्टी, सीमेंट, रेती, लोहा लक्खर सब ल पचो लेन। हमर हालत तो अभी अइसे होगे हे कि हमरे बियाय  लइका मन घूसखोर पापा, घूसखोर पापा कहिथे चिढ़ावत हे। धिक्कार हे अइसन जिनगी ल। फेर वाह रे मनखे। अचरज लागथे घूस खाने वाला, घोटाला करने वाला, दूसर के हक छिनने वाला मनखे मन कतेक कूटहा अउ निशरमा होही जउन मन ल एकोकनी बात-बानी नई लागे। हमन अपन माथ के कलंक ल धोय बर राजधानी म धरना-प्रदर्शन करे बर जावत हन। ओती बागबाहरा वाला संगवारी मन घला संघरही तहन सबो झन मिलके धरना-प्रदर्शन करके सात करोड़ अउ पांच करोड़ के धान खवैय्या मुसुवा मन ल पकड़े के मांग करबो। बस धरना -प्रदर्शन करे के जगह ल बता देतेव तब बड़ा किरपा होतिस।

 घुस मुसुवा के बात ल सुनके मोर मुँहू बन्द होगे। नाव भले घुस मुसुवा हे फेर घूस ल कभू मुहुँ नई लगाय हे अउ येती कई झन अइसे मनखे हे जिंखर गजब सुंदर-सुंदर नाव हे फेर बिना घूस खाय टस ले मस नई होवय।

 मय कलेचुप ओ मेर ले रेंगे लगेंव तब घुस मुसुवा किहिस- " देख भैया। आजकाल पत्रकार भैया मन घला सही बात ल छापे म डर्राय ल धर ले हे। पत्रकारिता ल लोकतंत्र के चौथा स्तम्भ माने गे हे। जब तक दूध के दूध अउ पानी के पानी नई हो जही । कार वाला, फाइल वाला सात करोड़ी मुसुवा मन पकड़े नई जाही तब तक आप हमर पीड़ा ल जनता-जनार्दन ल बतावत रहू तभे तुंहर पत्रकारिता ह सार्थक होही।


वीरेन्द्र सरल

मुसवा"

 " मुसवा"

       हमर गांव के कोतवाल हर हांका पारत राहय,सुनो सुनो  मुसवा ले सावधान रहू हो---!मे दंग रहिगेंव अइसन काय बात (गोठ)होगे जेन कोतवाल ल मुनादी करे ल पड़त हे। में पूछेंव कोतवाल ल काय होगे भईया? कोतवाल बताइस मुसवा करोड़ो के धान ल खागे।अऊ कहूं जगा हमला कर सकत हे।दवा ल गोला बारूद कस छोंड़त हे तीहां ले ऊंकर कुछू उद (कुछ नई होवत हे)नी जलत हे।जइसे अमर होके आय हे। हां एकात कनिक मन ल कुछ असर हो सकत हे।जइसे करमचारी मन निलंबन के पाछू बहाल हो जथे।

              पहिली के सियान मन काहय मुसवा के खाय ले कोठी के धान नी सिराय।फेर करोड़ो के धान ल कईसे खाईस होही। हां हो सकत हे ये मार्डन मुसवा होही। इक्कीसवीं सदी के। न खाऊंगा न खाने दूंगा सुने रेहेन फेर कईसे खाईस होही ये गुने के बात आय।हो सकत हे मन के बात ल मुसवा मन सुने नई रिहिस होही।यहू बात हो सकत हे ये मन जमगरहा संरक्षण (विशेष कृपा) वाले बड़े मुसवा मन होही।वो तो भला करे भगवान ये बात सिरिफ हमन ह (जनता)जानत हन। नही ते सरकार ल पता चल जही ते गुरुजी मन के सामत आ जही। गुरुजी मन के पोटा घला कांपत होही कहीं उन मन ल मुसवा पकड़े,गिने बर झिन लगा दिही। एक तो कुकुर मनखे (sir)मन ले ले देके निपटे हे। सरकार ह एक बात के बड़ मजा उड़ाथे जनता दरवाहा, मास्टर मन चरवाहा।

         सिरतोन कहिबे त मुसवा मन बड़ हुंसियार हो गेहे। पहिली कपड़ा लत्ता ल कुतरे अब बड़े बड़े डराम ल कुतर देथे।जईसे लाईट केमरा एक्सन। मुसवा अऊ बिलई के गोठ करबे त पक्ष अऊ विपक्ष कस लागथे। मुसवा हर कुटुर- कुटुर खाथे अऊ बिलई माऊ माऊ नरियाथे।बिलई नरियाथे तभे पता चलथे मुसवा कदे कर हे।अऊ नरियाही काबर नही ये हर ऊंकर जनम सिद्ध अधिकार आय।

करोड़ो के घोटाला म मिले हे बेल,

चंदवा हर लगावत हे

चंपा के तेल।

   कहिथे पहिली तेल निकाले के कला तेली मनकर राहय।अब ये कला सरकार के पेटेंट हो गेहे। चाहे सरकार कखरो राहय जनता के तेल निकना तय हे।

     फेर सब बात के एक बात इही आय जब मुसवा भारी भरकम लम्बोदर ल उठा सकत हे त करोड़ो के धान ल घलो खा सकत हे।नानकून लड्डू के भोग लगाय ले जिनगी नी पहाय। नही ते बीता भर पेट बर मनखे मन अतिक हाय -हाय काबर करतिस।

     फकीर प्रसाद   

      साहू  फक्कड़

         सुरगी

तिसरइया चूल्हा

 तिसरइया चूल्हा

----------------

रामसिंग के बेवा राम्हिन हा गाँव के सरपंच, पटइल, पंच अउ सियान मन ला बलाये हे। जम्मों झन सकलाके अँगना मा बइठे हें।

सरपंच हा पूछिस-- का बात ये रामहिन। सियान मन ला कइसे बलाये हस वो?

" का बताववँ ददा---तुमन तो जानते हव। मोर दूनों बेटा-बहू मन इही घर मा अलग-बिलग रहिथें--दूनों के चूल्हा अलग-अलग जलथे।खेती-खार ला तको आधा -आधा बाँट डरे हें।वो मन तो अपन मा मस्त हे। मोरे बारा हाल होगे हे--रामहिन कहिस।

"तोला भला का बात के दुख होगे तेमा वो? तोर बेटा मन अलग बिलग होइन तेनो दिन सकलाये रहेन। बात अइसे होये रहिस के-तोर खाना पीना एक महिना बड़े घर ता एक महिना छोटे घर होही। तोर सेवा सटका, सूजी पानी ला दूनों झन करहीं। ये बात मा कोनो फरक परगे हे का?--पटइल हा पूछिस।

"हव सियान ददा। दू-चार महिना हा बने बने चलिच तहाँ ले-- मोर बर साग हे ता भात नइये, भात हे साग नइये। कभू कभू तो दिन भर लाँघन तको रहे ला पर जथे।"

"अच्छा ये समस्या हे। कइसे जी  तुंहर का कहना हे? सरपंच हा वोकर बेटा मन ला पूछिस।

"नहीं सरपंच साहब --अइसे बात नइये।दाई हा गलत बोलत हे"--बड़े बेटा हा बोलिस।

छोटे हा तो सीधा-सीधा कहि दिच के दाई हा कोरा झूठ बोलत हे।

"मैं झूठ काबर बोलहूँ सियान हो। अब मैं इंकर सो नइ रहे सकवँ। मोर कोनो आने बेवस्ता बना देतेव"--रामहिन हाथ जोर के कहिच।

वोकर अरजी ला सुनके सियान मन आपस मा बिचार करके सरपंच ला फइसला सुनाये ला कहिन।

"सुन ओ रामहिन अइसे करबे। तोर नाम मा जेन छै-सात एकड़ खेत हे तेला अपन जियत ले अधिया-रेगहा देके अपन खर्चा चलाबे।नहीं ते बेंच बेंच के जीबे अउ तोर दूनों बेटा मन ये घर मा रइहीं तेकर सेती एकक हजार रुपिया हर महिना देहीं। नइ देना रइही ता कहूँ राहयँ। ये घर हा तोर ये। तैं अपन चूल्हा अलग जला ले। ठीक हे ना वो रामहिन"--सरपंच हा कहिस।

"हव सियान ददा मोला मंजूर हे"--रामहिन कहिस।

" नहीं भई। तिसरइया चूल्हा काबर जलही। मैं दाई ला अपन संग पोगरी राखहूँ। कोनो शिकायत के मौका नइ आवन देववँ "--बड़े बेटा हा हाथ जोर के कहिच।

"वाह अइसे कइसे होही।दाई ला अपन संग महूँ राख सकथवँ। नहीं ते सबे कोई एके  मा रहिबो"--छोटे बेटा हा कहिच।

बिन सेवा के मेवा बर बेटा मन के  लालच ला देखके सरपंच संग जम्मों सियान मन के अंतस मा गुस्सा संग दुख भरगे।


चोवा राम वर्मा 'बादल '

प्राईम टाईम में मुसवा* (व्यंग्य)

 *प्राईम टाईम में मुसवा* (व्यंग्य)


रतिहा 8 ले 9 बजे के बेरा हा समाचार चैनल वाले मन बर अभीजित मुहुर्त ले ओपार शुभ होथे।इही बेरा मा मनखे जें खाके अलथत कलथत डकार मारत देश दुनिया के खबर लेयबर समाचार देखथे।

आधा किलो पाउडर अउ सौ ग्राम लिपिस्टिक पोते समाचार वाचिका निकलथे अउ देश नीते राज्य के महत्वपूर्ण मुद्दा ऊपर पंचइती करथे।हांव हांव करत पक्ष विपक्ष के मनखे मन स्टूडियो में कुकुर ले ओपार एक दूसर ऊपर गुर्रावत रथे। हालांकि कैमरा के पाछू मा दूनों झन एके प्लेट में बिरयानी जमावत रथे।ये अलग बात आय।

जनता जनार्दन इही मा खुश रहिथे अउ चैनल वाले मन धकाधक विज्ञापन पाके नोट छापत रथे।

आज के प्राईम टाईम कार्यक्रम में मुसवा ला आमंत्रित करे गे रिहिस।काबर कि मुसवा घलो अब करोड़ों के धान खाने वाले हस्ती के रुप में देश दुनिया में प्रसिद्ध होवत हे।तइहा के बात ला बइहा लेगे।जब मुसवा ला नानुक जीव समझे जाए अउ उंकर हिनमान कराए के नीयत ले ही ये हाना बनाए रिहिन होही-बडे़ बड़े के चलती नहीं तिहां मुसवा के मनतरपी।

मुसवा घलो अब बड़े बड़े कारनामा ला अंजाम देय मा सक्षम हे।

टीवी में मुसवा ला आमंत्रित करके भारी स्वागत करे गिस ताहने समाचार वाचिका पूछिस-मिस्टर माऊस का ये बात सही हरे कि तुमन छत्तीसगढ़ राज्य में मनमाने करोड़ों के धान खा डरेव? 

मुसवा किथे-तोर डाई करे चूंदी वाले मुड़ मा हाथ रखके कसम खावत हों बहिनी ए बात पूरा सोला आना लबारी आय।हमर नोहरहा के दूठन दांत अउ नानुक पेट मा अतेक ताकत नीहे जे हजारों बोरा धान ला पचा सके।

समाचार वाचिका-त समाचार मन मा जे खबर देखाए जावत हे वो थोरे लबारी हरे।

मुसवा-समाचार मा जेन बताए जावत हे वो पूरा मुसवा समाज ला बदनाम करे के साजिश हरे।हमर सात पुरखा में कभू अइसन‌ नी होय हे।

समाचार वाचिका-ए पहिली मामला नोहय।तुंहर ऊपर पहिली भी आरोप लगे हे कि तुमन मालथाना में जब्ती करे गे दारु अउ गांजा तक ला नी छोड़व।

मुसवा-हमर जनम तो बदनाम होय बर होथे वो दीदी।एक दू झन मुसवा मन शौकीन होथे त एकात केस होगे होही।हम इंकार नी करन।बाकी हमर डोज कतेक होही तेला पब्लिक ला हमर देंहे पांव के साईज ला देख के समझना चाहिए।

समाचार वाचिका-मने तुंहर कहिना हे कि तुंहर नाम के आड़ मा कांड दूसर मन करथे।

मुसवा-हम हमर नानुक मुंह में कइसे काहन भई!! बाकी जौन हे तौन ला तो पूरा संसार जानत हे।

समाचार वाचिका-तुंहर मन के मारे अभी तक घर के माइलोगन मन हलाकान रिहिन अब सरकार तको तुंहर डर में कांपत हे।एकर बारे मा का कहिना हे।

मुसवा-घर के दार चाउंर, रोटी पीठा, खेत खार के अन्न खाए के अधिकार हमन ला भगवान देय हावे।ता ईमानदारी से हमन अपन अधिकार के उपयोग करथन।हमर खवाई अतेक कम रथे कि तइहा के सियान मन केहे रिहिन-मुसवा के खाए ले कोठी के धान नी सिराय।फेर ए दारी अइसे टाईप इल्जाम हमर समाज ऊपर लगे हे कि हमन पब्लिक ला चेहरा नी देखा सकत हन।

समाचार वाचिका-मने तुमन अपन अपराध ला स्वीकार नी करौ।

मुसवा-जेन अपराध ला हमर बिरादरी करे के लाइक नीहे तेला हमन कइसे स्वीकार कर लेबो।हमर पेट के साईज देख के साहेब मन ला इल्जाम लगाना चाहिए।बिधाता घलो भोरहा में पर गेहे काते?मुसवा जोनी के मनखे ला मानुष तन दे देहे।जेमन जब देख तब खाए बर तियार रहिथे।

समाचार वाचिका-त अवइय्या बेरा मा तुंहर समाज के का रणनीति रही ये मुद्दा ऊपर? 

मुसवा-हमर का रणनीति रही दीदी। सरकार ले सीबीआई जांच के अपील करबो अउ लंबोदर भगवान ले भी निवेदन करबो कि ये धानवाले कलंक ला हमर मुड़ ले मिटावव नीते एसो भादो में हमर समाज के तरफ ले सवारी सुविधा के पूरा बायकाट करे जाही।


रीझे यादव 

टेंगनाबासा

ओटीपी*(नान्हे कहिनी)

 *ओटीपी*(नान्हे कहिनी)


हमर पारा के समारिन दाई सोसायटी के सेल्समैन ला बखानत घर कोती आवत राहय। में उही समे ओला पूछ परेंव-का होगे दाई? तें काबर बिफरत हस? 

डोकरी दाई रोवांसी होवत किथे-का बतावंव बेटा! मोर अंगरी के चिनहा सब खिया गेहे। सोसायटी में आधार नी बताय किथे। मोबाईल में ओटीपी आही अउ ओला बताहूं तब चांउर ला देही कथे।नाती टूरा के नंबर ला मोर अधार कारड में जोड़वाय हंव।ओकरे भरोसा में दाना मिलही।कोन जनी अउ का का नाच नचाही सरकार हा।जावत हंव टूरा ला खोजे बर।मिलगे त ठीक हे नीते काली फेर भुगतना भुगतहूं। सरकार कथे कि सब ला सुविधा देवत हंव फेर यहा का सुविधा हरे ददा।बारा नाच नचावत हे।

में ओला बताएंव कि सरकार हा फर्जी मनखे मन ला योजना के लाभ लेयबर रोके बर अउ सही मनखे तक लाभ पहुंचाय बर ए बेवस्था ला बनाय हे दाई।

ओहा तुरते किथे-यहा ऊमर में लटपट चलना फिरना होथे बेटा।जांगर थक गेहे।आंखी के अंजोर घलो पतरावत हे।हाथ के छापा मेटा गेहे।कांपथे हाथ हा।सरी ऊमर कमावत हाथ मा फोरा अउ गठान परगे त का हा छपही।हमर असन गरीब मन के चांउर बर अतेक जांच पड़ताल अउ तमाशा।अउ दू मंजिला मकान ढाले गौंटिया मन बर दसो ठन कारड में घर पहुंच सुविधा हे बेटा!!

भगवान बैरी घलो नी लेगत हे।ताहन आगी लगे उंकर ओटीपी ला।

अइसने बड़बडा़वत दाई चलदिस अउ ओकर गोठ मोर कान में खुसरके दिमाग ला अभी तक कोचकत हे।


रीझे यादव टेंगनाबासा

कहानीकार डॉ. पद्‌मा साहू *पर्वणी* खैरागढ़

 कहानीकार 

              डॉ. पद्‌मा साहू *पर्वणी*

                       खैरागढ़



                *सुरता के डोरी*


जाँता करय घुरूर-घुरूर।

चन्नी करय  छुनुन-छुनुन।

सुपा  करय  फट्ट-फट्ट।

बहारी  करय सर्र-सर्र।

ढेंकी  करय  ढेंक-ढेंक।

बाहना करय धम-धम।

टेड़ा करय टेर-टेर।


काकी कइसे गोठियाथस ओ? का जिनिस हरे ये जाँता, चन्नी, ढेंकी, बाहना, टेड़ा हा? का यहू मन गोठियाथें?


मैं कहेंव– पहिली यहू मन घर-घर मा गोठियावत रहिन इंदिरा। ये सब पहली हमर जीवन के जरूरी हिस्सा रहिस। इँकर बिना कखरो कोनो काम नइ होवत रहिस। 


इंदिरा– ओ कइसे काकी?


पहिली हमन अपन बूढ़ी दाई, काकी, महतारी संग मा सँझाकुन अउ मूँधेरहाकुन जाँता मा घुरूर-घुरूर कनकी, गहूँ, चनादार के पिसान पीसन। एक हाथ मा जाँता के मुठिया (पाउ) दूसर हाथ मा कनकी, गहूँ। काम करत-करत घर-परिवार के सीख-सिखावन के कतकों अकन गोठ  हो जाए अउ जाँता मा पिसाय पिसान के मुठिया, फरा, चीला, मोट्ठा रोटी, खुरमी, भजिया गजब मीठावय। अब के रोटी मा ओ सुवाद कहाँ हे?

  जाँता मा राहेर, चना, लाखड़ी, उरीद, मूंग ल दर के दार बनावन। चन्नी मा दार-चाउर चालन त मेरखु निकले तेन ल ढेंकी मा ढेंक-ढेंक कूटन अउ सुपा मा फटर-फटर फुनन। हमर जमाना मा बहुतेच कम मशीन रहिस। अब तो मशीन आगे, त यहू मन नँदागे त तुमन काला जानहू ये सब कइसे गोठियावय? अब ये मन हमर सुरता मा हावय इंदिरा।


काकी ये बाहना का हरे? 


        बाहना गड्ढा वाला पथरा जेन ल भुइयाँ मा गड़ा के रखय। ओकर संग मुसर जेन लकड़ी के बने। मुसर के खाल्हे भाग मा लोहा लगे रहय जेमा अनाज मन कुटावय। जइसे पहिली हमन अइरसा बनावन त कच्चा चाउर ल बहाना मा कूटन। हरदी, मिर्चा, धनिया सब ल बाहना-मुसर मा कूटन। 

अब तो बाहना-मुसर घलो नँदागे। अब सबो जिनिस पाकिट-पाकिट मिलत हे।


हाँ काकी, मैं छोटे रेहेंव त गाँव मा अपन आजी घर एक बेर देखे रेहेंव।


काकी ये टेड़ा का हरे? 


टेड़ा …?


       ये दो खंभा के बीच कुआँ मा बुड़उल बड़का लकड़ी, बाँस जेकर पाछू भाग मा वजन वाले पथरा अउ आगू भाग मा बाल्टी या टीपा ल बाँध के कुआँ ले पानी निकालय। एला कुआँ के तीर मा गड़ावय। हमरो घर एकठन कुँआ-बारी मा टेड़ा रहिस, हमन ओला टेड़ के साग-भाजी मा पानी डारन। कुँआ-बारी मा मुरई, भाटा, मिर्चा, पताल के नान-नान फर ल देख के मन मगन हो जाय। इही तो पेड़-पउधा, प्रकृति संग गोठ-बात आय। अब तो न कखरो कुँआ-बारी हे न टेड़ा। मनखे के जिनगी भागम-भाग होगे हे।


काकी तुँहर जमाना मा अउ का-का रहिस जेन अभी नइ हे?

चाउर के मइरसा, कोठी के अवना, दूध के दुहनी, दही के सीका ये सब गाँव मा पूरा नँदागे हे।


ये मइरसा, कोठी के अवना का हरे काकी?


    कागज अउ सरसों अरसी के खरी ल भिगो के बड़का-बड़का चरीहा ऊपर छाब के छोटे कोठी कस बनावय मइरसा, जेमा खंडी-खंडी चाउर, चना, गहूँ  सब ल भर के रखय। हमर समे मा दूठन कुरिया के बीच मा गाड़ा भर धान के भरउल बड़का-बड़का कोठी रहय। कोठी के सबले नीचे मा ओकर मुँह रहय जेला कोठी के अवना कहैं। इही अवना ले कोठी मा चढ़े बिना धान निकालय।  

    सीका जेला म्यार मा डोरी फँसा के बाँधय अउ दूध-दही ल झूलना कस माटी के बरतन मा टँगा के रखय। 


सीका मतलब देसी फ्रिज न काकी।

  

हाँ इही समझ ले।


काकी तुँहर समे मा खेती-किसान कइसे होवत रहिस?--- इंदिरा 


हमर समे के तो बाते अलग रहिस। पहिली अउ अब मा बहुत फरक हो गे हे इंदिरा। पहिली खेती-किसानी नांगर-बइला के बिना नइ होवत रहिस। कका-ददा मन बाँवत-बियासी, रोपा के काम-बूता ल नांगर-बइला मा करैं। हमन ओ समे खेती-किसानी मा खुशी-खुशी बासी धर के जावन अउ मेड़ मा बइठ के सबके संग भात-बासी खावन।

      पहिली घर मा सब भारा बाँधे बर पैरा के डोरी बरँय। माड़ी मा धान मन ल मचमच के भारा बाँधय। सुर मा एक संघरा दूठन धान के भारा ल खाँध मा रख के काकी-कका मन डोहारैं ओकर पीछू हमन राहन। खेत के धान ल कोठार मा खरही रचँय। धान खरही ले धान ल कलारी मा खींचत पैर डारैं। धान मिंजई मा बइला-गाड़ी अउ बेलन मा चढ़े के खूब मजा आवय। पैरा कोड़ियई, पैरा के पैरावट बनावन। धान मिंजे के बाद कोठार के बीचो-बीच ओला सकेल के सुग्घर रास बना के ओकर ऊपर घेरा बना के फूल चढ़ा के, कलारी-काठा ल रख के पूजा करैं। तेकर पाछू रास ल काठा-काठा नाप के बोरा भरें तब घर के कोठी मा भरैं।     

झरती कोठार अउ बढ़ोना जेमा परिवार के मन जुरमिल के एक संग राँधन-खावन। ओ दिन के मजा अब के जिनगी मा थोरको नइ हे। सही काहत हँव न नोनी?


हाँ काकी, सही काहत हस। अब के लइका मन तो  पैरा-पैरावट, काठा, बढ़ोना का होथे तहू ल नइ जानन। अब तो कोठी-ढोली घलो नइ हे काकी त धान ल किसान मन सीधा मण्डी मा बेचे बर लेगथें अउ खाय-पिए बर बोरी मा भर के रखेथें।। गाँव मा हमर बाँचे-खोचे ये संस्कृति-परम्परा रहिस तहू हा नँदागे हे।

       काकी अब तो टेक्टर के जमाना आगे हे। छोटे हो चाहे बड़का किसान सब टेक्टर मा बोवई कराथें। अब किसान मन धान के कोठार मा खरही नइ रचँय। सब हार्वेस्टर, टेक्टर मा खेतेच मा फसल ल मिजा मिंजा-कुटा डरथें। कोठार-बियारा मा पैरा-पैरावट नइ दिखय। इही सबके सेती अब के लइका मन न पैरा-पैरावट ल जाने न धान लुए बर न कंसी-सिला बिनई ल जानय। 


काकी ये कंसी-सिला का हरे काकी? 

खेत मा जब धान लुए त धान के गिरे नान्हे-नान्हे बाली ल कंसी कहैं अउ डारा वाले धान के बाली ल सिला जेन ल खेत मा घूम-घूम के बिनन। इही धान के हमन मुर्रा लेवन अउ खूब मजा के संग खावन।


इंदिरा, तैं खेती-किसानी के अवजार धूरी-टेकनी, सुमेला काला कहिथे जानथस?


नइ जानव काकी, बता न ये मन का काम आथे?


इंदिरा, धूरी-टेकनी गाड़ा ल टेकाय के काम आय। ये लोहा अउ लकड़ी के बने रहय। एखर तीन टाँग रहय।

इही मा भर्ती गाड़ा टेके रहय।

गाड़ा के जुड़ा जेन लम्भरी लकड़ी के बने ओमा दूनों छोर छेदा रहय उही मा सुमेला ल फँसा के, बइला-भइसा के नरी मा जोता( डोरी) फांद के सुमेला मा फँसावै। 


ये सब तो अब कखरो घर नइ दिखय काकी।


कहाँ ले दिखही सबो तो अब नँदागे गे हे। होही त होही कखरों-कखरों घर मा। ये कल युग हरे  कल माने मशीन के युग। अब कोनो भी क्षेत्र मा हो, सब काम मशीन ले होवत हे।


हाँ ओ तो हे काकी। काकी सुन न…. सुन न एक ठन बात हे।

का इंदिरा, का होगे बता ?


काकी, का तुँहर जमाना मा फोन रहिस हे?


पहिली नइ रहिस। बाद मा डब्बावाला लैंड लाइन कखरो-कखरो घर रहिस। 


तुमन एक दूसर ले कइसे गोठियावत रेहेव? न्योता हिकारी कइसे देवत रेहेव?


इंदिरा हमर जमाना मा चिट्ठी-पाती चलत रहिस। कोनो आफिस-दफ्तर के काम रहे त अधिकारी मन ल पाती लिख के सूचना के लेना-देना होवय।

घर-परिवार, सगा-सहोदर मा सुख-दुख के शोर-खबर ल चिट्ठी-पाती मा लिख के देवत-लेवत रहिन।


काकी चिट्ठी-पाती ल कामा लिखत रेहेव?


इंदिरा, पहिली न अंतर्देशी कार्ड, पोस्टकार्ड, बैरंग होवय जेमा चिट्ठी लिख के पोस्ट ऑफिस मा देवँय। ओ हा हफ्ता-दस दिन मा लिखाय पता मा पहुँच जावय अउ खबर मिल जावय। बर-बिहाव, छट्ठी-बरही, मरनी  जम्मो खबर ल घर मा जाके देवँय। 


तुँहर समे मा बर-बिहाव कइसे होवत रहिस काकी?


हमन नान पन ले देखे हन बिहाव मा दू-तीन दिन पहिली सगा आ जावँय। दार-चाउर के जोरा करैं। चुलमाटी लावै तेकर पाछू सब झन मिल के डूमर डारा, आमा पान, सरई-सइगोना के पाना मा मड़वा छावँय 

अउ पहली घर के सियानदाई मन अनेग-अनेग के गीत गावँय।


कइसन गीत काकी?


बिहाव गीत इंदिरा बिहाव गीत।

जइसे *मड़वा छवउनी*—


सरई सइगोना के दाई मड़वा छवई ले, 

मड़वा छवई ले।

बरे बिहे के रहि जाय, कि ये मोरे दाई सीता ल बिहावे राजा राम।


*चुलमाटी के गीत*–


तोला माटी कोड़े ल, तोला माटी कोड़े ल

नइ आवय मीत, धीरे-धीरे, धीरे-धीरे

तोर बहिनी के कनिहा ल तीर धीरे-धीरे 

जतके ल परसे ततके ल लील

तोला माटी कोड़े ल नइ आवय ग

हर चांदी हरकाजर हरदी बजार

हरदी के गुने मा नोट हजार…


अइसने पूरा बिहाव भर गीत गावँय पहिली दाई-बबा मन। अब भर्र-भर्र रेडिया, धम-धम डीजे चलथे जेमा न सुर न सार।


काकी मोला ए गीत मन बड़ निक लगत हे अउ बता न एकात गीत।


सुन इंदिरा *बरतिया गीत*  –


गाँव अवध ले चले बरतिया, गाँव जनकपुरी जाय।

ये हो राम गाँव जनकपुरी जाय।

राजा जनक के पटपर भाठा तंबू ल देवय तनाय।

ये हो राम तंबू ल देवय तनाय।

राजा जनक जो मिलने को आये,

दशरथ अंग लिपटाय ये हो राम दशरथ अंग लिपटाय।

करे अगवानी ले जावय बरतिया गाँव जनकपुरी जावय।

गाँव जनकपुरी के सोभा ल देखे ब्रम्हा अकचकाय।

बने रसोई देवगन खाये सखियन देवय गारी। 

सुभ-घड़ी सुन्दर लगिन धराय ओ सीता के रचे हे बिहाव।


*भड़वनी गीत*.. 


अइसन समधीन महल उपर बइठे,  के महलों मा पेट भराय।

दे दारी महलों मा पेट भराय। जय हो महलों मा पेट भराय।

काखर गाये, काखर बजाय के काखर नाम धराय।

छोटे के गाये बड़े के बजाय ते मंझला के नाम धराय। 

……..


अइसने जतका संस्कार छोटे-बड़े संस्कृति, रीति-रिवाज रहय ओतके गीत गावँय सब।


सहिच मा काकी तुमन कतका सुग्घर जिनगी जिए हो।


हव इंदिरा फेर यहू अब सपनाच बन जही काबर के अब समे अब्बड़ बदल गे हे। बहुत अकन जुन्ना संस्कृति, रीति-रिवाज मन टूट गे हे। बाँचगे हे त जुन्ना मनखे मन के सुरता।


हव काकी अब के बिहाव मा तो अइसन संस्कृति, परम्परा बहुतेच कम देखे बर मिलथे। गाँव के मन घलो अब शहर के रीति ल अपना ले हें।


अब तो निमंत्रन दे के जमाना घलो बदल गे इंदिरा।


हाँ काकी, अब तो फोन के जमाना आगे हे। दू-चार घरोधी सगा मन घर निमंत्रन ल जाके देथें। बाँचे ल वॉट्सऐप मा खबर भेज देथें। अब तो चिट्ठी-पाती के जघा मनखे मन घंटा-घंटा भर फोन मा गोठिया के  अपन सुख-दुख ल बाँटथें। एमा तो पइसा अउ समे दूनों बच जथे।


        इही समे अउ पइसा बचत के चक्कर मा तो अब रिश्ता-नता मन दूरियावत हे इंदिरा। अब तो जे मनखे ते फोन, कचरा बनगे फोन अउ इही फोन सबला बिगाड़त हे। अब छोटे-बड़े कइसनो कार्यक्रम हो सगा मन तीन-चार घंटा बर आथें अउ काम के निपटत ले रहिथें। कतको बफर सिस्टम मा आधा खड़े, आधा बइठे फेंकत डारत ले खाथें तहान तुरते चल देथें। एकर ले आपस के प्रेम, रिश्ता मजबूत नइ हे। पहिली सुख-दुख मा रिश्तेदार मन दू-तीन दिन पहिली आवँय। जम्मो परिवार जुरिया के काम मा सहयोग देवँय, काम के झरत ले रहँय। एकर ले लोगन मन-तन-मन धन ले एक दूसर ले जुड़े रहैं। 

 

हाँ काकी तैं सहीच काहत हस। अब तो सगा मन खायेच के बेर आथें तइसे हो गे हे। अब तो कोनो काम-बूता मा घलो सगा मन ले जइसन चाही वइसन सहयोग नइ मिलय परिवार अकेल्ला के अकेल्ला।


अब बता हमर जमाना बढ़िया रहिस के तुँहर जमाना बढ़िया हे।

नइ तुँहरे समे बढ़िया रहिस काकी। 


एक बात अउ बता न काकी। का बात इंदिरा?


तुँहर समे मा पढ़ई-लिखई कइसे रहिस?


पढ़ई-लिखई …. अरे का बताँव?


बता न काकी।


    हमर समे मा पढ़ई-लिखई बहुतेच कड़ई के रहिस। गुरुजी मन ल देख के थर-थर काँपन। पढ़े-लिखे ल नइ आवय त गुरुजी मन बेत डंडा मा मारैं। ददा-दाई मन घलो मार के पढ़ाबे गुरुजी कहे। पहिली के शिक्षा मा संस्कार अउ जीवन मूल्य, अध्यात्मिक, नैतिक, बौद्धिक, व्यवहारिक, चरित्रनिर्मान के शिक्षा रहिस। जेन मनखे के मनुसत्त्व ल उजागर करैं। रटन प्रनाली रहिस तभे तो परीक्षा मा सब लिख पावैं। हमर समे मा तो कंडिल-चिमनी के अंजोर मा पढ़े-लिखे सब बिजली पंखा तो पाछू अइस हे। 


     काकी अब तो लइका मन के पढ़ई-लिखई घलो सनन नइ परत हे। अब न, कोनो गुरुजी मन लइका मन ल पढ़ाय-लिखाय सिखाय बर थोक बहुत डांट-फटकार देथें त दाई-ददा मन ईस्कूल पहुँच जथें अउ गुरुजी मन ऊपर चढ़ई करे ल धर लेथें। अब तो ईस्कूल मन मा परीक्षा के हर साल नियम बदल जथे। अब तो चरित्र निर्मान के संगे-संग नौकरी ऊपर शिक्षा देथें तभो ले लइका मन उजबक होवत जावत हें। अब तो गुरुजी मन के सनमान घलो घटत जावत हे। पहिली गुरुजी मन ला भगवान ले बड़े कहे जाय अउ अब…। 

काकी, अब तो गुरुजी, मेडम मन के जघा मा एआई, रोबोट ले पढ़ई होय के शुरू हो गे हे।


हाँ इंदिरा शुरू तो हो गे हे फेर इंदिरा हमर समे मा फोन-वोन, टीवी-सीवी, एआई-ओआई, कम्प्यूटर-संप्यूटर कुछु नइ रहिस। ये सब के माध्यम ले शिक्षा तो मिलही फेर लइका मन गुरुजी अउ मेडम मन ले भावनात्मक रूप ले नइ जुड़ पावै। अइसन शिक्षा के लाभ ले जादा नुकसान होही इंदिरा। अब के समे मा अतेक सुविधा हे तभो ले तो सब लइका मन बड़ उज्जट होवत हें। जतके सुविधा मिलत हे ततके बिगड़त हें सब। 


सहीच काहत हस काकी। अब के समे मा जतका सुख-सुविधा मिलत हे ओतका विनाश के कारन घलो बनत हे।

काकी तोर सुरता के कोठी मा अउ कुछु होही तहू ल बता न जेन ल हमन नइ जानन।


हमर सुरता मा तो अब्बड़ अकन गोठ हावय फेर मैं बतावत हँव तेला तैं कभू नइ सुने होबे इंदिरा। 


मोला जानना हे का बात काकी बता न रब ले?


तैं कभू हरबोलवा  नाम सुने हस?


हरबोलवा ….. ये का होथे काकी?


हरबोलवा एक मनखे हरय। पहिली गाँव-गाँव मा आवय। गाँव भीतरी चउक-चउराहा के पेड़ मा चढ़ के, पहाती बेरा भगवान मन के नाम ल जोर-जोर ले पढ़े। बड़े-बड़े सियान मन के नाम ले के गाँव के सुख-शांति बर भगवान के नाम लेवय। गाँव के मन हरबोलवा ल पइली-पसर चाउर अउ रुपिया-पइसा दे के बिदा करैं।


गजब सुग्घर बात बताय काकी। मैं छोटे रहेंव त एक-दू बेर  सुने रेहेंव, महू ल सुरता आवत हे। अब के लइका मन हरबोलवा ल नइ जानय काकी। गाँव मा अब अइसन कोनो  नइ आवय।


हाँ इंदिरा, अब नइ आवय। अब तो जय गंगान वाले बसदेवा मन घलो कभू-कभू दिखथें।

     अभी मैं जतका बताय हँव न इंदिरा ओ सब पहिली मनखे के जिनगी के संस्कृति-परम्परा, रीति-रिवाज के हिस्सा रहिस। अब्बड़कन रीति-रिवाज अउ लोक संस्कृति हा अब नँदागे।  


काकी तैं अभी जतका बात बताय हस ओ सिरतोन मा बड़ सुग्घर लगिस। मैं सहिच काहत हों तुँहर समे बढ़िया रहिस।


     इंदिरा सब समे बढ़िया रहिथे फेर अपन जेन जुन्ना रीति-रिवाज, संस्कृति हे तेन ल बचा के ओकर संग चले बर पड़थे।


काकी अउ कुछु बता न।


अरे भइगे अब चल काम-बूता पड़े हे। एके दिन मा सबे ल सुन डरबे का। अब्बड़अकन सुरता के डोरी मा बंधाय बात हे सबला धीरे-धीरे जानबे। 


पक्का न काकी।


पक्का भई। तुहीं मन तो ये सब रीति-रिवाज, गोठ-बात ल आगू बढ़ाहू।


कहानीकार 

डॉ. पद्‌मा साहू *पर्वणी*

खैरागढ़ छत्तीसगढ़ राज्य

छत्तीसगढ़ी लोक कथा चोर के ईमानदारी

 छत्तीसगढ़ी  लोक कथा

चोर के ईमानदारी

वीरेन्द्र सरल

एक राज मे एक झन राजा राज करय। राजा के तीन झन बेटा रहय। दु झन बेटा के बिहाव होगे रहय फेर तीसरा बेटा ह कुंवारा रहय। एक दिन राजा सोचिस कि अब मोर बुढ़ापा आगे हावे, ये जीव कब छूट जही तेखर कोई ठिकाना नइहे। मरे के पहिली मैं अपन संपत्ति ला तीनों बेटा म बांट देथवं नही ते येमन मोर मरे के बाद आपस मे झगड़ा-झंझट होही। 

  राजपंडित ले शुभ मुहरूत निकलवा के एक दिन राजा ह अपन तीनों बेटा ला राजमहल में बुलावा भेजिस अउ अपन मन के बात ला बता दिस। 

राजकुमार मन किहिन -"फोकट संशो-फिकर काबर करथस पिताजी! अरे, जब के बात तब बनत रही।"

 फेर राजा अपन जिद म अड़े रहिगे। अपन पिताजी के इच्छा के सनमान करत बेटा मन घला बंटवारा बर तियार होगे।

 राजा ह बडे बेटा ला किहिस-‘‘तैहा तीनों भाई म सबले बड़का अस, तै काय चाहत हस तै मुहमंगा माँग ले।"

   बड़े राजकुमार ह बंटवारा मे राज खजाना ला माँग डारिस। 

  राजा ह मंझला बेटा ला किहिस तब वोहा खजाना के छोड़ पूरा राज ला बंटवारा म मांग लिस। 

राजा जब अपन छोटे बेटा ला बँटवारा माँगे बर किहिस तब छोटे राजकुमार हाथ जोडकें किहिस-‘‘पिताजी ! अब तो आपके पास संपत्ति के नाव म कहीं नइ बांचे हे, बड़े भैया के खजाना होगे अउ मंझला के राजपाट। अपन इच्छा ले अब आप जउन मोला देना चाहो उही ले दे देव।‘‘  राजा ला अपन गलती के अहसास होइस तब वोला बहुत पछतानी लागिस। सिरतोन म छोटे बेटा ला देबर मोर तीर कहीं नइ बाचे हे। 

  आखिर म राजा ह अपन छोटे बेटा ला किहिस-‘‘जा रे बाबू! तैहा ये दुनिया म चोरी करके जीबें खाबे। चोरी तो करबे फेर मोर एक बात ला हमेशा सुरता राखबे। कभु कोन्हों दास, कंजूस अउ मित्र घर चोरी झन करबे, भगवान जरूर तोर भला करही।‘‘ 

   अपन ददा के बात ला गाँठ बांध के छोटेे राजकुमार बारह हाथ के धोती ला तन म पहिरे अउ खाय - पिये के जउन समान भाई-भौजाई मन दीस तउने ला नानकुन मोटरा म धरके राजमहल ले निकलगे। 

रेंगत-रेंगत राजकुमार ह अपन राज ले बहुत दूरिहा एक दूसर राज में पहुँचगे अउ राजधानी के बाहिर एक पीकरी पेड़ के खाल्हे म अपन डेरा जमादिस। 

   मउका देख के एक रतिहा वोहा वो राज के मंत्री के घर मे चोरी करे के नीयत ले खुसरगे। रात तो बने गहरी होगे रिहिस फेर घर म मंत्रानी भर रिहिस। मंत्री ह राजमहल ले लहुटे नइ रिहिस। मंत्री के घर के सब रूपया पैसा ला चोरी करके अपन बारह हाथ के धोती ला तीन हाथ चीर के उही में सब ल मोटरा के राख डारिस। अउ उहाँ ले भागे के मौका खोजे लगिस। उही बेरा म मंत्री अपन घर पहुँचिस वोला देख के चोर ह कोन्टा म लुकागे। घर ह निचट अंधियार रिहिस हवय।

  मंत्री अपन मंत्रानी ला किहिस-‘‘दीया - बाती काबर नइ बारे हस ओ? दीया बारके अंजोर कर, मोर हाथ पांव धोय बर पानी निकाल अउ जेवन परोस।‘‘

    येला सुन के मंत्राणी भड़कगे। मंत्राणी किहिस-‘‘तोर हाथ पांव टूटगे हावे का? सोज बाय सबो काम बुता ला तिही कर मोला नींद आवत हावे।‘‘ 

     मंत्री ह एक ले दु नइ किहिस। कलेचुप सबो काम करके बर्तन ला मांज धो के सुतगे।

     येला देख के चोर ह मन म विचार करिस, अरे अतेक जब्बर मंत्री अउ घर मे बाई के दास। मोर ददा कहे हावे कोन्हों दास के घर चोरी झन करबे। अइसने विचार करके चोर ह चोरी के सब समान ला उहींचे छोड के उहाँ ले निकलगे।

  बिहान दिन मंत्री के घर चोर खुसरे के घटना के राज भर हल्ला मचगे। चोर ला पकड़े के अड़बड़ उदिम करे गिस फेर चोर पकड़ में नई आइस। अइसने-अइसने कुछ दिन बीतगे अउ मनखे मन चोरी के घटना ला भुलागे।

   बहुत दिन बाद वो राजकुमार ह फेर उही राज के परधान के घर चोरी करे के नीयत ले खुसरिस। चोरी के सब माल समेट के बस भागे के तियारी मे रिहिस उही समे परधान घर पहूँचिस। वोहा फेर एक कोन्टा म सपट के भागे के मौका खोजे लगिस। परधान के आते ही परधानिन ह बढ़िया हाथ पाँव धोय बर पानी निकालिस, चटई-पीढ़ा बिछा के ताते तात जेवन परोसिस। 

  अपन आधू म बने स्वादिष्ट पकवान देखके परधान ह पूछिस-‘‘आज तो कोन्हों तिहार बार नोहे फेर ये किसम-किसम के रोटी पीठा ला काबर रांधे हस ओ परधानिन?‘‘ 

   परधानिन किहिस-‘‘आज घर के आघू ला साफ सफाई करत रहेंव तब एक ठन सोन के मोहर मिलगे, उही मोहर के ये सब जिनिस बिसा के बनाय हवं।‘‘ 

     येला सुनके परधान के एड़ी के रिस तरवा म चढ़गे। वोहा गुसिया के किहिस-‘‘अइसने फोकटे-फोकट पइसा ला सिरवाबे तब हमन तो भिखारी बने जाबो।‘‘ अइसने कहिके परधान ह अपन घरवाली ला तीन-चार थपड़ा हकन दीस। 

    ये घटना ला देख के चोर फेर विचार करिस। ये परधान तो महा कंजूस आय तइसे लागथे, ये बपरी ह भाग म मिले मोहर के सदुपयोग करिस अउ ये चंडाल ह येला थपड़ा मारथे। मोर ददा ह कंजूस घर चोरी झन करबे कहिके चेताय हावे। इहाँ चोरी करना बेकार हवय। चोर फेर मोटराय समान ला उहींचे छोड़े के भाग गे।

बिहान दिन फेर उही हो हल्ला और चोर पकड़े के उदिम, फेर चोर पकड़ म नई आइस। कुछ दिन बाद फेर लोगन मन ये घटना ला भुलागे। 

मामला ठंडा पड़िस तब वो चोर ह मौका देख के एक रतिहा सीधा राजा के घर म चोरी करे बर राजमहल म खुसरगे। अधिरतिहा के समय रहय। चारो कोती निच्चट सुनसान हो गे रहय। राजकुमार मउका देख के जइसने राजखजाना कोती बढ़िस। तब देखथे एक सोला साल के बड़ा सुघ्घर अउ मोटियारी नोनी ह सुसक-सुसक के रोवत रहय। राजकुमार सुकुरदुम होके चारो कोती ला बने चेत लगा के देखिस। उहाँ वो नोनी के छोड़ अउ काखरो आरो नइ मिलत रिहिस। 

राजकुमार अपन जीव के मोहो ला छोड़के वो नोनी के तीर पहुंच के पूछिस-‘‘काय बात आय ओ बहिनी! तैहा ये अधिरतिहा बेरा म काबर रोवत हस, तोला काय दुख पडे हावे? तै कोन हरस? इहाँ अकेल्ला काबर बइठे हस?‘‘ रोवइया नोनी किहिस-‘‘मै ये राज के राजखजाना के मालकिन राज लक्ष्मी अवं भैया। इहां अरबो-खरबो के खजाना भरे हावे। मै ये सोच के रोवत हवं कि तैहा ये तीन हाथ के धोती के कुटका म कतेक मोहर ला चोरा डारबे। जा ले आ हाथी घोडा, बडे-बड़े घोडागाड़ी अउ ले जा इहाँ के सब संपति ला। तै नइ जानत हस भैया, इहाँ के राजा ह निःसंतान हावे। मोला डर हावे कि राजा के मरे के बाद कोन्हों दुष्ट अउ पापी के हाथ मै पड़ जाहूँ ते मोर दुर्गति हो जाही। मैहा तोर ईमानदारी म गजब खुश हवं मोला विश्वास हावे तोर संग रहिके मै खुश रहूँ। जा जल्दी ला घोड़ा गाड़ी, आज के रात म इहाँ के राजा ला साँप डसने वाला हे। साँप के बिख ले राजा नइ बांच सके।‘‘ अतका बताके राजलक्ष्मी छप होगे।

राजलक्ष्मी के बात सुन के राजकुमार सन्न खागे। ददा के बात सुरता आगे, काबर कि वोहा कहे रिहिस कोन्हो मित्र घर चोरी झन करबे। चोरी के बात ला भुला के राजकुमार राजा के जीव बचाय के संशो मे पड़गे।

 वोहा तुरते हाथ म कटार ले के राजा के शयन कक्ष कोती रेंगदिस। शयनकक्ष मे राजा सुते रहय। चोर हा कोन्टा म लुका के राजा के पहरा दे लगिस।

     रतिहा जादा होइस तहन राजा के नाक डहर ले सूत के धागा असन नानकुन साँप निकलिस जउन ह देखते- देखत भंयकर नाग बनगे अउ राजा ला डसे बर फन फैलाके बैइठ गे।

   मौका देख के पहरा देवत राजकुमार तुरते अपन कटारी ला निकालिस अउ साँप ला गोंदा-गोंदा काट दिस। फेर ओखर कुटका ला अपन तीन हाथ के धोती में मोटरा के उही मेरन छोड के उहाँ ले कलेचुप निकलगे अउ अपन डेरा म आके सुतगे।

  रतिहा पोहाय के बाद राजा सुत उठ के अपन जठना ला लहू मे तरबतर देखिस तब ओखर होश उड़गे। तुरते राज करमचारी मन ला खबर भेजिस। 

    करमचारी मन आके देखिस तीर में कटार पडे रिहिस अउ मोटरा म कुछु बंधाय रहिस। मोटरा ला खोल के देखे गिस। नाग के कुटका देख सब हैरान होगे। सब ला समझ म आगे कोई वीर हितैषी ह ये नाग ले राजा के जीव के रक्षा करे हावे। फेर वोहा कोन आय, ये पता नई चलिस।  मंत्री अउ परधान ह धोती के ओ कुटका ला पहचान डारिस। 

   ओमन सोचिन-‘‘ये कुटका तो उही धोती के आय जेमा हमर घर के चोरी के समान मोटराय गे रिहिस होवे। यदि वो चोर के पता लग जाये तो सब बात साफ हो जाही।‘‘   अब वो चोर ला पकड़े बर जोर शोर से तियारी करे गिस। राजकुमार ला पकड़ ले गिस अउ राजा के दरबार म लाने गिस। राजा ह पूछिस तब चोर ह सब बात ला सफा-सफा बता दिस।

चोर के ईमानदारी ला सुनके राजा खुश होगे। मंत्री अउ परधान ला शरम होगे। राजा ह वो राजकुमार ला अपन बेटा बना के राखलिस। अपन सब राज पाट अउ खजाना ला राजकुमार के नाव चढाय के घोषणा करके अपन उत्तराधिकारी बना दिस। राजमहल म सब ईमानदार चोर के जय-जयकार करे लगिन। राज के सब जनता मन घला ईमानदार चोर ला अपन राजा पाके खुश होगे। मोर कहिनी पुरगे दार भात चुरगे।


वीरेन्द्र सरल