छत्तीसगढ़ी लघुकथा -
" वसीभूत "
एक दिन अपन घर के आघू म बैठे रहेंव l एक करिया कुकुर तीर म आथे अउ टुकुर टुकुर देखथे l ओखर आँखी म लालच के पुतरी एक टक देखत रहिस l अपन हाथ ला बार -बार खीसा म डारंव अउ निकालत रहेंव l
कुकुर अउ निटोर के देखय एकर सेती कुछु न कुछु दिही l
ओकर लालच अउ बढ़गे l ए दफे मय मुठा भर ला निकाले के आघू म रखेव l कुकुर अउ तीर म ऊं ऊं ऊं करत आगे l मुट्ठा ला खोल देंव कुछु नइ गिरिस l कुकुर के जी चुरमुरागे l एक बार फ़ेर हाथ ला खीसा म डारेव अउ निकालेंव मुठा ला नइ खोलेंव अउ दूसर डहर ला देखे के नाटक करेंव l करिया कुकुर धीरे धीरे सूंघियावत आगे l मुठा ला खोलत ओकर मुड़ी ला खजुवाये ला धर लेंव l कुकुर अपन मुड़ी ला पूरा दता दीस l खजुवाना ओला बने लागिस l तब लालच नइ रहिस ओकर आँखी म बल्कि दूनो आँखी ला मुँद लीस बेफिक्री होगे l शायद जान डरिस देवय नहीं त मारे भगावे तको नहीं l
कुकुर के भीतर जागे मया भरोसा ला तोड़े के महूँ कोनो उदिम नइ करेंव l ओकर मुड़ी ला छुवत खजूवावत दस मिनट होगे रहिस होही l बिन हांत -हुत के चुप चाप उठ के दूसर कोती रेंगे ला धर लेंव l कुकुर मोर पीछू पीछू आये ला धर लीस l कुकुर के हिम्मत बढ़गे मोर संग आये ला l दूसर कुकुर मन देख के भूके ला धरिस l करिया कुकुर मोर आघू पाछू घूमत दूसर कुकुर ला ज़वाब दे वत रहिस - " मुठा बंधाये हे अभी नहीं तो कभी भी खोलही मोर हिस्सा हे मोर आदमी हे एखर पाछू संग ला नइ छोड़व l"
करिया कुकुर ला मोर कुकुर नइ कह पांवत हँव
काबर -"मया अउ लालच म कभू भी ककरो संग ककरो पाछू भाग सकत हे l"
दूसर दिन फ़ेर अउ अउ बैठेव l
ए दफे पूरा साहस के साथ मोर गोड़ ला चूमे ला धर लीस l अपन आँखी ला मुँद के लोर्घयाये ला धर लीस l सोचेंव थोकिन मया म अतका अपना पन कुकुर के मन म आ गेहे l डउकी लइका म नइ दिखय l ओमन तो कुकुर ले जादा मतलबी स्वार्थी होथे l कुकुर के तीर म आये आदत परगे फ़ेर तीर म रहिके डउकी लइका धुरिहा धुरिहा रहिथे l मौका आही त पूछय नहीं l
मुरारी लाल साव
कुम्हारी
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