Thursday, 9 January 2025

नानूक व्यंग्य लेख " रउनिया बर झगरा "

 नानूक व्यंग्य  लेख 

    "  रउनिया बर झगरा "

       -मुरारी लाल साव 


रात के जाड़ बिहनिया के होवत ले रहिथे l बिहनिया के रउनिया बर शरीर काँपत रहिथे

नान नान लइका मन रउनिया तापे बर झगरा होवत रहिस l  बने सोच  लुकाये रहिस बाहिर निकले ला धरलिस l जतके जाड़ अमाथे  कंबल ल ओढ़े भीतरी के गरमी अउ भड़ास ला निकालथे l 

रउनिया बर लड़ई करत आज पछहत्तर बच्छर सिरा गे l समस्या के बदरी म रउनिया तोपा गे हे l कोनो मेऱ ले दिखथे   लोगन झपट पड़थे l  दिन दहाड़े रूनिया ला  कमरा म कंबल ओढ़ाके  मुरकेट डरिन l रउनिया जेन ला मिलथे तौन चपके ला धरथे l जेकर जतका दम पोटार के धरे हे लुका के राखे हे l देने वाला भगवान अबड़ देवत हे फ़ेर भईया भियाँ म राज करत रउनिया दार मन गड्डी अउ गद्दी के बदौलत बगरन नइ देवय l 

जेती देख ओती झगरा l सबला हिस्से दारी चाही l दस बीस परसेंट तो अइसने  घर पहुँच सेवा होवत हे पद वाले मन ला l दस बीस परसेंट बनाने वाला चपकत हे l चालीस पचास परसेंट के रउनिया ला बाँटत हे l उहू म झगरा  चारो कोती l ओला कम दे हमर आदमी नोहय l हमर आदमी ला मिलही त बने जी परान देके काम करही l अस्पताल म रउनिया कइसे पसरे हे l खोरवा बर गाड़ी हे माड़ी नइ उसलत हे l आँखी दिखय झन दिखय लेंस लगवाये ला परही l झुंझुर झंझर म झंझट म पड़े रहिबे l

नर्स ला बाई झन माई कह तभे बात बनही l डॉक्टर मन देवता होथे  मरन देवय फ़ेर बिन दवाई के  जियन नइ देवय l

रउनिया तो सबो बर होथे रउनिया अमीर नइ देखय ना गरीब l सुरुज देवता नइ जानय  रउनिया कोन कइसे सकेलत हे l गद्दी वाले मन धकियाथे अउ गड्डी वाले मन धकियाथे  येला सब देखत सुनत हे l  गद्दी बर कददावर नेता चाही l गड्डी बर तोप तमंचा नहीं  दाँतनीर्पोरेवा चाही l  आँखी लड़रे ले काम बिगड़ जही आँखी मारे के तरीका बने होना चाही lइहू बात ला सुनत हन  एमन ला उंकर गरमी रहिथे l पइसा के गरमी अउ कुरसी के गरमी तेखर सेती जाड़ के आड़ कर लेथे l 

अतका सुख सुविधा रहे के बावजूद दूसर के हक कोती सबके नजर हे l

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