कहानीकार
डॉ. पद्मा साहू *पर्वणी*
खैरागढ़
*सुरता के डोरी*
जाँता करय घुरूर-घुरूर।
चन्नी करय छुनुन-छुनुन।
सुपा करय फट्ट-फट्ट।
बहारी करय सर्र-सर्र।
ढेंकी करय ढेंक-ढेंक।
बाहना करय धम-धम।
टेड़ा करय टेर-टेर।
काकी कइसे गोठियाथस ओ? का जिनिस हरे ये जाँता, चन्नी, ढेंकी, बाहना, टेड़ा हा? का यहू मन गोठियाथें?
मैं कहेंव– पहिली यहू मन घर-घर मा गोठियावत रहिन इंदिरा। ये सब पहली हमर जीवन के जरूरी हिस्सा रहिस। इँकर बिना कखरो कोनो काम नइ होवत रहिस।
इंदिरा– ओ कइसे काकी?
पहिली हमन अपन बूढ़ी दाई, काकी, महतारी संग मा सँझाकुन अउ मूँधेरहाकुन जाँता मा घुरूर-घुरूर कनकी, गहूँ, चनादार के पिसान पीसन। एक हाथ मा जाँता के मुठिया (पाउ) दूसर हाथ मा कनकी, गहूँ। काम करत-करत घर-परिवार के सीख-सिखावन के कतकों अकन गोठ हो जाए अउ जाँता मा पिसाय पिसान के मुठिया, फरा, चीला, मोट्ठा रोटी, खुरमी, भजिया गजब मीठावय। अब के रोटी मा ओ सुवाद कहाँ हे?
जाँता मा राहेर, चना, लाखड़ी, उरीद, मूंग ल दर के दार बनावन। चन्नी मा दार-चाउर चालन त मेरखु निकले तेन ल ढेंकी मा ढेंक-ढेंक कूटन अउ सुपा मा फटर-फटर फुनन। हमर जमाना मा बहुतेच कम मशीन रहिस। अब तो मशीन आगे, त यहू मन नँदागे त तुमन काला जानहू ये सब कइसे गोठियावय? अब ये मन हमर सुरता मा हावय इंदिरा।
काकी ये बाहना का हरे?
बाहना गड्ढा वाला पथरा जेन ल भुइयाँ मा गड़ा के रखय। ओकर संग मुसर जेन लकड़ी के बने। मुसर के खाल्हे भाग मा लोहा लगे रहय जेमा अनाज मन कुटावय। जइसे पहिली हमन अइरसा बनावन त कच्चा चाउर ल बहाना मा कूटन। हरदी, मिर्चा, धनिया सब ल बाहना-मुसर मा कूटन।
अब तो बाहना-मुसर घलो नँदागे। अब सबो जिनिस पाकिट-पाकिट मिलत हे।
हाँ काकी, मैं छोटे रेहेंव त गाँव मा अपन आजी घर एक बेर देखे रेहेंव।
काकी ये टेड़ा का हरे?
टेड़ा …?
ये दो खंभा के बीच कुआँ मा बुड़उल बड़का लकड़ी, बाँस जेकर पाछू भाग मा वजन वाले पथरा अउ आगू भाग मा बाल्टी या टीपा ल बाँध के कुआँ ले पानी निकालय। एला कुआँ के तीर मा गड़ावय। हमरो घर एकठन कुँआ-बारी मा टेड़ा रहिस, हमन ओला टेड़ के साग-भाजी मा पानी डारन। कुँआ-बारी मा मुरई, भाटा, मिर्चा, पताल के नान-नान फर ल देख के मन मगन हो जाय। इही तो पेड़-पउधा, प्रकृति संग गोठ-बात आय। अब तो न कखरो कुँआ-बारी हे न टेड़ा। मनखे के जिनगी भागम-भाग होगे हे।
काकी तुँहर जमाना मा अउ का-का रहिस जेन अभी नइ हे?
चाउर के मइरसा, कोठी के अवना, दूध के दुहनी, दही के सीका ये सब गाँव मा पूरा नँदागे हे।
ये मइरसा, कोठी के अवना का हरे काकी?
कागज अउ सरसों अरसी के खरी ल भिगो के बड़का-बड़का चरीहा ऊपर छाब के छोटे कोठी कस बनावय मइरसा, जेमा खंडी-खंडी चाउर, चना, गहूँ सब ल भर के रखय। हमर समे मा दूठन कुरिया के बीच मा गाड़ा भर धान के भरउल बड़का-बड़का कोठी रहय। कोठी के सबले नीचे मा ओकर मुँह रहय जेला कोठी के अवना कहैं। इही अवना ले कोठी मा चढ़े बिना धान निकालय।
सीका जेला म्यार मा डोरी फँसा के बाँधय अउ दूध-दही ल झूलना कस माटी के बरतन मा टँगा के रखय।
सीका मतलब देसी फ्रिज न काकी।
हाँ इही समझ ले।
काकी तुँहर समे मा खेती-किसान कइसे होवत रहिस?--- इंदिरा
हमर समे के तो बाते अलग रहिस। पहिली अउ अब मा बहुत फरक हो गे हे इंदिरा। पहिली खेती-किसानी नांगर-बइला के बिना नइ होवत रहिस। कका-ददा मन बाँवत-बियासी, रोपा के काम-बूता ल नांगर-बइला मा करैं। हमन ओ समे खेती-किसानी मा खुशी-खुशी बासी धर के जावन अउ मेड़ मा बइठ के सबके संग भात-बासी खावन।
पहिली घर मा सब भारा बाँधे बर पैरा के डोरी बरँय। माड़ी मा धान मन ल मचमच के भारा बाँधय। सुर मा एक संघरा दूठन धान के भारा ल खाँध मा रख के काकी-कका मन डोहारैं ओकर पीछू हमन राहन। खेत के धान ल कोठार मा खरही रचँय। धान खरही ले धान ल कलारी मा खींचत पैर डारैं। धान मिंजई मा बइला-गाड़ी अउ बेलन मा चढ़े के खूब मजा आवय। पैरा कोड़ियई, पैरा के पैरावट बनावन। धान मिंजे के बाद कोठार के बीचो-बीच ओला सकेल के सुग्घर रास बना के ओकर ऊपर घेरा बना के फूल चढ़ा के, कलारी-काठा ल रख के पूजा करैं। तेकर पाछू रास ल काठा-काठा नाप के बोरा भरें तब घर के कोठी मा भरैं।
झरती कोठार अउ बढ़ोना जेमा परिवार के मन जुरमिल के एक संग राँधन-खावन। ओ दिन के मजा अब के जिनगी मा थोरको नइ हे। सही काहत हँव न नोनी?
हाँ काकी, सही काहत हस। अब के लइका मन तो पैरा-पैरावट, काठा, बढ़ोना का होथे तहू ल नइ जानन। अब तो कोठी-ढोली घलो नइ हे काकी त धान ल किसान मन सीधा मण्डी मा बेचे बर लेगथें अउ खाय-पिए बर बोरी मा भर के रखेथें।। गाँव मा हमर बाँचे-खोचे ये संस्कृति-परम्परा रहिस तहू हा नँदागे हे।
काकी अब तो टेक्टर के जमाना आगे हे। छोटे हो चाहे बड़का किसान सब टेक्टर मा बोवई कराथें। अब किसान मन धान के कोठार मा खरही नइ रचँय। सब हार्वेस्टर, टेक्टर मा खेतेच मा फसल ल मिजा मिंजा-कुटा डरथें। कोठार-बियारा मा पैरा-पैरावट नइ दिखय। इही सबके सेती अब के लइका मन न पैरा-पैरावट ल जाने न धान लुए बर न कंसी-सिला बिनई ल जानय।
काकी ये कंसी-सिला का हरे काकी?
खेत मा जब धान लुए त धान के गिरे नान्हे-नान्हे बाली ल कंसी कहैं अउ डारा वाले धान के बाली ल सिला जेन ल खेत मा घूम-घूम के बिनन। इही धान के हमन मुर्रा लेवन अउ खूब मजा के संग खावन।
इंदिरा, तैं खेती-किसानी के अवजार धूरी-टेकनी, सुमेला काला कहिथे जानथस?
नइ जानव काकी, बता न ये मन का काम आथे?
इंदिरा, धूरी-टेकनी गाड़ा ल टेकाय के काम आय। ये लोहा अउ लकड़ी के बने रहय। एखर तीन टाँग रहय।
इही मा भर्ती गाड़ा टेके रहय।
गाड़ा के जुड़ा जेन लम्भरी लकड़ी के बने ओमा दूनों छोर छेदा रहय उही मा सुमेला ल फँसा के, बइला-भइसा के नरी मा जोता( डोरी) फांद के सुमेला मा फँसावै।
ये सब तो अब कखरो घर नइ दिखय काकी।
कहाँ ले दिखही सबो तो अब नँदागे गे हे। होही त होही कखरों-कखरों घर मा। ये कल युग हरे कल माने मशीन के युग। अब कोनो भी क्षेत्र मा हो, सब काम मशीन ले होवत हे।
हाँ ओ तो हे काकी। काकी सुन न…. सुन न एक ठन बात हे।
का इंदिरा, का होगे बता ?
काकी, का तुँहर जमाना मा फोन रहिस हे?
पहिली नइ रहिस। बाद मा डब्बावाला लैंड लाइन कखरो-कखरो घर रहिस।
तुमन एक दूसर ले कइसे गोठियावत रेहेव? न्योता हिकारी कइसे देवत रेहेव?
इंदिरा हमर जमाना मा चिट्ठी-पाती चलत रहिस। कोनो आफिस-दफ्तर के काम रहे त अधिकारी मन ल पाती लिख के सूचना के लेना-देना होवय।
घर-परिवार, सगा-सहोदर मा सुख-दुख के शोर-खबर ल चिट्ठी-पाती मा लिख के देवत-लेवत रहिन।
काकी चिट्ठी-पाती ल कामा लिखत रेहेव?
इंदिरा, पहिली न अंतर्देशी कार्ड, पोस्टकार्ड, बैरंग होवय जेमा चिट्ठी लिख के पोस्ट ऑफिस मा देवँय। ओ हा हफ्ता-दस दिन मा लिखाय पता मा पहुँच जावय अउ खबर मिल जावय। बर-बिहाव, छट्ठी-बरही, मरनी जम्मो खबर ल घर मा जाके देवँय।
तुँहर समे मा बर-बिहाव कइसे होवत रहिस काकी?
हमन नान पन ले देखे हन बिहाव मा दू-तीन दिन पहिली सगा आ जावँय। दार-चाउर के जोरा करैं। चुलमाटी लावै तेकर पाछू सब झन मिल के डूमर डारा, आमा पान, सरई-सइगोना के पाना मा मड़वा छावँय
अउ पहली घर के सियानदाई मन अनेग-अनेग के गीत गावँय।
कइसन गीत काकी?
बिहाव गीत इंदिरा बिहाव गीत।
जइसे *मड़वा छवउनी*—
सरई सइगोना के दाई मड़वा छवई ले,
मड़वा छवई ले।
बरे बिहे के रहि जाय, कि ये मोरे दाई सीता ल बिहावे राजा राम।
*चुलमाटी के गीत*–
तोला माटी कोड़े ल, तोला माटी कोड़े ल
नइ आवय मीत, धीरे-धीरे, धीरे-धीरे
तोर बहिनी के कनिहा ल तीर धीरे-धीरे
जतके ल परसे ततके ल लील
तोला माटी कोड़े ल नइ आवय ग
हर चांदी हरकाजर हरदी बजार
हरदी के गुने मा नोट हजार…
अइसने पूरा बिहाव भर गीत गावँय पहिली दाई-बबा मन। अब भर्र-भर्र रेडिया, धम-धम डीजे चलथे जेमा न सुर न सार।
काकी मोला ए गीत मन बड़ निक लगत हे अउ बता न एकात गीत।
सुन इंदिरा *बरतिया गीत* –
गाँव अवध ले चले बरतिया, गाँव जनकपुरी जाय।
ये हो राम गाँव जनकपुरी जाय।
राजा जनक के पटपर भाठा तंबू ल देवय तनाय।
ये हो राम तंबू ल देवय तनाय।
राजा जनक जो मिलने को आये,
दशरथ अंग लिपटाय ये हो राम दशरथ अंग लिपटाय।
करे अगवानी ले जावय बरतिया गाँव जनकपुरी जावय।
गाँव जनकपुरी के सोभा ल देखे ब्रम्हा अकचकाय।
बने रसोई देवगन खाये सखियन देवय गारी।
सुभ-घड़ी सुन्दर लगिन धराय ओ सीता के रचे हे बिहाव।
*भड़वनी गीत*..
अइसन समधीन महल उपर बइठे, के महलों मा पेट भराय।
दे दारी महलों मा पेट भराय। जय हो महलों मा पेट भराय।
काखर गाये, काखर बजाय के काखर नाम धराय।
छोटे के गाये बड़े के बजाय ते मंझला के नाम धराय।
……..
अइसने जतका संस्कार छोटे-बड़े संस्कृति, रीति-रिवाज रहय ओतके गीत गावँय सब।
सहिच मा काकी तुमन कतका सुग्घर जिनगी जिए हो।
हव इंदिरा फेर यहू अब सपनाच बन जही काबर के अब समे अब्बड़ बदल गे हे। बहुत अकन जुन्ना संस्कृति, रीति-रिवाज मन टूट गे हे। बाँचगे हे त जुन्ना मनखे मन के सुरता।
हव काकी अब के बिहाव मा तो अइसन संस्कृति, परम्परा बहुतेच कम देखे बर मिलथे। गाँव के मन घलो अब शहर के रीति ल अपना ले हें।
अब तो निमंत्रन दे के जमाना घलो बदल गे इंदिरा।
हाँ काकी, अब तो फोन के जमाना आगे हे। दू-चार घरोधी सगा मन घर निमंत्रन ल जाके देथें। बाँचे ल वॉट्सऐप मा खबर भेज देथें। अब तो चिट्ठी-पाती के जघा मनखे मन घंटा-घंटा भर फोन मा गोठिया के अपन सुख-दुख ल बाँटथें। एमा तो पइसा अउ समे दूनों बच जथे।
इही समे अउ पइसा बचत के चक्कर मा तो अब रिश्ता-नता मन दूरियावत हे इंदिरा। अब तो जे मनखे ते फोन, कचरा बनगे फोन अउ इही फोन सबला बिगाड़त हे। अब छोटे-बड़े कइसनो कार्यक्रम हो सगा मन तीन-चार घंटा बर आथें अउ काम के निपटत ले रहिथें। कतको बफर सिस्टम मा आधा खड़े, आधा बइठे फेंकत डारत ले खाथें तहान तुरते चल देथें। एकर ले आपस के प्रेम, रिश्ता मजबूत नइ हे। पहिली सुख-दुख मा रिश्तेदार मन दू-तीन दिन पहिली आवँय। जम्मो परिवार जुरिया के काम मा सहयोग देवँय, काम के झरत ले रहँय। एकर ले लोगन मन-तन-मन धन ले एक दूसर ले जुड़े रहैं।
हाँ काकी तैं सहीच काहत हस। अब तो सगा मन खायेच के बेर आथें तइसे हो गे हे। अब तो कोनो काम-बूता मा घलो सगा मन ले जइसन चाही वइसन सहयोग नइ मिलय परिवार अकेल्ला के अकेल्ला।
अब बता हमर जमाना बढ़िया रहिस के तुँहर जमाना बढ़िया हे।
नइ तुँहरे समे बढ़िया रहिस काकी।
एक बात अउ बता न काकी। का बात इंदिरा?
तुँहर समे मा पढ़ई-लिखई कइसे रहिस?
पढ़ई-लिखई …. अरे का बताँव?
बता न काकी।
हमर समे मा पढ़ई-लिखई बहुतेच कड़ई के रहिस। गुरुजी मन ल देख के थर-थर काँपन। पढ़े-लिखे ल नइ आवय त गुरुजी मन बेत डंडा मा मारैं। ददा-दाई मन घलो मार के पढ़ाबे गुरुजी कहे। पहिली के शिक्षा मा संस्कार अउ जीवन मूल्य, अध्यात्मिक, नैतिक, बौद्धिक, व्यवहारिक, चरित्रनिर्मान के शिक्षा रहिस। जेन मनखे के मनुसत्त्व ल उजागर करैं। रटन प्रनाली रहिस तभे तो परीक्षा मा सब लिख पावैं। हमर समे मा तो कंडिल-चिमनी के अंजोर मा पढ़े-लिखे सब बिजली पंखा तो पाछू अइस हे।
काकी अब तो लइका मन के पढ़ई-लिखई घलो सनन नइ परत हे। अब न, कोनो गुरुजी मन लइका मन ल पढ़ाय-लिखाय सिखाय बर थोक बहुत डांट-फटकार देथें त दाई-ददा मन ईस्कूल पहुँच जथें अउ गुरुजी मन ऊपर चढ़ई करे ल धर लेथें। अब तो ईस्कूल मन मा परीक्षा के हर साल नियम बदल जथे। अब तो चरित्र निर्मान के संगे-संग नौकरी ऊपर शिक्षा देथें तभो ले लइका मन उजबक होवत जावत हें। अब तो गुरुजी मन के सनमान घलो घटत जावत हे। पहिली गुरुजी मन ला भगवान ले बड़े कहे जाय अउ अब…।
काकी, अब तो गुरुजी, मेडम मन के जघा मा एआई, रोबोट ले पढ़ई होय के शुरू हो गे हे।
हाँ इंदिरा शुरू तो हो गे हे फेर इंदिरा हमर समे मा फोन-वोन, टीवी-सीवी, एआई-ओआई, कम्प्यूटर-संप्यूटर कुछु नइ रहिस। ये सब के माध्यम ले शिक्षा तो मिलही फेर लइका मन गुरुजी अउ मेडम मन ले भावनात्मक रूप ले नइ जुड़ पावै। अइसन शिक्षा के लाभ ले जादा नुकसान होही इंदिरा। अब के समे मा अतेक सुविधा हे तभो ले तो सब लइका मन बड़ उज्जट होवत हें। जतके सुविधा मिलत हे ततके बिगड़त हें सब।
सहीच काहत हस काकी। अब के समे मा जतका सुख-सुविधा मिलत हे ओतका विनाश के कारन घलो बनत हे।
काकी तोर सुरता के कोठी मा अउ कुछु होही तहू ल बता न जेन ल हमन नइ जानन।
हमर सुरता मा तो अब्बड़ अकन गोठ हावय फेर मैं बतावत हँव तेला तैं कभू नइ सुने होबे इंदिरा।
मोला जानना हे का बात काकी बता न रब ले?
तैं कभू हरबोलवा नाम सुने हस?
हरबोलवा ….. ये का होथे काकी?
हरबोलवा एक मनखे हरय। पहिली गाँव-गाँव मा आवय। गाँव भीतरी चउक-चउराहा के पेड़ मा चढ़ के, पहाती बेरा भगवान मन के नाम ल जोर-जोर ले पढ़े। बड़े-बड़े सियान मन के नाम ले के गाँव के सुख-शांति बर भगवान के नाम लेवय। गाँव के मन हरबोलवा ल पइली-पसर चाउर अउ रुपिया-पइसा दे के बिदा करैं।
गजब सुग्घर बात बताय काकी। मैं छोटे रहेंव त एक-दू बेर सुने रेहेंव, महू ल सुरता आवत हे। अब के लइका मन हरबोलवा ल नइ जानय काकी। गाँव मा अब अइसन कोनो नइ आवय।
हाँ इंदिरा, अब नइ आवय। अब तो जय गंगान वाले बसदेवा मन घलो कभू-कभू दिखथें।
अभी मैं जतका बताय हँव न इंदिरा ओ सब पहिली मनखे के जिनगी के संस्कृति-परम्परा, रीति-रिवाज के हिस्सा रहिस। अब्बड़कन रीति-रिवाज अउ लोक संस्कृति हा अब नँदागे।
काकी तैं अभी जतका बात बताय हस ओ सिरतोन मा बड़ सुग्घर लगिस। मैं सहिच काहत हों तुँहर समे बढ़िया रहिस।
इंदिरा सब समे बढ़िया रहिथे फेर अपन जेन जुन्ना रीति-रिवाज, संस्कृति हे तेन ल बचा के ओकर संग चले बर पड़थे।
काकी अउ कुछु बता न।
अरे भइगे अब चल काम-बूता पड़े हे। एके दिन मा सबे ल सुन डरबे का। अब्बड़अकन सुरता के डोरी मा बंधाय बात हे सबला धीरे-धीरे जानबे।
पक्का न काकी।
पक्का भई। तुहीं मन तो ये सब रीति-रिवाज, गोठ-बात ल आगू बढ़ाहू।
कहानीकार
डॉ. पद्मा साहू *पर्वणी*
खैरागढ़ छत्तीसगढ़ राज्य