Saturday, 24 January 2026

छत्तीसगढ़ी व्यंग्य मुसुवा के इंटरव्यू

 छत्तीसगढ़ी व्यंग्य

 मुसुवा के इंटरव्यू

वीरेन्द्र सरल

राजधानी के तीर राष्ट्रीय राज मार्ग म मुसुवा मन ल दल के दल आवत देख के मय बक खा गेंव। गुने लगेंव मुसुवा मन बर कोन्हों परिवार नियोजन कार्यक्रम चले रहितिस तब इंखर संख्या अतेक नई बाढ़े रहितिस। पूरा राजमार्ग म कब्जा कर डारे हे बिया मन। हो सकथे कहूँ मेर मुसुवा मेला लगे होही । नहीं ते कहूँ मेर इंखर राष्ट्रीय सम्मेलन होवत होही तिहां जावत होही बपरा मन फेर उंखर चाल-ढाल म अइसन कोई उत्साह नई दिखत रिहिस। थोथना ल ओथारे लरघाय असन रेंगत रिहिन बिचारा मन। कोरोना काल म जउन पीड़ा शहर ले गांव लहुटत प्रवासी मजदूर मन के शकल म दिखत रिहिस उही पीड़ा अभी मुसुवा मन के शकल म दिखत रिहिस। थोड़किन अउ ध्यान से देखेंव तब का देखथंव सब मुसुवा मन के माथ म टीका लगे हावे। मोर भीतरी के पत्रकार जाग गे। मन होइस एकाध झन मुसुवा संग गोठ-बात करके सच ल जाने के कोशिश करंव।

  बने मोठ-डांट मुसुवा ल ज उन ल उंखर संगवारी मन घुस मुसुवा साहब कहत रिहिन उही ल राम रमुआ करके माइक धरे-धरे महुँ ओखर पाछु-पाछु रेंगत पूछेंव- मुसुवा साहब नमस्कार! सबले पहली हमर चैनल म आपके बहुत -बहुत स्वागत हे। आप अतेक झन एकेच संग कहाँ ले आवत हव अउ कहाँ ले जावत हव? अउ तुंहर माथ म ये टीका कोन लगाय हावे? का कहूँ मेर आप मन के स्वागत सत्कार होय हे?

 घुस मुसुवा अपन पीड़ा ल पियत किहिस - हमन कवर्धा ले आवत हन भैया। हमर मन ऊपर आरोप लगे हे कि हमन सात करोड़ के बाइस हजार किवंटल धान ल सफाचट कर दे हन। हमर माथ के ये टीका कलंक के टीका आय अभी अउ सुनई आय हे कि बागबाहरा म घला हमर गोटियार सगा मन ऊपर पांच करोड़ के धान ल खाय के आरोप लगे हे। जब ले ये कलंक के टीका माथ म लगे हे, हमर मन के सामाजिक बहिष्कार होगे हे। समाज म हमर इज्जत दु कौड़ी के नई रहिगे हे। समाज ल तो छोड़ घर म घला हमर मुसुवाईन मन रात दिन गारी-बखाना देवत हे। बिला के मेन गेट ल बन्द करके भीतरी ले मोर मुसुवाईन मोला घेरी -बेरी आई हेट यू अउ डोंट टच मी कहत हे। समाज म सब झन पहिली घुस मुसुवा कहिके सम्मान करय तेमन अब घूसखोर मुसुवा कहिके अपमान करत हे। हमन मुसुवा अन ददा, घूसखोर मनखे या कोन्हों बाबू, साहब , नेता या मंत्री नोहन जउन अतेक अपमान ल सही सकन। मन होथे मुसुवा दवई खा के आत्महत्या कर लेवन फेर संगवारी मन किहिन कि कलंक के टीका लगाय-लगाय मरबो तब तो नरक म घला ठउर नई मिलही तेखर ले  सात करोड़ के धान खवैय्या मुसुवा मन के पकड़ात ले हमन ल लड़ना पड़ही। हमर पेट ल देख के तुही मन अंदाज लगाव कि का अतेक धान ल खा के हमन पचा पाबो? बदहजमी म मर जबो ददा बदहजमी म। हमर पेट अउ मुँहूं के साइज ल देख के तो आरोप लगातिस बेईमान मन। हमन मनखे नोहन ददा कि पशुचारा, कोयला, गिट्टी, सीमेंट, रेती, लोहा लक्खर सब ल पचो लेन। हमर हालत तो अभी अइसे होगे हे कि हमरे बियाय  लइका मन घूसखोर पापा, घूसखोर पापा कहिथे चिढ़ावत हे। धिक्कार हे अइसन जिनगी ल। फेर वाह रे मनखे। अचरज लागथे घूस खाने वाला, घोटाला करने वाला, दूसर के हक छिनने वाला मनखे मन कतेक कूटहा अउ निशरमा होही जउन मन ल एकोकनी बात-बानी नई लागे। हमन अपन माथ के कलंक ल धोय बर राजधानी म धरना-प्रदर्शन करे बर जावत हन। ओती बागबाहरा वाला संगवारी मन घला संघरही तहन सबो झन मिलके धरना-प्रदर्शन करके सात करोड़ अउ पांच करोड़ के धान खवैय्या मुसुवा मन ल पकड़े के मांग करबो। बस धरना -प्रदर्शन करे के जगह ल बता देतेव तब बड़ा किरपा होतिस।

 घुस मुसुवा के बात ल सुनके मोर मुँहू बन्द होगे। नाव भले घुस मुसुवा हे फेर घूस ल कभू मुहुँ नई लगाय हे अउ येती कई झन अइसे मनखे हे जिंखर गजब सुंदर-सुंदर नाव हे फेर बिना घूस खाय टस ले मस नई होवय।

 मय कलेचुप ओ मेर ले रेंगे लगेंव तब घुस मुसुवा किहिस- " देख भैया। आजकाल पत्रकार भैया मन घला सही बात ल छापे म डर्राय ल धर ले हे। पत्रकारिता ल लोकतंत्र के चौथा स्तम्भ माने गे हे। जब तक दूध के दूध अउ पानी के पानी नई हो जही । कार वाला, फाइल वाला सात करोड़ी मुसुवा मन पकड़े नई जाही तब तक आप हमर पीड़ा ल जनता-जनार्दन ल बतावत रहू तभे तुंहर पत्रकारिता ह सार्थक होही।


वीरेन्द्र सरल

मुसवा"

 " मुसवा"

       हमर गांव के कोतवाल हर हांका पारत राहय,सुनो सुनो  मुसवा ले सावधान रहू हो---!मे दंग रहिगेंव अइसन काय बात (गोठ)होगे जेन कोतवाल ल मुनादी करे ल पड़त हे। में पूछेंव कोतवाल ल काय होगे भईया? कोतवाल बताइस मुसवा करोड़ो के धान ल खागे।अऊ कहूं जगा हमला कर सकत हे।दवा ल गोला बारूद कस छोंड़त हे तीहां ले ऊंकर कुछू उद (कुछ नई होवत हे)नी जलत हे।जइसे अमर होके आय हे। हां एकात कनिक मन ल कुछ असर हो सकत हे।जइसे करमचारी मन निलंबन के पाछू बहाल हो जथे।

              पहिली के सियान मन काहय मुसवा के खाय ले कोठी के धान नी सिराय।फेर करोड़ो के धान ल कईसे खाईस होही। हां हो सकत हे ये मार्डन मुसवा होही। इक्कीसवीं सदी के। न खाऊंगा न खाने दूंगा सुने रेहेन फेर कईसे खाईस होही ये गुने के बात आय।हो सकत हे मन के बात ल मुसवा मन सुने नई रिहिस होही।यहू बात हो सकत हे ये मन जमगरहा संरक्षण (विशेष कृपा) वाले बड़े मुसवा मन होही।वो तो भला करे भगवान ये बात सिरिफ हमन ह (जनता)जानत हन। नही ते सरकार ल पता चल जही ते गुरुजी मन के सामत आ जही। गुरुजी मन के पोटा घला कांपत होही कहीं उन मन ल मुसवा पकड़े,गिने बर झिन लगा दिही। एक तो कुकुर मनखे (sir)मन ले ले देके निपटे हे। सरकार ह एक बात के बड़ मजा उड़ाथे जनता दरवाहा, मास्टर मन चरवाहा।

         सिरतोन कहिबे त मुसवा मन बड़ हुंसियार हो गेहे। पहिली कपड़ा लत्ता ल कुतरे अब बड़े बड़े डराम ल कुतर देथे।जईसे लाईट केमरा एक्सन। मुसवा अऊ बिलई के गोठ करबे त पक्ष अऊ विपक्ष कस लागथे। मुसवा हर कुटुर- कुटुर खाथे अऊ बिलई माऊ माऊ नरियाथे।बिलई नरियाथे तभे पता चलथे मुसवा कदे कर हे।अऊ नरियाही काबर नही ये हर ऊंकर जनम सिद्ध अधिकार आय।

करोड़ो के घोटाला म मिले हे बेल,

चंदवा हर लगावत हे

चंपा के तेल।

   कहिथे पहिली तेल निकाले के कला तेली मनकर राहय।अब ये कला सरकार के पेटेंट हो गेहे। चाहे सरकार कखरो राहय जनता के तेल निकना तय हे।

     फेर सब बात के एक बात इही आय जब मुसवा भारी भरकम लम्बोदर ल उठा सकत हे त करोड़ो के धान ल घलो खा सकत हे।नानकून लड्डू के भोग लगाय ले जिनगी नी पहाय। नही ते बीता भर पेट बर मनखे मन अतिक हाय -हाय काबर करतिस।

     फकीर प्रसाद   

      साहू  फक्कड़

         सुरगी

तिसरइया चूल्हा

 तिसरइया चूल्हा

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रामसिंग के बेवा राम्हिन हा गाँव के सरपंच, पटइल, पंच अउ सियान मन ला बलाये हे। जम्मों झन सकलाके अँगना मा बइठे हें।

सरपंच हा पूछिस-- का बात ये रामहिन। सियान मन ला कइसे बलाये हस वो?

" का बताववँ ददा---तुमन तो जानते हव। मोर दूनों बेटा-बहू मन इही घर मा अलग-बिलग रहिथें--दूनों के चूल्हा अलग-अलग जलथे।खेती-खार ला तको आधा -आधा बाँट डरे हें।वो मन तो अपन मा मस्त हे। मोरे बारा हाल होगे हे--रामहिन कहिस।

"तोला भला का बात के दुख होगे तेमा वो? तोर बेटा मन अलग बिलग होइन तेनो दिन सकलाये रहेन। बात अइसे होये रहिस के-तोर खाना पीना एक महिना बड़े घर ता एक महिना छोटे घर होही। तोर सेवा सटका, सूजी पानी ला दूनों झन करहीं। ये बात मा कोनो फरक परगे हे का?--पटइल हा पूछिस।

"हव सियान ददा। दू-चार महिना हा बने बने चलिच तहाँ ले-- मोर बर साग हे ता भात नइये, भात हे साग नइये। कभू कभू तो दिन भर लाँघन तको रहे ला पर जथे।"

"अच्छा ये समस्या हे। कइसे जी  तुंहर का कहना हे? सरपंच हा वोकर बेटा मन ला पूछिस।

"नहीं सरपंच साहब --अइसे बात नइये।दाई हा गलत बोलत हे"--बड़े बेटा हा बोलिस।

छोटे हा तो सीधा-सीधा कहि दिच के दाई हा कोरा झूठ बोलत हे।

"मैं झूठ काबर बोलहूँ सियान हो। अब मैं इंकर सो नइ रहे सकवँ। मोर कोनो आने बेवस्ता बना देतेव"--रामहिन हाथ जोर के कहिच।

वोकर अरजी ला सुनके सियान मन आपस मा बिचार करके सरपंच ला फइसला सुनाये ला कहिन।

"सुन ओ रामहिन अइसे करबे। तोर नाम मा जेन छै-सात एकड़ खेत हे तेला अपन जियत ले अधिया-रेगहा देके अपन खर्चा चलाबे।नहीं ते बेंच बेंच के जीबे अउ तोर दूनों बेटा मन ये घर मा रइहीं तेकर सेती एकक हजार रुपिया हर महिना देहीं। नइ देना रइही ता कहूँ राहयँ। ये घर हा तोर ये। तैं अपन चूल्हा अलग जला ले। ठीक हे ना वो रामहिन"--सरपंच हा कहिस।

"हव सियान ददा मोला मंजूर हे"--रामहिन कहिस।

" नहीं भई। तिसरइया चूल्हा काबर जलही। मैं दाई ला अपन संग पोगरी राखहूँ। कोनो शिकायत के मौका नइ आवन देववँ "--बड़े बेटा हा हाथ जोर के कहिच।

"वाह अइसे कइसे होही।दाई ला अपन संग महूँ राख सकथवँ। नहीं ते सबे कोई एके  मा रहिबो"--छोटे बेटा हा कहिच।

बिन सेवा के मेवा बर बेटा मन के  लालच ला देखके सरपंच संग जम्मों सियान मन के अंतस मा गुस्सा संग दुख भरगे।


चोवा राम वर्मा 'बादल '

प्राईम टाईम में मुसवा* (व्यंग्य)

 *प्राईम टाईम में मुसवा* (व्यंग्य)


रतिहा 8 ले 9 बजे के बेरा हा समाचार चैनल वाले मन बर अभीजित मुहुर्त ले ओपार शुभ होथे।इही बेरा मा मनखे जें खाके अलथत कलथत डकार मारत देश दुनिया के खबर लेयबर समाचार देखथे।

आधा किलो पाउडर अउ सौ ग्राम लिपिस्टिक पोते समाचार वाचिका निकलथे अउ देश नीते राज्य के महत्वपूर्ण मुद्दा ऊपर पंचइती करथे।हांव हांव करत पक्ष विपक्ष के मनखे मन स्टूडियो में कुकुर ले ओपार एक दूसर ऊपर गुर्रावत रथे। हालांकि कैमरा के पाछू मा दूनों झन एके प्लेट में बिरयानी जमावत रथे।ये अलग बात आय।

जनता जनार्दन इही मा खुश रहिथे अउ चैनल वाले मन धकाधक विज्ञापन पाके नोट छापत रथे।

आज के प्राईम टाईम कार्यक्रम में मुसवा ला आमंत्रित करे गे रिहिस।काबर कि मुसवा घलो अब करोड़ों के धान खाने वाले हस्ती के रुप में देश दुनिया में प्रसिद्ध होवत हे।तइहा के बात ला बइहा लेगे।जब मुसवा ला नानुक जीव समझे जाए अउ उंकर हिनमान कराए के नीयत ले ही ये हाना बनाए रिहिन होही-बडे़ बड़े के चलती नहीं तिहां मुसवा के मनतरपी।

मुसवा घलो अब बड़े बड़े कारनामा ला अंजाम देय मा सक्षम हे।

टीवी में मुसवा ला आमंत्रित करके भारी स्वागत करे गिस ताहने समाचार वाचिका पूछिस-मिस्टर माऊस का ये बात सही हरे कि तुमन छत्तीसगढ़ राज्य में मनमाने करोड़ों के धान खा डरेव? 

मुसवा किथे-तोर डाई करे चूंदी वाले मुड़ मा हाथ रखके कसम खावत हों बहिनी ए बात पूरा सोला आना लबारी आय।हमर नोहरहा के दूठन दांत अउ नानुक पेट मा अतेक ताकत नीहे जे हजारों बोरा धान ला पचा सके।

समाचार वाचिका-त समाचार मन मा जे खबर देखाए जावत हे वो थोरे लबारी हरे।

मुसवा-समाचार मा जेन बताए जावत हे वो पूरा मुसवा समाज ला बदनाम करे के साजिश हरे।हमर सात पुरखा में कभू अइसन‌ नी होय हे।

समाचार वाचिका-ए पहिली मामला नोहय।तुंहर ऊपर पहिली भी आरोप लगे हे कि तुमन मालथाना में जब्ती करे गे दारु अउ गांजा तक ला नी छोड़व।

मुसवा-हमर जनम तो बदनाम होय बर होथे वो दीदी।एक दू झन मुसवा मन शौकीन होथे त एकात केस होगे होही।हम इंकार नी करन।बाकी हमर डोज कतेक होही तेला पब्लिक ला हमर देंहे पांव के साईज ला देख के समझना चाहिए।

समाचार वाचिका-मने तुंहर कहिना हे कि तुंहर नाम के आड़ मा कांड दूसर मन करथे।

मुसवा-हम हमर नानुक मुंह में कइसे काहन भई!! बाकी जौन हे तौन ला तो पूरा संसार जानत हे।

समाचार वाचिका-तुंहर मन के मारे अभी तक घर के माइलोगन मन हलाकान रिहिन अब सरकार तको तुंहर डर में कांपत हे।एकर बारे मा का कहिना हे।

मुसवा-घर के दार चाउंर, रोटी पीठा, खेत खार के अन्न खाए के अधिकार हमन ला भगवान देय हावे।ता ईमानदारी से हमन अपन अधिकार के उपयोग करथन।हमर खवाई अतेक कम रथे कि तइहा के सियान मन केहे रिहिन-मुसवा के खाए ले कोठी के धान नी सिराय।फेर ए दारी अइसे टाईप इल्जाम हमर समाज ऊपर लगे हे कि हमन पब्लिक ला चेहरा नी देखा सकत हन।

समाचार वाचिका-मने तुमन अपन अपराध ला स्वीकार नी करौ।

मुसवा-जेन अपराध ला हमर बिरादरी करे के लाइक नीहे तेला हमन कइसे स्वीकार कर लेबो।हमर पेट के साईज देख के साहेब मन ला इल्जाम लगाना चाहिए।बिधाता घलो भोरहा में पर गेहे काते?मुसवा जोनी के मनखे ला मानुष तन दे देहे।जेमन जब देख तब खाए बर तियार रहिथे।

समाचार वाचिका-त अवइय्या बेरा मा तुंहर समाज के का रणनीति रही ये मुद्दा ऊपर? 

मुसवा-हमर का रणनीति रही दीदी। सरकार ले सीबीआई जांच के अपील करबो अउ लंबोदर भगवान ले भी निवेदन करबो कि ये धानवाले कलंक ला हमर मुड़ ले मिटावव नीते एसो भादो में हमर समाज के तरफ ले सवारी सुविधा के पूरा बायकाट करे जाही।


रीझे यादव 

टेंगनाबासा

ओटीपी*(नान्हे कहिनी)

 *ओटीपी*(नान्हे कहिनी)


हमर पारा के समारिन दाई सोसायटी के सेल्समैन ला बखानत घर कोती आवत राहय। में उही समे ओला पूछ परेंव-का होगे दाई? तें काबर बिफरत हस? 

डोकरी दाई रोवांसी होवत किथे-का बतावंव बेटा! मोर अंगरी के चिनहा सब खिया गेहे। सोसायटी में आधार नी बताय किथे। मोबाईल में ओटीपी आही अउ ओला बताहूं तब चांउर ला देही कथे।नाती टूरा के नंबर ला मोर अधार कारड में जोड़वाय हंव।ओकरे भरोसा में दाना मिलही।कोन जनी अउ का का नाच नचाही सरकार हा।जावत हंव टूरा ला खोजे बर।मिलगे त ठीक हे नीते काली फेर भुगतना भुगतहूं। सरकार कथे कि सब ला सुविधा देवत हंव फेर यहा का सुविधा हरे ददा।बारा नाच नचावत हे।

में ओला बताएंव कि सरकार हा फर्जी मनखे मन ला योजना के लाभ लेयबर रोके बर अउ सही मनखे तक लाभ पहुंचाय बर ए बेवस्था ला बनाय हे दाई।

ओहा तुरते किथे-यहा ऊमर में लटपट चलना फिरना होथे बेटा।जांगर थक गेहे।आंखी के अंजोर घलो पतरावत हे।हाथ के छापा मेटा गेहे।कांपथे हाथ हा।सरी ऊमर कमावत हाथ मा फोरा अउ गठान परगे त का हा छपही।हमर असन गरीब मन के चांउर बर अतेक जांच पड़ताल अउ तमाशा।अउ दू मंजिला मकान ढाले गौंटिया मन बर दसो ठन कारड में घर पहुंच सुविधा हे बेटा!!

भगवान बैरी घलो नी लेगत हे।ताहन आगी लगे उंकर ओटीपी ला।

अइसने बड़बडा़वत दाई चलदिस अउ ओकर गोठ मोर कान में खुसरके दिमाग ला अभी तक कोचकत हे।


रीझे यादव टेंगनाबासा

कहानीकार डॉ. पद्‌मा साहू *पर्वणी* खैरागढ़

 कहानीकार 

              डॉ. पद्‌मा साहू *पर्वणी*

                       खैरागढ़



                *सुरता के डोरी*


जाँता करय घुरूर-घुरूर।

चन्नी करय  छुनुन-छुनुन।

सुपा  करय  फट्ट-फट्ट।

बहारी  करय सर्र-सर्र।

ढेंकी  करय  ढेंक-ढेंक।

बाहना करय धम-धम।

टेड़ा करय टेर-टेर।


काकी कइसे गोठियाथस ओ? का जिनिस हरे ये जाँता, चन्नी, ढेंकी, बाहना, टेड़ा हा? का यहू मन गोठियाथें?


मैं कहेंव– पहिली यहू मन घर-घर मा गोठियावत रहिन इंदिरा। ये सब पहली हमर जीवन के जरूरी हिस्सा रहिस। इँकर बिना कखरो कोनो काम नइ होवत रहिस। 


इंदिरा– ओ कइसे काकी?


पहिली हमन अपन बूढ़ी दाई, काकी, महतारी संग मा सँझाकुन अउ मूँधेरहाकुन जाँता मा घुरूर-घुरूर कनकी, गहूँ, चनादार के पिसान पीसन। एक हाथ मा जाँता के मुठिया (पाउ) दूसर हाथ मा कनकी, गहूँ। काम करत-करत घर-परिवार के सीख-सिखावन के कतकों अकन गोठ  हो जाए अउ जाँता मा पिसाय पिसान के मुठिया, फरा, चीला, मोट्ठा रोटी, खुरमी, भजिया गजब मीठावय। अब के रोटी मा ओ सुवाद कहाँ हे?

  जाँता मा राहेर, चना, लाखड़ी, उरीद, मूंग ल दर के दार बनावन। चन्नी मा दार-चाउर चालन त मेरखु निकले तेन ल ढेंकी मा ढेंक-ढेंक कूटन अउ सुपा मा फटर-फटर फुनन। हमर जमाना मा बहुतेच कम मशीन रहिस। अब तो मशीन आगे, त यहू मन नँदागे त तुमन काला जानहू ये सब कइसे गोठियावय? अब ये मन हमर सुरता मा हावय इंदिरा।


काकी ये बाहना का हरे? 


        बाहना गड्ढा वाला पथरा जेन ल भुइयाँ मा गड़ा के रखय। ओकर संग मुसर जेन लकड़ी के बने। मुसर के खाल्हे भाग मा लोहा लगे रहय जेमा अनाज मन कुटावय। जइसे पहिली हमन अइरसा बनावन त कच्चा चाउर ल बहाना मा कूटन। हरदी, मिर्चा, धनिया सब ल बाहना-मुसर मा कूटन। 

अब तो बाहना-मुसर घलो नँदागे। अब सबो जिनिस पाकिट-पाकिट मिलत हे।


हाँ काकी, मैं छोटे रेहेंव त गाँव मा अपन आजी घर एक बेर देखे रेहेंव।


काकी ये टेड़ा का हरे? 


टेड़ा …?


       ये दो खंभा के बीच कुआँ मा बुड़उल बड़का लकड़ी, बाँस जेकर पाछू भाग मा वजन वाले पथरा अउ आगू भाग मा बाल्टी या टीपा ल बाँध के कुआँ ले पानी निकालय। एला कुआँ के तीर मा गड़ावय। हमरो घर एकठन कुँआ-बारी मा टेड़ा रहिस, हमन ओला टेड़ के साग-भाजी मा पानी डारन। कुँआ-बारी मा मुरई, भाटा, मिर्चा, पताल के नान-नान फर ल देख के मन मगन हो जाय। इही तो पेड़-पउधा, प्रकृति संग गोठ-बात आय। अब तो न कखरो कुँआ-बारी हे न टेड़ा। मनखे के जिनगी भागम-भाग होगे हे।


काकी तुँहर जमाना मा अउ का-का रहिस जेन अभी नइ हे?

चाउर के मइरसा, कोठी के अवना, दूध के दुहनी, दही के सीका ये सब गाँव मा पूरा नँदागे हे।


ये मइरसा, कोठी के अवना का हरे काकी?


    कागज अउ सरसों अरसी के खरी ल भिगो के बड़का-बड़का चरीहा ऊपर छाब के छोटे कोठी कस बनावय मइरसा, जेमा खंडी-खंडी चाउर, चना, गहूँ  सब ल भर के रखय। हमर समे मा दूठन कुरिया के बीच मा गाड़ा भर धान के भरउल बड़का-बड़का कोठी रहय। कोठी के सबले नीचे मा ओकर मुँह रहय जेला कोठी के अवना कहैं। इही अवना ले कोठी मा चढ़े बिना धान निकालय।  

    सीका जेला म्यार मा डोरी फँसा के बाँधय अउ दूध-दही ल झूलना कस माटी के बरतन मा टँगा के रखय। 


सीका मतलब देसी फ्रिज न काकी।

  

हाँ इही समझ ले।


काकी तुँहर समे मा खेती-किसान कइसे होवत रहिस?--- इंदिरा 


हमर समे के तो बाते अलग रहिस। पहिली अउ अब मा बहुत फरक हो गे हे इंदिरा। पहिली खेती-किसानी नांगर-बइला के बिना नइ होवत रहिस। कका-ददा मन बाँवत-बियासी, रोपा के काम-बूता ल नांगर-बइला मा करैं। हमन ओ समे खेती-किसानी मा खुशी-खुशी बासी धर के जावन अउ मेड़ मा बइठ के सबके संग भात-बासी खावन।

      पहिली घर मा सब भारा बाँधे बर पैरा के डोरी बरँय। माड़ी मा धान मन ल मचमच के भारा बाँधय। सुर मा एक संघरा दूठन धान के भारा ल खाँध मा रख के काकी-कका मन डोहारैं ओकर पीछू हमन राहन। खेत के धान ल कोठार मा खरही रचँय। धान खरही ले धान ल कलारी मा खींचत पैर डारैं। धान मिंजई मा बइला-गाड़ी अउ बेलन मा चढ़े के खूब मजा आवय। पैरा कोड़ियई, पैरा के पैरावट बनावन। धान मिंजे के बाद कोठार के बीचो-बीच ओला सकेल के सुग्घर रास बना के ओकर ऊपर घेरा बना के फूल चढ़ा के, कलारी-काठा ल रख के पूजा करैं। तेकर पाछू रास ल काठा-काठा नाप के बोरा भरें तब घर के कोठी मा भरैं।     

झरती कोठार अउ बढ़ोना जेमा परिवार के मन जुरमिल के एक संग राँधन-खावन। ओ दिन के मजा अब के जिनगी मा थोरको नइ हे। सही काहत हँव न नोनी?


हाँ काकी, सही काहत हस। अब के लइका मन तो  पैरा-पैरावट, काठा, बढ़ोना का होथे तहू ल नइ जानन। अब तो कोठी-ढोली घलो नइ हे काकी त धान ल किसान मन सीधा मण्डी मा बेचे बर लेगथें अउ खाय-पिए बर बोरी मा भर के रखेथें।। गाँव मा हमर बाँचे-खोचे ये संस्कृति-परम्परा रहिस तहू हा नँदागे हे।

       काकी अब तो टेक्टर के जमाना आगे हे। छोटे हो चाहे बड़का किसान सब टेक्टर मा बोवई कराथें। अब किसान मन धान के कोठार मा खरही नइ रचँय। सब हार्वेस्टर, टेक्टर मा खेतेच मा फसल ल मिजा मिंजा-कुटा डरथें। कोठार-बियारा मा पैरा-पैरावट नइ दिखय। इही सबके सेती अब के लइका मन न पैरा-पैरावट ल जाने न धान लुए बर न कंसी-सिला बिनई ल जानय। 


काकी ये कंसी-सिला का हरे काकी? 

खेत मा जब धान लुए त धान के गिरे नान्हे-नान्हे बाली ल कंसी कहैं अउ डारा वाले धान के बाली ल सिला जेन ल खेत मा घूम-घूम के बिनन। इही धान के हमन मुर्रा लेवन अउ खूब मजा के संग खावन।


इंदिरा, तैं खेती-किसानी के अवजार धूरी-टेकनी, सुमेला काला कहिथे जानथस?


नइ जानव काकी, बता न ये मन का काम आथे?


इंदिरा, धूरी-टेकनी गाड़ा ल टेकाय के काम आय। ये लोहा अउ लकड़ी के बने रहय। एखर तीन टाँग रहय।

इही मा भर्ती गाड़ा टेके रहय।

गाड़ा के जुड़ा जेन लम्भरी लकड़ी के बने ओमा दूनों छोर छेदा रहय उही मा सुमेला ल फँसा के, बइला-भइसा के नरी मा जोता( डोरी) फांद के सुमेला मा फँसावै। 


ये सब तो अब कखरो घर नइ दिखय काकी।


कहाँ ले दिखही सबो तो अब नँदागे गे हे। होही त होही कखरों-कखरों घर मा। ये कल युग हरे  कल माने मशीन के युग। अब कोनो भी क्षेत्र मा हो, सब काम मशीन ले होवत हे।


हाँ ओ तो हे काकी। काकी सुन न…. सुन न एक ठन बात हे।

का इंदिरा, का होगे बता ?


काकी, का तुँहर जमाना मा फोन रहिस हे?


पहिली नइ रहिस। बाद मा डब्बावाला लैंड लाइन कखरो-कखरो घर रहिस। 


तुमन एक दूसर ले कइसे गोठियावत रेहेव? न्योता हिकारी कइसे देवत रेहेव?


इंदिरा हमर जमाना मा चिट्ठी-पाती चलत रहिस। कोनो आफिस-दफ्तर के काम रहे त अधिकारी मन ल पाती लिख के सूचना के लेना-देना होवय।

घर-परिवार, सगा-सहोदर मा सुख-दुख के शोर-खबर ल चिट्ठी-पाती मा लिख के देवत-लेवत रहिन।


काकी चिट्ठी-पाती ल कामा लिखत रेहेव?


इंदिरा, पहिली न अंतर्देशी कार्ड, पोस्टकार्ड, बैरंग होवय जेमा चिट्ठी लिख के पोस्ट ऑफिस मा देवँय। ओ हा हफ्ता-दस दिन मा लिखाय पता मा पहुँच जावय अउ खबर मिल जावय। बर-बिहाव, छट्ठी-बरही, मरनी  जम्मो खबर ल घर मा जाके देवँय। 


तुँहर समे मा बर-बिहाव कइसे होवत रहिस काकी?


हमन नान पन ले देखे हन बिहाव मा दू-तीन दिन पहिली सगा आ जावँय। दार-चाउर के जोरा करैं। चुलमाटी लावै तेकर पाछू सब झन मिल के डूमर डारा, आमा पान, सरई-सइगोना के पाना मा मड़वा छावँय 

अउ पहली घर के सियानदाई मन अनेग-अनेग के गीत गावँय।


कइसन गीत काकी?


बिहाव गीत इंदिरा बिहाव गीत।

जइसे *मड़वा छवउनी*—


सरई सइगोना के दाई मड़वा छवई ले, 

मड़वा छवई ले।

बरे बिहे के रहि जाय, कि ये मोरे दाई सीता ल बिहावे राजा राम।


*चुलमाटी के गीत*–


तोला माटी कोड़े ल, तोला माटी कोड़े ल

नइ आवय मीत, धीरे-धीरे, धीरे-धीरे

तोर बहिनी के कनिहा ल तीर धीरे-धीरे 

जतके ल परसे ततके ल लील

तोला माटी कोड़े ल नइ आवय ग

हर चांदी हरकाजर हरदी बजार

हरदी के गुने मा नोट हजार…


अइसने पूरा बिहाव भर गीत गावँय पहिली दाई-बबा मन। अब भर्र-भर्र रेडिया, धम-धम डीजे चलथे जेमा न सुर न सार।


काकी मोला ए गीत मन बड़ निक लगत हे अउ बता न एकात गीत।


सुन इंदिरा *बरतिया गीत*  –


गाँव अवध ले चले बरतिया, गाँव जनकपुरी जाय।

ये हो राम गाँव जनकपुरी जाय।

राजा जनक के पटपर भाठा तंबू ल देवय तनाय।

ये हो राम तंबू ल देवय तनाय।

राजा जनक जो मिलने को आये,

दशरथ अंग लिपटाय ये हो राम दशरथ अंग लिपटाय।

करे अगवानी ले जावय बरतिया गाँव जनकपुरी जावय।

गाँव जनकपुरी के सोभा ल देखे ब्रम्हा अकचकाय।

बने रसोई देवगन खाये सखियन देवय गारी। 

सुभ-घड़ी सुन्दर लगिन धराय ओ सीता के रचे हे बिहाव।


*भड़वनी गीत*.. 


अइसन समधीन महल उपर बइठे,  के महलों मा पेट भराय।

दे दारी महलों मा पेट भराय। जय हो महलों मा पेट भराय।

काखर गाये, काखर बजाय के काखर नाम धराय।

छोटे के गाये बड़े के बजाय ते मंझला के नाम धराय। 

……..


अइसने जतका संस्कार छोटे-बड़े संस्कृति, रीति-रिवाज रहय ओतके गीत गावँय सब।


सहिच मा काकी तुमन कतका सुग्घर जिनगी जिए हो।


हव इंदिरा फेर यहू अब सपनाच बन जही काबर के अब समे अब्बड़ बदल गे हे। बहुत अकन जुन्ना संस्कृति, रीति-रिवाज मन टूट गे हे। बाँचगे हे त जुन्ना मनखे मन के सुरता।


हव काकी अब के बिहाव मा तो अइसन संस्कृति, परम्परा बहुतेच कम देखे बर मिलथे। गाँव के मन घलो अब शहर के रीति ल अपना ले हें।


अब तो निमंत्रन दे के जमाना घलो बदल गे इंदिरा।


हाँ काकी, अब तो फोन के जमाना आगे हे। दू-चार घरोधी सगा मन घर निमंत्रन ल जाके देथें। बाँचे ल वॉट्सऐप मा खबर भेज देथें। अब तो चिट्ठी-पाती के जघा मनखे मन घंटा-घंटा भर फोन मा गोठिया के  अपन सुख-दुख ल बाँटथें। एमा तो पइसा अउ समे दूनों बच जथे।


        इही समे अउ पइसा बचत के चक्कर मा तो अब रिश्ता-नता मन दूरियावत हे इंदिरा। अब तो जे मनखे ते फोन, कचरा बनगे फोन अउ इही फोन सबला बिगाड़त हे। अब छोटे-बड़े कइसनो कार्यक्रम हो सगा मन तीन-चार घंटा बर आथें अउ काम के निपटत ले रहिथें। कतको बफर सिस्टम मा आधा खड़े, आधा बइठे फेंकत डारत ले खाथें तहान तुरते चल देथें। एकर ले आपस के प्रेम, रिश्ता मजबूत नइ हे। पहिली सुख-दुख मा रिश्तेदार मन दू-तीन दिन पहिली आवँय। जम्मो परिवार जुरिया के काम मा सहयोग देवँय, काम के झरत ले रहँय। एकर ले लोगन मन-तन-मन धन ले एक दूसर ले जुड़े रहैं। 

 

हाँ काकी तैं सहीच काहत हस। अब तो सगा मन खायेच के बेर आथें तइसे हो गे हे। अब तो कोनो काम-बूता मा घलो सगा मन ले जइसन चाही वइसन सहयोग नइ मिलय परिवार अकेल्ला के अकेल्ला।


अब बता हमर जमाना बढ़िया रहिस के तुँहर जमाना बढ़िया हे।

नइ तुँहरे समे बढ़िया रहिस काकी। 


एक बात अउ बता न काकी। का बात इंदिरा?


तुँहर समे मा पढ़ई-लिखई कइसे रहिस?


पढ़ई-लिखई …. अरे का बताँव?


बता न काकी।


    हमर समे मा पढ़ई-लिखई बहुतेच कड़ई के रहिस। गुरुजी मन ल देख के थर-थर काँपन। पढ़े-लिखे ल नइ आवय त गुरुजी मन बेत डंडा मा मारैं। ददा-दाई मन घलो मार के पढ़ाबे गुरुजी कहे। पहिली के शिक्षा मा संस्कार अउ जीवन मूल्य, अध्यात्मिक, नैतिक, बौद्धिक, व्यवहारिक, चरित्रनिर्मान के शिक्षा रहिस। जेन मनखे के मनुसत्त्व ल उजागर करैं। रटन प्रनाली रहिस तभे तो परीक्षा मा सब लिख पावैं। हमर समे मा तो कंडिल-चिमनी के अंजोर मा पढ़े-लिखे सब बिजली पंखा तो पाछू अइस हे। 


     काकी अब तो लइका मन के पढ़ई-लिखई घलो सनन नइ परत हे। अब न, कोनो गुरुजी मन लइका मन ल पढ़ाय-लिखाय सिखाय बर थोक बहुत डांट-फटकार देथें त दाई-ददा मन ईस्कूल पहुँच जथें अउ गुरुजी मन ऊपर चढ़ई करे ल धर लेथें। अब तो ईस्कूल मन मा परीक्षा के हर साल नियम बदल जथे। अब तो चरित्र निर्मान के संगे-संग नौकरी ऊपर शिक्षा देथें तभो ले लइका मन उजबक होवत जावत हें। अब तो गुरुजी मन के सनमान घलो घटत जावत हे। पहिली गुरुजी मन ला भगवान ले बड़े कहे जाय अउ अब…। 

काकी, अब तो गुरुजी, मेडम मन के जघा मा एआई, रोबोट ले पढ़ई होय के शुरू हो गे हे।


हाँ इंदिरा शुरू तो हो गे हे फेर इंदिरा हमर समे मा फोन-वोन, टीवी-सीवी, एआई-ओआई, कम्प्यूटर-संप्यूटर कुछु नइ रहिस। ये सब के माध्यम ले शिक्षा तो मिलही फेर लइका मन गुरुजी अउ मेडम मन ले भावनात्मक रूप ले नइ जुड़ पावै। अइसन शिक्षा के लाभ ले जादा नुकसान होही इंदिरा। अब के समे मा अतेक सुविधा हे तभो ले तो सब लइका मन बड़ उज्जट होवत हें। जतके सुविधा मिलत हे ततके बिगड़त हें सब। 


सहीच काहत हस काकी। अब के समे मा जतका सुख-सुविधा मिलत हे ओतका विनाश के कारन घलो बनत हे।

काकी तोर सुरता के कोठी मा अउ कुछु होही तहू ल बता न जेन ल हमन नइ जानन।


हमर सुरता मा तो अब्बड़ अकन गोठ हावय फेर मैं बतावत हँव तेला तैं कभू नइ सुने होबे इंदिरा। 


मोला जानना हे का बात काकी बता न रब ले?


तैं कभू हरबोलवा  नाम सुने हस?


हरबोलवा ….. ये का होथे काकी?


हरबोलवा एक मनखे हरय। पहिली गाँव-गाँव मा आवय। गाँव भीतरी चउक-चउराहा के पेड़ मा चढ़ के, पहाती बेरा भगवान मन के नाम ल जोर-जोर ले पढ़े। बड़े-बड़े सियान मन के नाम ले के गाँव के सुख-शांति बर भगवान के नाम लेवय। गाँव के मन हरबोलवा ल पइली-पसर चाउर अउ रुपिया-पइसा दे के बिदा करैं।


गजब सुग्घर बात बताय काकी। मैं छोटे रहेंव त एक-दू बेर  सुने रेहेंव, महू ल सुरता आवत हे। अब के लइका मन हरबोलवा ल नइ जानय काकी। गाँव मा अब अइसन कोनो  नइ आवय।


हाँ इंदिरा, अब नइ आवय। अब तो जय गंगान वाले बसदेवा मन घलो कभू-कभू दिखथें।

     अभी मैं जतका बताय हँव न इंदिरा ओ सब पहिली मनखे के जिनगी के संस्कृति-परम्परा, रीति-रिवाज के हिस्सा रहिस। अब्बड़कन रीति-रिवाज अउ लोक संस्कृति हा अब नँदागे।  


काकी तैं अभी जतका बात बताय हस ओ सिरतोन मा बड़ सुग्घर लगिस। मैं सहिच काहत हों तुँहर समे बढ़िया रहिस।


     इंदिरा सब समे बढ़िया रहिथे फेर अपन जेन जुन्ना रीति-रिवाज, संस्कृति हे तेन ल बचा के ओकर संग चले बर पड़थे।


काकी अउ कुछु बता न।


अरे भइगे अब चल काम-बूता पड़े हे। एके दिन मा सबे ल सुन डरबे का। अब्बड़अकन सुरता के डोरी मा बंधाय बात हे सबला धीरे-धीरे जानबे। 


पक्का न काकी।


पक्का भई। तुहीं मन तो ये सब रीति-रिवाज, गोठ-बात ल आगू बढ़ाहू।


कहानीकार 

डॉ. पद्‌मा साहू *पर्वणी*

खैरागढ़ छत्तीसगढ़ राज्य

छत्तीसगढ़ी लोक कथा चोर के ईमानदारी

 छत्तीसगढ़ी  लोक कथा

चोर के ईमानदारी

वीरेन्द्र सरल

एक राज मे एक झन राजा राज करय। राजा के तीन झन बेटा रहय। दु झन बेटा के बिहाव होगे रहय फेर तीसरा बेटा ह कुंवारा रहय। एक दिन राजा सोचिस कि अब मोर बुढ़ापा आगे हावे, ये जीव कब छूट जही तेखर कोई ठिकाना नइहे। मरे के पहिली मैं अपन संपत्ति ला तीनों बेटा म बांट देथवं नही ते येमन मोर मरे के बाद आपस मे झगड़ा-झंझट होही। 

  राजपंडित ले शुभ मुहरूत निकलवा के एक दिन राजा ह अपन तीनों बेटा ला राजमहल में बुलावा भेजिस अउ अपन मन के बात ला बता दिस। 

राजकुमार मन किहिन -"फोकट संशो-फिकर काबर करथस पिताजी! अरे, जब के बात तब बनत रही।"

 फेर राजा अपन जिद म अड़े रहिगे। अपन पिताजी के इच्छा के सनमान करत बेटा मन घला बंटवारा बर तियार होगे।

 राजा ह बडे बेटा ला किहिस-‘‘तैहा तीनों भाई म सबले बड़का अस, तै काय चाहत हस तै मुहमंगा माँग ले।"

   बड़े राजकुमार ह बंटवारा मे राज खजाना ला माँग डारिस। 

  राजा ह मंझला बेटा ला किहिस तब वोहा खजाना के छोड़ पूरा राज ला बंटवारा म मांग लिस। 

राजा जब अपन छोटे बेटा ला बँटवारा माँगे बर किहिस तब छोटे राजकुमार हाथ जोडकें किहिस-‘‘पिताजी ! अब तो आपके पास संपत्ति के नाव म कहीं नइ बांचे हे, बड़े भैया के खजाना होगे अउ मंझला के राजपाट। अपन इच्छा ले अब आप जउन मोला देना चाहो उही ले दे देव।‘‘  राजा ला अपन गलती के अहसास होइस तब वोला बहुत पछतानी लागिस। सिरतोन म छोटे बेटा ला देबर मोर तीर कहीं नइ बाचे हे। 

  आखिर म राजा ह अपन छोटे बेटा ला किहिस-‘‘जा रे बाबू! तैहा ये दुनिया म चोरी करके जीबें खाबे। चोरी तो करबे फेर मोर एक बात ला हमेशा सुरता राखबे। कभु कोन्हों दास, कंजूस अउ मित्र घर चोरी झन करबे, भगवान जरूर तोर भला करही।‘‘ 

   अपन ददा के बात ला गाँठ बांध के छोटेे राजकुमार बारह हाथ के धोती ला तन म पहिरे अउ खाय - पिये के जउन समान भाई-भौजाई मन दीस तउने ला नानकुन मोटरा म धरके राजमहल ले निकलगे। 

रेंगत-रेंगत राजकुमार ह अपन राज ले बहुत दूरिहा एक दूसर राज में पहुँचगे अउ राजधानी के बाहिर एक पीकरी पेड़ के खाल्हे म अपन डेरा जमादिस। 

   मउका देख के एक रतिहा वोहा वो राज के मंत्री के घर मे चोरी करे के नीयत ले खुसरगे। रात तो बने गहरी होगे रिहिस फेर घर म मंत्रानी भर रिहिस। मंत्री ह राजमहल ले लहुटे नइ रिहिस। मंत्री के घर के सब रूपया पैसा ला चोरी करके अपन बारह हाथ के धोती ला तीन हाथ चीर के उही में सब ल मोटरा के राख डारिस। अउ उहाँ ले भागे के मौका खोजे लगिस। उही बेरा म मंत्री अपन घर पहुँचिस वोला देख के चोर ह कोन्टा म लुकागे। घर ह निचट अंधियार रिहिस हवय।

  मंत्री अपन मंत्रानी ला किहिस-‘‘दीया - बाती काबर नइ बारे हस ओ? दीया बारके अंजोर कर, मोर हाथ पांव धोय बर पानी निकाल अउ जेवन परोस।‘‘

    येला सुन के मंत्राणी भड़कगे। मंत्राणी किहिस-‘‘तोर हाथ पांव टूटगे हावे का? सोज बाय सबो काम बुता ला तिही कर मोला नींद आवत हावे।‘‘ 

     मंत्री ह एक ले दु नइ किहिस। कलेचुप सबो काम करके बर्तन ला मांज धो के सुतगे।

     येला देख के चोर ह मन म विचार करिस, अरे अतेक जब्बर मंत्री अउ घर मे बाई के दास। मोर ददा कहे हावे कोन्हों दास के घर चोरी झन करबे। अइसने विचार करके चोर ह चोरी के सब समान ला उहींचे छोड के उहाँ ले निकलगे।

  बिहान दिन मंत्री के घर चोर खुसरे के घटना के राज भर हल्ला मचगे। चोर ला पकड़े के अड़बड़ उदिम करे गिस फेर चोर पकड़ में नई आइस। अइसने-अइसने कुछ दिन बीतगे अउ मनखे मन चोरी के घटना ला भुलागे।

   बहुत दिन बाद वो राजकुमार ह फेर उही राज के परधान के घर चोरी करे के नीयत ले खुसरिस। चोरी के सब माल समेट के बस भागे के तियारी मे रिहिस उही समे परधान घर पहूँचिस। वोहा फेर एक कोन्टा म सपट के भागे के मौका खोजे लगिस। परधान के आते ही परधानिन ह बढ़िया हाथ पाँव धोय बर पानी निकालिस, चटई-पीढ़ा बिछा के ताते तात जेवन परोसिस। 

  अपन आधू म बने स्वादिष्ट पकवान देखके परधान ह पूछिस-‘‘आज तो कोन्हों तिहार बार नोहे फेर ये किसम-किसम के रोटी पीठा ला काबर रांधे हस ओ परधानिन?‘‘ 

   परधानिन किहिस-‘‘आज घर के आघू ला साफ सफाई करत रहेंव तब एक ठन सोन के मोहर मिलगे, उही मोहर के ये सब जिनिस बिसा के बनाय हवं।‘‘ 

     येला सुनके परधान के एड़ी के रिस तरवा म चढ़गे। वोहा गुसिया के किहिस-‘‘अइसने फोकटे-फोकट पइसा ला सिरवाबे तब हमन तो भिखारी बने जाबो।‘‘ अइसने कहिके परधान ह अपन घरवाली ला तीन-चार थपड़ा हकन दीस। 

    ये घटना ला देख के चोर फेर विचार करिस। ये परधान तो महा कंजूस आय तइसे लागथे, ये बपरी ह भाग म मिले मोहर के सदुपयोग करिस अउ ये चंडाल ह येला थपड़ा मारथे। मोर ददा ह कंजूस घर चोरी झन करबे कहिके चेताय हावे। इहाँ चोरी करना बेकार हवय। चोर फेर मोटराय समान ला उहींचे छोड़े के भाग गे।

बिहान दिन फेर उही हो हल्ला और चोर पकड़े के उदिम, फेर चोर पकड़ म नई आइस। कुछ दिन बाद फेर लोगन मन ये घटना ला भुलागे। 

मामला ठंडा पड़िस तब वो चोर ह मौका देख के एक रतिहा सीधा राजा के घर म चोरी करे बर राजमहल म खुसरगे। अधिरतिहा के समय रहय। चारो कोती निच्चट सुनसान हो गे रहय। राजकुमार मउका देख के जइसने राजखजाना कोती बढ़िस। तब देखथे एक सोला साल के बड़ा सुघ्घर अउ मोटियारी नोनी ह सुसक-सुसक के रोवत रहय। राजकुमार सुकुरदुम होके चारो कोती ला बने चेत लगा के देखिस। उहाँ वो नोनी के छोड़ अउ काखरो आरो नइ मिलत रिहिस। 

राजकुमार अपन जीव के मोहो ला छोड़के वो नोनी के तीर पहुंच के पूछिस-‘‘काय बात आय ओ बहिनी! तैहा ये अधिरतिहा बेरा म काबर रोवत हस, तोला काय दुख पडे हावे? तै कोन हरस? इहाँ अकेल्ला काबर बइठे हस?‘‘ रोवइया नोनी किहिस-‘‘मै ये राज के राजखजाना के मालकिन राज लक्ष्मी अवं भैया। इहां अरबो-खरबो के खजाना भरे हावे। मै ये सोच के रोवत हवं कि तैहा ये तीन हाथ के धोती के कुटका म कतेक मोहर ला चोरा डारबे। जा ले आ हाथी घोडा, बडे-बड़े घोडागाड़ी अउ ले जा इहाँ के सब संपति ला। तै नइ जानत हस भैया, इहाँ के राजा ह निःसंतान हावे। मोला डर हावे कि राजा के मरे के बाद कोन्हों दुष्ट अउ पापी के हाथ मै पड़ जाहूँ ते मोर दुर्गति हो जाही। मैहा तोर ईमानदारी म गजब खुश हवं मोला विश्वास हावे तोर संग रहिके मै खुश रहूँ। जा जल्दी ला घोड़ा गाड़ी, आज के रात म इहाँ के राजा ला साँप डसने वाला हे। साँप के बिख ले राजा नइ बांच सके।‘‘ अतका बताके राजलक्ष्मी छप होगे।

राजलक्ष्मी के बात सुन के राजकुमार सन्न खागे। ददा के बात सुरता आगे, काबर कि वोहा कहे रिहिस कोन्हो मित्र घर चोरी झन करबे। चोरी के बात ला भुला के राजकुमार राजा के जीव बचाय के संशो मे पड़गे।

 वोहा तुरते हाथ म कटार ले के राजा के शयन कक्ष कोती रेंगदिस। शयनकक्ष मे राजा सुते रहय। चोर हा कोन्टा म लुका के राजा के पहरा दे लगिस।

     रतिहा जादा होइस तहन राजा के नाक डहर ले सूत के धागा असन नानकुन साँप निकलिस जउन ह देखते- देखत भंयकर नाग बनगे अउ राजा ला डसे बर फन फैलाके बैइठ गे।

   मौका देख के पहरा देवत राजकुमार तुरते अपन कटारी ला निकालिस अउ साँप ला गोंदा-गोंदा काट दिस। फेर ओखर कुटका ला अपन तीन हाथ के धोती में मोटरा के उही मेरन छोड के उहाँ ले कलेचुप निकलगे अउ अपन डेरा म आके सुतगे।

  रतिहा पोहाय के बाद राजा सुत उठ के अपन जठना ला लहू मे तरबतर देखिस तब ओखर होश उड़गे। तुरते राज करमचारी मन ला खबर भेजिस। 

    करमचारी मन आके देखिस तीर में कटार पडे रिहिस अउ मोटरा म कुछु बंधाय रहिस। मोटरा ला खोल के देखे गिस। नाग के कुटका देख सब हैरान होगे। सब ला समझ म आगे कोई वीर हितैषी ह ये नाग ले राजा के जीव के रक्षा करे हावे। फेर वोहा कोन आय, ये पता नई चलिस।  मंत्री अउ परधान ह धोती के ओ कुटका ला पहचान डारिस। 

   ओमन सोचिन-‘‘ये कुटका तो उही धोती के आय जेमा हमर घर के चोरी के समान मोटराय गे रिहिस होवे। यदि वो चोर के पता लग जाये तो सब बात साफ हो जाही।‘‘   अब वो चोर ला पकड़े बर जोर शोर से तियारी करे गिस। राजकुमार ला पकड़ ले गिस अउ राजा के दरबार म लाने गिस। राजा ह पूछिस तब चोर ह सब बात ला सफा-सफा बता दिस।

चोर के ईमानदारी ला सुनके राजा खुश होगे। मंत्री अउ परधान ला शरम होगे। राजा ह वो राजकुमार ला अपन बेटा बना के राखलिस। अपन सब राज पाट अउ खजाना ला राजकुमार के नाव चढाय के घोषणा करके अपन उत्तराधिकारी बना दिस। राजमहल म सब ईमानदार चोर के जय-जयकार करे लगिन। राज के सब जनता मन घला ईमानदार चोर ला अपन राजा पाके खुश होगे। मोर कहिनी पुरगे दार भात चुरगे।


वीरेन्द्र सरल

श्रीरामचन्द्र जी अउ छत्तीसगढ़

 श्रीरामचन्द्र जी अउ छत्तीसगढ़ 


                 - ओमप्रकाश साहू "अंकुर"


    हमर भारतीय संस्कृति म मान्यता हे कि जब-  जब ये भुइंया म पाप नंगत बाढ़ जाथे तब भगवान ह मनखे रूप म अवतरित होके आथे अउ अत्याचारी मन ल मारके भक्तन मन के रक्षा करथे। त्रेता जुग म भगवान श्रीरामचन्द्र जी अवतरित होइस। श्रीरामचन्द्र जी भगवान विष्णु के सातवां अवतार माने जाथे।


त्रेता जुग म पवित्र सरयू नदी के तीर म बसे अयोध्या म महान प्रतापी राजा दशरथ राज करत रिहिन।  राजा दशरथ के पूर्वज मन के अब्बड़ सोर रिहिन हे। येमा  राजा रघु,राजा दिलीप, राजा शिवि, सत्यवादी राजा हरिश्चन्द्र, महा प्रतापी अज , भागीरथ अउ आने राजा के नांव सामिल हे। सूर्यवंशी राजा दशरथ के तीन झन रानी रिहिन जेमा कौशल्या सबले बड़की रिहिस। दू झन अउ रानी म   सुमित्रा, कैकैयी रिहिन। राज पाठ सुघ्घर चलत रिहिस। राज्य ह धन - धान्य ले संपन्न रिहिस पर राजा दशरथ के एको झन बेटा नइ रिहिन। इही हंसो  ह राजा ल घुना कस खाय जात रिहिन। अपन ये परेसानी ल अपन कुल गुरू  वशिष्ठ के पास रखिस त राजा ल सलाह दिस कि राजन् येकर बर पुत्रेष्टि यज्ञ कराव। ये यज्ञ करे बर सबले बने महान तपस्वी श्रृंगि ऋषि रहि। ये ऋंगि ऋषि छत्तीसगढ़ के सिहावा पहाड़ी क्षेत्र म तप - जप म मगन राहय। ये इही सिहावा पहाड़ी आय जिहां ले छत्तीसगढ़ के जीवनदायिनी नदी महानदी निकले हे। राजा दशरथ ह ऋंगि ऋषि कर जाके कलौली करिन कि हे महान तपस्वी आप मन मोर बिनती ल स्वीकार करके पुत्रेष्टि यज्ञ करहू त मंय ह आप मन के जिनगी भर आभारी रहूं। श्रृंगि ऋषि ह राजा दशरथ के घर जाके पुत्रेष्टि यज्ञ करिन येकर फलस्वरूप बड़की रानी  कौशल्या ह 

रामचंद्र लला, कैकैयी ह भरत अउ सुमित्रा ह लक्ष्मण अउ शत्रुघ्न जइसे हीरा बेटा पाइन। येमा राम ह भगवान विष्णु के सातवां अवतार 

 अउ लक्ष्मण ह शेषनाग के अवतार माने जाथे। 

कतको इतिहासकार मन के मानना हे कि हमर छत्तीसगढ मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीरामचन्द्र जी के महतारी कौशल्या के मइके हरे। छत्तीसगढ़ के जुन्ना नांव कोसल रिहिस अउ इहां के भाषा ल कोसली कहे जाय। कौशल्या के नांव भानुमति रिहिन जउन ह दक्षिण कोसल के महाप्रतापी राजा भानुमंत के बेटी रिहिन। अयोध्या के महाप्रतापी राजा दशरथ ले वोकर बिहाव होइस। भानुमति कोसल प्रदेश के होय के कारन आगू चलके कौशल्या कहलाइस। आदिकाल म छत्तीसगढ़ महाकोसल के नांव ले प्रसिद्ध रिहिस हे। श्रीराम के जनम भूमि अयोध्या हरे अउ ननिहाल छत्तीसगढ़ के चंदखुरी (आरंग)गांव हरे। हर लइका बर ममा गांव के अब्बड़ मया रहिथे त भगवान राम ल कइसे नइ रहि। येमा दू मत होय नइ हो सकय कि भगवान राम ह अपन नाना गांव नइ आइस होही।कतको बार नानपन म आइस होही। ये स्भाविक बात ये। त हम देखथन कि भगवान राम अपन नानपन म हमर छत्तीसगढ म आके अपन बाल सुलभ लीला चंदखुरी गांव म घलो दिखाइस। ये चंदखुरी गांव म महतारी कौशल्या के बड़का मंदिर हे। ये जगह ह लोगन मन के आस्था के बड़का केन्द्र हरे अउ अब पर्यटन स्थल के रूप म अपन एक अलग पहिचान बना लेहे।


 हमर छत्तीसगढ के महत्तम मअउ बढ़वार जाथे जब ये जाने ल मिलथे कि भगवान राम ह अपन  चौदह बछर बनवास म दस बछर तो इहि छत्तीसगढ़ ( सिहावा) राज्य म वो समय के सप्त ऋषि क्षेत्र म बिताय रिहिन। त ये प्रकार ले हमर छत्तीसगढ मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के चरनरज ले पवित्र होय हे। तेकर सेति हमर छत्तीसगढ म भगवान राम ल भांचा राम कहे जाथे। अउ येकर असर हमर छत्तीसगढ के संस्कृति म देखे ल मिलथे। इहां के लोगन मन अपन भांचा - भांची ल भगवान कस मानथे। चरन छूके प्रनाम करथे। बिहाव से लेके कोनो खुशी के आयोजन हो या जिनगी के अंतिब बेरा होय भांचा - भांची ल अपन शक्ति अनुसार दान जरूर करथे।


 संत कवि पवन दीवान जी महतारी कौशल्या के जनम भूमि चंदखुरी के उद्धार अउ माता कौशल्या शोध पीठ बनाय बर अब्बड़ उदिम करिन। दीवान जी ह काहय कि - " भगवान राम हमर छत्तीसगढ के भांचा आय। चंदखुरी वोकर ममा गांव आय। तभे तो हमन   कहिथन -"कइसे भांचा राम। सब बने बने भांचा राम। ले तूही मन बताव ग कोनो मन कहिथे का कइसे भांचा कृष्ण। अउ मानलो कहूं कोनो अइसने कहि दिस त वो कहइया ह ल कहू !" अइसे कहिके दीवान जी ह जोरदार ठहाका लगाय।

  हमर छत्तीसगढ म भगवान राम ह जन -जन अउ सबके मन म बसे हे। इहां राम भगवान ले जुड़े कतको आयोजन होथे। छत्तीसगढ़ के सबो गांव म रामायण मंडली हावय जउन मन मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के गुनगान अपन सामर्थ्य अनुसार करथे। अउ ये प्रकार ले गोस्वामी तुलसीदास बाबा के रामचरित मानस के संदेस ल जन - जन तक पहुंचाथे।नवा मकान म गृह प्रवेश होय,षट्ठी होय या दशगात्र बेरा राम नाम के चर्चा रामायण मंडली के माध्यम से या रामधुनी मंडली के माध्यम ले होथे। जिहां गीत- संगीत ले वातावरण ह भक्तिमय हो जाथे त दूसर कोति मानस टीकाकार मन राम के चरित्र के गुनगान कर परिवार,समाज अउ देस हित बर संदेश देथे। हमर छत्तीसगढ म रामधुनी प्रतियोगिता, राम सत्त , मानस गान स्पर्धा/ मानस सम्मेलन, नवधा रामायण, राम लीला के आयोजन कर भगवान राम काबर मर्यादा पुरुषोत्तम कहलाथे।भगवान राम ह वर्तमान बेरा म काबर प्रासंगिक हे।ये सब बात ल जोड़ के लोगन मन ल सही रस्दा म चले बर सीख देय जाथे। ये सब आयोजन के आधार महर्षि बाल्मीकि कृत रामायण, गोस्वामी तुलसीदास कृत श्रीरामचरितमानस अउ आने भाषा म रचित रामायण हरे।हमर छत्तीसगढ म रामनामी संप्रदाय के लोगन मन अपन पूरा शरीर म राम दनाम के गोदना गोदाय रहिथे। अत्तिक आस्था हे भगवान राम बर। भगवान राम सबके हरे। महर्षि बाल्मीकि अउ गोस्वामी तुलसीदास के अनुसार राम सगुन रूप म हे। जब- जब समाज म अतियाचार बाढ़ जाथे। जब- जब अपन महान धर्म ल हीनमान करे जाथे त भगवान विष्णु ह नर रूप म अवतार लेके पापी मन ल मारथे अउ हमर महान धर्म अउ संस्कृति के रक्षा करथे।

त दूसर कोति देखथन कि कबीर के राम निर्गुण हे। कबीर के राम कोनो मंदिर अउ पथरा म नइ हे वो तो घट -घट म विराजमान हे। निराकार हे। सबो जगह वोकर उपस्थिति हे। कबीर ह धर्म के नांव म दिखावा करइया अउ येकर आड़ म

 म लड़वइया पाखंडी मन ल जम के लताड़िस।


  राम सबो झन के हरे। वो कौशल्या के राम हरे त कैकेयी बर भगवान हरे। राजा दशरथ के घलो परान हरे। वोहा अयोध्या के मान हरे। भाई भरत , लक्ष्मण, शत्रुघ्न बर महान हरे। केंवट , सबरी माता, अहिल्या, जटायु के उद्धारक हरे। ऋषि - मुनि अउ सज्जन मन के रक्षक त अत्याचारी ,पापी मन बर महाकाल हरे। 

हनुमान के भगवान हरे त सुग्रीव अउ विभीषण के सुघ्घर मितान हरे। ताड़का, मारीच, बाली, कुंभकरण, रावण जइसन राक्षस अउ अहंकारी मन के संहारक हरे। जनकनंदिनी सीता के मर्यादा पुरुषोत्तम राम हरे।जेकर मान राखे बर अहंकारी रावण ल संहारे। राम कैकेयी,मंथरा ल ढांढस बंधवइया वो राम हरे जेहा दूनों ल ये श्रेय देथे कि राम ल मर्यादा पुरुषोत्तम बनाय म तुंहर मन के हाथ हे नइ ते मंय तो सिरिफ अयोध्या के राजा बस कहलातेंव।

    हमर छत्तीसगढ म उत्तर दिशा के सरगुजा ले लेके  दक्षिण दिशा के सुकमा तक भगवान राम ले जुड़े ठउर अउ जुन्ना अवशेष मिलथे जेमा लोगन मन के आस्था जुड़े हावय। हमर राज्य म भगवान राम ले जुड़े पछत्तर ठउर मन के पहिचान करे गे हावय।येमा सीतामढ़ी - हरचौका ( कोरिया), रामगढ़ ( सरगुजा), शिवरीनारायण ( जांजगीर-चांपा), तुरतुरिया ( बलौदाबाजार - भाटापारा), चंदखुरी ( रायपुर), राजिम( गरियाबंद), सिहावा सप्त ऋषि आश्रम ( धमतरी), जगदलपुर ( बस्तर) व रामाराम ( सुकमा) सामिल हावय‌। भगवान राम के बनवास ले जुड़े कतको ठउर मन ल सहेजे अउ पर्यटन स्थल के रुप म बढ़वार करे खातिर पहिली के कांग्रेस सरकार ह श्रीराम वन गमन पर्यटन परिपथ परियोजना बनाय रिहिन। काम घलो चालू करिन।

    बाइस जनवरी 2024 के दिन भगवान राम के जनम भूमि अयोध्या म श्रीरामलला के मूर्ति के प्रान प्रतिष्ठा करे गिस। मोदी - योगी के शासन काल म होवत ये बड़का आयोजन ले सिरिफ अयोध्या ह नइ पूरा देस के संगे -संग आने देस मन घलो राममय होइस ।

 अइसन सुघ्घर बेरा म भगवान राम के ममा ठउर छत्तीसगढ़ ह कइसे अछूता रहितिस। छत्तीसगढ़ ह अपन भांचा राम के मूर्ति ल मंदिर म करीब पांच सौ बछर बाद फिर से स्थापित करे के बेरा म उछाह होइस। भगवान राम के ननिहाल हमर छत्तीसगढ ले अयोध्या म आयोजित बड़का भंडारा खातिर बासमती चउंर , किसम- किसम के सब्जी के संगे- संग सहयोग राशि पठोय गिस। इहां के सबो शहर अउ सब गांव राममय होगे । श्रीराम हमर भारत देश के सच्चे नायक हे। राम एक आदर्श बेटा, आदर्श शिष्य, आदर्श पति,आदर्श मितान, आदर्श राजा के रूप में जनमानस में प्रतिष्ठापित हे।


। जय सिया राम।


           ओमप्रकाश साहू "अंकुर"

         सुरगी, राजनांदगांव

गोदाम के धान ला मुसुवा खा दीस!* (छत्तीसगढ़ी लघुकथा)

 *.        गोदाम के धान ला मुसुवा खा दीस!*            

                    (छत्तीसगढ़ी लघुकथा)


                      - डाॅ विनोद कुमार वर्मा 


            एक ठिन सोसाइटी के गोदाम 06 महीना ले ताला बन्द रहिस। जब ओला खोलिन त एक करोड़ के धान शार्टेज मिलिस। गाँव अउ विभाग मा हलचल मच गे। जतकी मुहूँ ओतकी बात!

        अफसर मन जाँच अधिकारी ला बताइन कि एक करोड़ के धान मुसुवा खा दीस! .....गाँव वाला के संगे-संग जाँच अधिकारी घलो सोसाइटी के अफसन मन के तर्क ले संतुष्ठ दिखिन। सचमुच वो गाँव मा बहुत मुसुवा रहिस त गोदाम के एक करोड़ के धान ला 06 महीना मा खा ही सकत हें! 

       तभे जाँच अधिकारी ले एक तीसरी कक्षा मा पढ़इया नानकुन लइका प्रश्न करिस- ' सर, धान ला तो मुसुवा खा दीस फेर ओकर फोकला ला कोन खाइस? मुसुवा मन तो फोकला ला नि खावँय! '

       जाँच अधिकारी के मुहूँ ले निकलिस- ' वाह बेटा! ..... शाबास!! .... एकदम सही पकड़े हस!!! ' 

         एकर बाद जाँच के दिशा ह बदल गे!

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अंतस के पीरा ह बसंत के आय ले भगा जथे

 अंतस के पीरा ह बसंत के आय ले भगा जथे 

जब ब्रम्हा जी सृष्टि के निर्माण करिस त पेड़ पउधा जीव जनावर अउ पूरा प्रकृति मूक मौन रिहिस तब, देवी सरस्वती के वीणा नाद ले पूरा सृष्टि मा जान आइस, सुखद परिवर्तन अउ चेतना के संचार होइस I तेकर सेती ये दिन ल सरस्वती पूजा के दिन के रूप म मनाथे I पूस के धुन्धरा छट के जाड़ भागे ले धरथे न तब समझ ले रितु बसंत ह अपन मोहक मादक रूप ल धरके पुरवा सन गीत बासंती गाय ले धरती म उतरत हे I प्रकृति के नवा सिंगार के परब आय,काबर जाड़ ह कमतिया जथे अउ सूरुज नारायण के तेज ह बेरा चढती म तेज होय ले धर लेथे, ये मौसम के बखान मँय हा काय करँव येकर बखान तो धरती, अगास, आगी, पानी, हवा,जीव जनावर,पर्वत,नदिया,झील झरना,घाटी, डीह डोंगरी,फूल पात ले लेके मनखे मन सबो करत रहिथें I

सबो परानी म अतेक उछाह भर जथे जेकर कोनों सीमा नइये I माघ के महीना चारों कोती जेती आँख गड़ाबे हरियरे-हरियर खेत-खार म उतेरा उन्हारी गहूँ,तिवरा,सरसों,राहर,मसूर अउ बारी बखरी म लाल,पालक, मेथी,धनिया,पताळ,मिर्ची,गोभी,मुरई आनी-बानी के साग भाजी शोभा ल बढ़ात रहिथे I बाग बगइचा म रंग-रंग के फूल म तितली अउ भौरा मन मंडरात रहिथे I अमरइया म कोयली के मीठ बोली मनला लुभात रहिथे, अमली अउ बोईर के लटलटा फर ल देखके मुँह म पानी आ जथे I माने बसंत रितु के स्वागत सत्कार म प्रकृति मानों सरग ले उतर के आय हे तइसे लागथे I  

ऋतु राज उमंग भरे मन मा,सब पीर थकान मिटात हवै I 

गमके चहुँ ओर सजे बगिया,सरसों अरसी लहरात हवै I 

नव रूप धरे नव रंग सजे,खुशियाँ कतका बरसात हवै I

फुलवा महके पुरवा बहके,अउ कोयल गीत सुनात हवै  I


पलाश के पेड़ ल देखबे त अंगरा आगी असन फुल के खिलई, आमा के बउँर के ममहई, कोयल के कुहकई, चिरई चिरगुन के ये डारा ले वो डारा फुदकई, तरिया, डबरी, नदिया नरवा के पानी के शांत चित्त गहरई, चारों कोती देख ले कोनों मेर सुन्ना नइ लागय, सबो जगा भरे-भरे उजास लागथे I घर होवय ते बन, खेत खार बियारा बारी अइसन निक लागथे अंतस के पीरा ह बसंत के आय ले भगा गे का I शादी बिहाव के होवई, गीता भागवत पूजा पाठ के चारों मुड़ा गियान बगरत रहिथे I तिहार असन उछाह, कोनों नाचत हे, कोनों गावत हे, झांझ मंजीरा बजात कतको झन स्नान धियान अऊ मेला मंडई जात, ते कोनों ह तीरथ बरथ करत दान पुन करत पुन कमात हे I अऊ ओकरे सेती कला,संगीत, वाणी, परेम, बिदया, लेखनी, ऐश्वर्य के देवी सरसती ह सबो परानी ऊपर अपन आशीष ल घलो बरसात रहिथे I देवी सरस्वती के आराधन करे के पर्व आय, एक ठन पौराणिक महत्व तको हावय, भगवान श्रीराम ह बनवास काल म भाई लक्ष्मण संग शिवरीनारायण तीर म शबरी के कुटिया म जाके उकर भक्ति ले अभिभूत होके, मया म जूठन बेर खाय रिहिस हे वो दिन भी बसंत पंचमी के दिन रिहिस हे I

तभे तो बसंत के महीना ल रीतु मन के राजा कहिथे I ये महीना ल सबो परानी के सेहत बर बड़ अच्छा माने गेहे,सबो परानी मन में नवचेतना अऊ नवउमंग के जोश समाथे I चारों कोती बहारे बहार ओनहारी पाती के झुमई ल देख डोकरा मन जवान हो जथे, ठुड़गा मन पहलवान बन जथे I सरसों के खेत के महर-महर महकई, गेहूं के बाली के निकलई, पंखुड़ियों में तितली के मंडरई, भंवरा के गुनगुनई, अइसे लागथे चारों मुड़ा मया के बरसात होवत हे I

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मउँरे घमघोर हवै अमुवा,परसा फुलवा मनहार लगे I

ऋतु राज बसंत जिहाँ दमके,बढ़िया चहुँ ओर तिहार लगे I 

खिनवा पहिरे बँभरी भदरे,लहसे अमली फर डार लगे I 

मउँहा ममहाय जलाय जिया,कपसा गदरे लगवार लगे I  

   

धरती में होले-होले पवन के चलई, मतवाला मनखे के इतरई, तरिया डबरी में कमल के खिलई देख के अइसने अभास होथे कि कोनों नवा बहुरिया के घर मा गृह प्रवेश होय हे I जेकर सुगंध ह पूरा घर दुवार ल सुगन्धित करत हे I अऊ ओकर आय ले सब नाचत, गावत, झूमरत उछाह मनात हे, ये दिन सिरिफ धार्मिक अवसर के दिन नोहय बल्कि हमर संस्कृति,शिक्षा,प्रकृति अउ समाज के संग जुड़ाव के घलो उत्सव आय I बसंत पंचमी के पीला रंग जिनगी म खुशियाँ अउ उमंग भर देथे, वोइसने ज्ञान अउ कला के दीप मन भीतर उजियारा करथे I बसंत पंचमी ह उत्सव अउ पूजा के साथ सामाजिक संदेश तको देथे, तभे तो कहिथे न, ज्ञान सबले बड़का धन आय,शिक्षा समाज के रीढ़ आय,कला अउ संस्कृति बिना जिंनगी अँधियार आय I ये परब हमन ल प्रकृति के संरक्षण अउ पर्यावरण के संतुलन के संदेशा तको देथे I सियान मन के अनुभव ले सीख,गुरु शिष्य परंपरा के मजबूत संबंध अउ समाज म सीखे सिखाय के परंपरा ल जीवंत करथे I आज मोबाइल.इंटरनेट अउ आधुनिकता के दौड़ म हमन अपन संस्कृति ले दूर जात हन I बसंत पंचमी हमन ल अपन जड़ ले जुड़े रेहे बर शिक्षा अउ संस्कार के साथ नैतिकता के पाठ तको सिखाथे I ताकि येकर महक ह जनम जन्मातर तक पीढ़ी दर पीढ़ी बने राहय I 


विजेन्द्र कुमार वर्मा 

नगरगांव (धरसीवां)

आजादी के लड़ाई म राजनांदगांव जिले के योगदान

 आजादी के लड़ाई म राजनांदगांव जिले के योगदान


जब भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस म गरम दल के नेता मन के धाक जमे लगिस तब भारतीय जनता म अंग्रेजी सासन के विरुद्ध भीतरे भीतर आगी सुलगत


गिस। वो समय लाल-बाल-पाल के रूप म लाला लाजपतराय, लोकमान्य बालगंगाधर तिलक अउ विपिनचंद्र पाल के अब्बड़ सोर रिहिस। 1905 म बंगाल विभाजन ले ये चिंगारी ह आगी बनगे अउ जनता मन अंग्रेज़ी सासन बर बागी बनगे। हमर देश के नेता मन जनता ल समझाय लगिस कि अंग्रेजी सासन फूट डालय अउ राज करव के नीति ल अपना के शुरू ले सासन करत आवत है ।बंगाल के विभाजन येकर एक बड़का उदाहरण हे। देशभर में अंग्रेजी सासन के विरुद्ध वातावरण बनिस। अइसन बेरा में 1905 म राजनांदगांव म ठाकुर साहब के अगवाई में छात्र मन के पहली हड़ताल होइस। ठाकुर साहब अपन सहयोगी छविराम चौबे अउ गज्जू लाल शर्मा के संग मिलके राजनांदगांव म राष्ट्रीय आंदोलन ल ठाहिल बनाइस। 


अइसन बेरा म छत्तीसगढ़ के कांग्रेस सदस्य मन घलो गरम दल के नेता मन ले प्रभावित होके उंकर संग सामिल होगे। बछर 1907 म सूरत म आयोजित कांग्रेस अधिवेशन म कांग्रेस दू भाग म बंट गे। अब उदारवादी नेता मन के जगह उग्रवादी दल के नेतामन के दौर चालू होगे अउ अंग्रेजी सासन के सोसन के विरुद्ध जनता संगठित होय लगिस। अइसन बेरा म छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव जिले म घलो आजादी खातिर जन जागृति फैलाय बर सुघ्घर कारज होइस। 

छत्तीसगढ़ म स्वतंत्रता संग्राम आंदोलन के अर्जुन ठाकुर प्यारेलाल लाल सिंह बछर 1909 में राजनांदगांव म सरस्वती पुस्तकालय के स्थापना करिन। आगू चलके सरस्वती पुस्तकालय ह राजनीतिक गतिविधि के ठउर बनगे। अंग्रेजी सासन ल पता चलिस त सरस्वती पुस्तकालय ल जब्त कर लिस।


बछर 1915 म महात्मा गांधी दक्षिण अफ्रीका ले भारत लहुटिस अउ भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस म सामिल होगे। गांधी जी ह देश के दसा ल जाने खातिर दौरा करिन। अंग्रेज मन के सोसन ल जानके बोहा अहिंसक ढंग ले लड़ाई के योजना बना के जन जागृति के सुघ्घर र कारज करिन। धीरे से भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में गांधी जी के धाक जमगे जेहा आजादी तक जारी रिहिस। गांधी जी के मानना रिहिस कि अंग्रेजी सासन ले अहिंसा अउ सत्याग्रह ल अपनाके लड़ना ठीक रहि। येकर प्रयोग गांधी जी ह दक्षिण अफ्रीका में मजदूर मन के हक खातिर लड़ाई म कर चुके रिहिन। 

भारत म खेड़ा सत्याग्रह के माध्यम से गांधी जी अहिंसक आंदोलन के सुरुआत करिन। सितंबर 1920 में कलकत्ता म लाला लाजपत राय के अध्यक्षता म

 कांग्रेस के विशेष अधिवेशन आयोजित होइस। येमा गांधी जी के नेतृत्व में असहयोग आंदोलन चलाय के स्वीकृति दे गिस फेर कांग्रेस के अधिवेशन नागपुर में 26 दिसंबर 1920 म होइस जेकर अध्यक्षता विजय राघवाचार्य करिन। ये अधिवेशन म हमर छत्तीसगढ़ ले आने नेता मन संग ठाकुर प्यारेलाल सिंह ह सामिल होइन। रौलेट एक्ट जइसे करिया कानून अउ जलियांवाला बाग हत्याकांड के कारन देश भर म अंग्रेज सरकार के विरुद्ध चिंगारी सुलगत रिहिस हे। अइसन समय म गांधी जी ह आह्वान कर चुके रिहिन कि अंग्रेज


सरकार के गुलामी ले छुटकारा पाय खातिर स्थानीय समस्या ल आधार बना के असहयोग आंदोलन चालू करय।


ठाकुर प्यारेलाल सिंह ह असहयोग आंदोलन के समय वकालत छोड़‌के राजनांदगांव म राष्ट्रीय विद्यालय के स्थापना करिन । हजार भर के संख्या म छरखा बनवा के जनता ल बांटिस। चरखा के महत्तम समझाइस अउ खादी के प्रचार करिन। ठाकुर साहब खादी पहने लागिस। राजनांदगांव ले हाथ म लिखे पत्रिका घलो निकालिन। जउन ह जन चेतना बर अब्बड़ सहायक होइस।


    गांधी जी के आगमन के प्रभाव 


गांधी जी जब पहिली बार 20 दिसंबर 1920 म छत्तीसगढ़ आइस त इहां के नेतामन के संगे संग जनता मन में अब्बड़ उछाह छागे। गांधी जी कंडेल नहर सत्याग्रह के सिलसिले म आय रिहिन। गांधी जी के छत्तीसगढ़ आय ले अंग्रेजी सासन में हड़कंप मचगे। गांधी जी के कंडेल जाय से पहिलीच अंग्रेजी सासन ह आंदोलनरत किसान अउ स्वतंत्रता संग्राम सेनानी मन के बात ल मान लिस।


बछर 1923 में जब झंडा सत्याग्रह चालू होइस त ठाकुर साहब ल प्रांतीय समिति द्वारा दुर्ग जिला ले सत्याग्रही भेजे के काम सौंपे गिस। नागपुर म सत्याग्रह आंदोलन चालू होइस। झटकुन नागपुर सत्याग्रह के प्रमुख ठउर बनगे। 1924 में जब बीएनसी मिल के दुबारा हड़ताल चालू होइस तब ठाकुर प्यारेलाल सिंह ल जिला बदल कर दे गिस। राजनांदगांव ले निष्कासित करें के बाद सन 1925 म ठाकुर साहब रायपुर चले गे अउ अपन जिनगी के आखिरी तक ऊंहचे रहि के अपन राजनीतिक काम मन ल संचालन करत रिहिन। ठाकुर साहब के उदिम ले राजनंदगांव, छुईखदान, खैरागढ़ रियासत मन मा कांग्रेस संगठन के निर्माण होइस।


बछर 1929 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अधिवेशन म पंडित जवाहरलाल नेहरू के अध्यक्षता म पूर्ण स्वाधीनता के प्रस्ताव पारित होइस। येकर बाद 26 जनवरी 1930 म स्वाधीनता दिवस के रूप में मनाय गिस। गांधी जी देशवासी मन ले आह्वान कर चुके रिहिन कि स्थानीय समस्या ल लेके आंदोलन चालू करय। अइसन बेरा म राजनांदगांव छुई- खदान, मौहला, मानपुर, कौड़ीकसा, डोगरगढ़ डोगरगांव, सहित छुरिया क्षेत्र के बादराटोला, चिरचारीकला, घोघरे, बापूटोला (चिचोला) क्षेत्र ह आंदोलन के प्रमुख केंद्र बन में। राजनांदगांव म विद्रोही कवि कुंज बिहारी चौबे छात्र जीवन म अंग्रेज शासन के झंडा ल उतार के भारतीय झंडा फहरा दिस। येकर कारन वोला बेत ले अब्बड़ मारे गिस पर वोहा महात्मा गांधी के जय अउ भारत माता के जय कहत गिस।


1930 में गांधीजी ह नमक कानून तोड़ो आंदोलन चालू करिन अउ येकर असर राजनांदगांव जिला म देखे ल मिलिस। सन 1930 में राजनांदगांव में स्टेट कांग्रेस के स्थापना आर. एस. रूईकर के मार्गदर्शन म होइस। कांग्रेस के प्रथम बैठक्क मानिक भाई गोंदिया वाले के मकान में रखे गिस जेमा जिले के 162 स्वतंत्रता संग्राम सेनानी भन भाग लिस। फरवरी 1932 में देश-प्रदेश के संगे- संग राजनंदगांव, छुईखदान, छुरिया के बादराटोला बापूटोला (चिचोला), मानपुर, कौड़ीकसा, मोहला, डोंगरगांव, डोंगरगढ़ क्षेत्र म ब्रिटिश शासन अउ स्थानीय राजशाही के विरुद्ध स्वतंत्रता संग्राम सेनानी मन आवाज बुलंद करिन। स्वतंत्रता संग्राम सेनानी विश्राम दास बैरागी ला आजादी के लडाई म भाग ले खातिर सिद्ध दोष कैदी के रूप में 1932 में पहिली रायपुर केंद्रीय जेल म रखे गिस फेर वोला अमरावती जेल म स्थानांतरित कर दे गिस।


22 नंबर 1933 म महात्मा गांधी छत्तीसगढ़ म द्वितीय प्रवास के रूप म आइस। येकर सुरूआत दुर्ग ले होइस। हरिजन मन के उत्थान, तिलक फंड अउ स्वराज्य फंड खातिर आयोजित कार्यक्रम म दुर्ग के मोती तालाब मैदान में गांधी जी के सभा में लगभग 50,000 से अधिक लोगन मन सामिल होइस। गांधी जी के दौरा 22 नवंबर ले 28 नवंबर तक रिहिन है। 24 नवंबर 1933 म गांधी जी ह पं. सुंदर लाल शर्मा द्वारा संचालित सतनामी आश्रम के निरीक्षण करिन येकर बार सभा ल संबोधन करे के बेरा म शर्मा जी द्वारा करे गे हरिजन उद्धार के कारज बर गांधी जी ह उंकर अब्बड़ तारीफ करिन अउ ये काम खातिर शर्मा जी ल अपन गुरु कहिस। शर्मा जी ह गांधी जी ले आठ बछर पहिली हरिजनोंद्धार के कारज ल चालू कर दे रिहिन।

गांधी जी के ये दूसरा दौरा ह राजनांदगांव जिला के स्वतंत्रता संग्राम सेनानी मन ल अब्बड़ प्रभावित करिन अउ गांधी जी के दर्शन लाभ पाय बर इहां के कतको स्वतंत्रता संग्राम सेनानी मन दुर्ग पहुंचिस। घोघरे, छुरिया के स्वतंत्रता संग्राम सेनानी विश्वेश्वर प्रसाद यादव जउन ह लालूटोला स्कूल में शिक्षक रिहिन वोहा अपन स्कूल ल बंद करके गांधी जी के दर्शन करें खातिर अपन चचेरा भाई विद्या प्रसाद यादव जी के संग गिस।


सन 1938 म हरिपुर कांग्रेस अधिवेशन म राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ह रियासती जनता मन ले आजादी के आंदोलन म भाग लेय के आह्वान करिन। ए बछर छुईखदान म जंगल सत्याग्रह चालू होगे।  समारू बरई,गोवर्धन लाल वर्मा, गुलाब दास वैष्णव, अमृतलाल महोबिया , दामोदर त्रिपाठी मन सत्याग्रह के अगुवाई करिन। ठाकुर प्यारेलाल सिंह ह अपन प्रमुख सहयोगी राम नारायण हर्षुल मिश्र ल कांग्रेस संगठन के मार्गदर्शन बर कवर्धा भेजिस। राजनांदगांव जंगल सत्याग्रह के अगवाई ठाकुर लोटन सिंह के हाथ में रिहिन।


छत्तीसगढ़ ह वन संपदा ले भरपूर हावय। येहा इहां के रहवासी मन के जिनगी गुजारे के प्रमुख साधन हरे। अंग्रेजी सासन के गलत वन नीति के कारन जंगल क्षेत्र के रहवासी मन ल नंगत तकलीफ उठाय ल पड़त रिहिस। अंग्रेज जंगल ल अपन संपत्ति समझय। रक्षित वन क्षेत्र म मवेशी मन ल घास चराय खातिर कांजी हाउस म डाल दय येकर ले पशुपालक मन ल अब्बड़ परेसान होवय। अइसने जब लोगन मन जंगल से लकड़ी अउ कांदी (घास) काट के लाय त अंग्रेज मन नाना प्रकार के अतियाचार करय अउ गिरफ्तार कर लेय।  येकर ले अंग्रेजी सासन के विरुद्ध जनता मन म अब्बड़ गुस्सा छमागे। येकर परिणाम जंगल सत्याग्रह के रूप में सामने आइस। हमर छत्तीसगढ़ म सिहावा नगरी डहर के जंगल सत्याग्रह ह देशभर म एक मिसाल बनगे।


जंगल सत्याग्रह अउ बादराटोला गोलीकांड


राजनांदगांव रियासत म बछर 1939 में जंगल सत्याग्रह चालू होइस। येकर सूचना भेज दे गिस। 21 जनवरी 1939 के दिन राजनांदगांव जिले के छुरिया विकासखण्ड के बादराटोला म आस-पास गांव के जनता मन जंगल सत्याग्रह खातिर इकट्ठा होय लगिस। हजारों के भीड़ बादराटोला म सकला गे। इहां जंगल सत्याग्रह के अगुवाई स्वतंत्रता संग्राम सेनानी बुध लाल साहू करत रिहिन। तहसीलदार सुखदेव देवांगन ह 50 सशस्त्र पुलिस बल के संग बादराटोला पहुंच के सबले पहिली जंगल सत्याग्रह के मुखिया बुध लाल साहू ल गिरफ्तार कर लिन। येकर ले बादराटोला म सकलाय लोगन मन ल अब्बड़ गुस्सा आगे अउ तहसीलदार ल भीड़ ह घेर लिस। बुधलाल साहू के चरवाहा रामाधीन गोंड ह तहसीलदार के सामने आके खड़े होगे अउ महात्मा गांधी के जय, भारत माता के जप, वंदे मातरम के नारा लगा के गिरफ्तारी के विरोध करिन। भीड़ के गुस्सा ल देखके तहसीलदार घबरागे अउ जनता ल तितर बितर करे खातिर पुलिस मन ल गोली चलाय के आदेश दे दिस। ये गोली काण्ड म रेवती दास ल गोली लगिस अउ घायल स्थिति म अस्पताल ले जाय गिस। रामाधीन गोंड के छाती म गोली लगिस अउ शहीद होगे। सिरिफ 27 बहर के उमर म रामाधीन अपन मातृभूमि के रक्षा खातिर सहीद होगे अउ इतिहास म अमर होगे। 1939 म


जंगल सत्याग्रह म सामिल होय खातिर विश्वेश्वर प्रसाद यादव, विद्या प्रसाद यादव, तुलसी प्रसाद मिश्रा अउ आने स्वतंत्रता संग्राम सेनानी मन ल जेल म डाल दे गिस।


राजनांदगांव, खैरागढ़ - छुईखदान गंडई अउ मानपुर -मोहला -अंबागढ़ चौकी जिले के स्वतंत्रता संग्राम सेनानी मन म ठाकुर प्यारेलाल सिंह, लोटन सिंह ठाकुर, गोवर्धन लाल वर्मा, गुलाब दास वैषगव, अमृत लाल महोबिया, दामोदर प्रसाद त्रिपाठी, छवि राम चौबे, गज्जू, लाल शर्मा


रामाधीन गोंड, विश्राम दास बैरागी, बुध लाल साहू, रेवती दास, बहुर सिंह, विश्वेश्वर प्रसाद यादव, विद्या प्रसाद यादव, तुलसी प्रसाद मिश्रा, दामोदर दास टावरी, पी. वी. दास, देव प्रसाद आर्य, कुंज बिहारी चौबे, कन्हैया लाल अग्रवाल, दशरथ साहू, ईशना पवार, सतानंद साहू के संगे संग आने नांव सामिल हे। वनांचल मानपुर मोहला क्षेत्र म कतको स्वतंत्रता संग्राम सेनानी रिहिन। अइसन भूले बिसरे स्वतंत्रता संग्राम सेनानी मन उपर काम करे के जरूरत हे।


ओमप्रकाश साहू" अंकुर "सुरगी, राजनांदगांव।

आजादी के लड़ाई मा छत्तीसगढ़ के योगदान

 आजादी के लड़ाई मा छत्तीसगढ़ के योगदान


भारत हा पहिली सोन के चिरइया कहलाय। हमर देश मा बेपार करे खातिर पुर्तगाली, फ्रांसीसी,डच अउ अंग्रेज मन आइस। पहिली इंकर मन के बीच बेपार खातिर आपसी लड़ाई चलिस जेमा आगू चलके अंग्रेज मन हमर देश मा राज करे मा सफल होइस । अंग्रेज मन फूट डालव अउ राज करव के संगे संग रियासत मन बर हड़प नीति अपनाके  करीब दू सौ बछर ले जादा समय तक सरलग राज करिस । अंग्रेज मन के अत्याचार अउ कइ ठक उंकर गलत नीति के कारन इहां के राजा -महाराजा, जमींदार अउ आम मनखे मन मा भीतरे भीतर आगी सुलगत गिस।येकर पहिली परिणाम सन 1857 मा अंग्रेज मन ले राजा महाराजा मन के लड़ाई के रुप मा आगू आइस ।


अंग्रेज मन ले हमर भारत देस ल अजाद कराय के पुन्य काम म हमर छत्तीसगढ के सुघ्घर योगदान हे. हमर छत्तीसगढ़ के मनखे मन अब्बड़ सिधवा अउ शांतप्रिय रेहे हे। तइहा जमाना ले इहां के कृषि अउ ऋषि संस्कृति सुघ्घर सोर बगरे हावय।पर जब कोनो ह जबरन इहां के रहवासी मन के सोसन अउ अतियाचार करे ला लगथे ता अपन हक खातिर जुर मिल के लड़े मा कभू पाछु नइ रिहिन हे। अइसने छत्तीसगढ़ के  रहवासी मन अजादी के लड़ाई म बढ़ -चढ़ के भाग लिन. अंग्रेजी सासन ले लड़ाई करके सबले पहिली सहीद होइन बस्तर क्षेत्र के परलकोट के जमींदार गेंद सिंह हा. 1825 म अंग्रेज मन वोला उंकरे महल के आगू फांसी म लटका दिस. सन 1857 मा भारत के राजा- महाराजा मन अंग्रेजी शासन के विरुद्ध संगठित होके लड़ाई लड़िन जेला प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्रामकहे जाथे। जब पूरा भारत वर्ष मा अंग्रेज मन बर चिंगारी सुलगत रिहिस ता छत्तीसगढ़ हा कइसे पाछु रहितिस। जब हमर देश मा मंगल पांडे,तात्या टोपे,नाना शाहब पेशवा, झांसी की रानी लक्ष्मीबाई, बहादुर शाह जफर,राजा कुंवर सिंह अउ आने राजा मन अंग्रेजी शासन ले जोम देके लड़िन तब येकर असर छत्तीसगढ़ के सोनाखान जमींदारी मा देखे ला मिलिस। सन् 1857 के पहिली भारतीय स्वतंत्रता संग्राम म सोनाखान के जमींदार वीर नारायण सिंह के अंग्रेज मन ले छापामार लड़ाई ले कोनो अनजान नइ हे.जब सोनाखान क्षेत्र मा अकाल पड़िस ता सोनाखान के जमींदार वीर नारायण सिंह हा करौद गांव,कसडोल के बेपारी माखन लाल बनिया के गोदाम ले अनाज लूट के जनता मा बंटवा दिस । माखन बनिया हा येकर शिकायत रायपुर के डिप्टी कमिश्नर चार्ल्स सी. इलियट ले करिन।24 अक्टूबर 1856 मा अंग्रेज अधिकारी कैप्टन स्मिथ हा  वीर नारायण सिंह ला संबलपुर ले गिरफ्तार कर रायपुर जेल मा बंद कर दिस । 10 दिसंबर 1857 म  वीर नारायण सिंह ल  रायपुर के जयस्तंभ चौक म फांसी म चढ़ा दिस. वीर नारायण सिंह के सहादत के बाद 10 जनवरी 1858 तक क्षेत्र मा नंगत के अशांति फैलगे । येकर ले हमर छत्तीसगढ़ मा अंग्रेज मन के विरुद्ध चिंगारी फूटे ला लगिस। वीर नारायण सिंह के सहादत हा  बैंसवाड़ा के राजपूत अउ छत्तीसगढ़ के मंगल पांडे वीर हनुमान सिंह ला अंग्रेजी सासन ले लड़े बर प्रेरित करिन. हनुमान सिंह तीसरी बटालियन मा मैग्जीन लश्कर के पद मा तैनात रिहिन । 18 जनवरी सन 1858 मा संझा साढ़े सात बजे वीर हनुमान सिंह हा तीसरी बटालियन के सार्जेंट मेजर सिडवल के घर मा घूंसके उंकर हत्या कर दिस  । हनुमान सिंह के सत्रह संगवारी मन ला लेफ्टिनेंट स्मिथ के अगुवाई मा गिरफ्तार कर ले गिस । 

अइसने संबलपुर सरगुजा क्षेत्र के उदयपुर रियासत अउ सोहागपुर मा अंग्रेज मन के विरूद्ध विद्रोह होइस।ये प्रकार ले देखथन कि छत्तीसगढ़ क्षेत्र मा प्रथम स्वतंत्रता संग्राम मा कतको राजा, जमींदार,सैनिक अउ नागरिक मन भाग लिस पर  अंग्रेज मन हा आने राजा अउ जमींदार मन के सहयोग ले विद्रोह ला दबाय मा सफल होगे।

जब भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस मा  गरम दल के नेता मन  के धाक जमे लगिस तब भारतीय जनता म अंग्रेजी सासन के विरुद्ध भीतरे- भीतर आगी सुलगत गिस । वो समय लाल-बाल-पाल के रूप म लाला लाजपतराय, लोकमान्य बालगंगाधर तिलक अउ विपिनचंद्र पाल के अब्बड़ सोर रिहिस । 1905 म बंगाल विभाजन ले ये चिंगारी ह आगी बन गे अउ जनता मन अंग्रेज़ी सासन बर बागी बनगे । सन 1907 मा कांग्रेस हा गरम दल अउ नरम दल के रूप मा विभाजन होगे।येकर असर छत्तीसगढ़ मा अब्बड़ पड़िस। हमर देश के नेता मन जनता ल समझाय लगिस कि अंग्रेजी सासन फूट डालव अउ राज करव के नीति ल अपना के शुरू ले सासन करत आवत हे अउ बंगाल के विभाजन येकर एक बड़का उदाहरण हे । देशभर म अंग्रेजी सासन के विरुद्ध वातावरण बनिस। अइसन बेरा म हमर छत्तीसगढ़ मा घलो असंतोष के चिंगारी सुलगत गिस। अइसन बेरा मा छत्तीसगढ़ मा गरम दल के नेता के रूप मा माधव राव सप्रे, पं. रविशंकर शुक्ल,दादा साहब खापर्डे, वामन राव लाखे, ई. राघवेन्द्र राव, हनुमान सिंह,लक्ष्मण राव उदगीरकर मन उभर के आगू आइस । येमन 1907 मा तात्यापारा हनुमान मंदिर के तीर जनसभा ला संबोधित करके विदेशी सामान मन के बहिष्कार अउ स्वदेशी सामान मन ला अपनाय बर समझाइस।

सन 1907 मा लोकमान्य बालगंगाधर तिलक हा बिलासपुर के यात्रा करिन।तिलक जी हा नागन्ना बाबू के घर रूकिस। 1907 म राजनांदगांव में ठाकुर  प्यारेलाल सिंह के  अगुवाई म देश के पहिली छात्र  हड़ताल होइस ।  ये हड़ताल लोकमान्य बालगंगाधर तिलक के गिरफ्तारी के विरोध मा स्टेट हाईस्कूल नांदगांव मा होय रिहिस । ठाकुर साहब अपन सहयोगी नंदलाल झा,छविराम चौबे अउ गज्जू लाल शर्मा के संग मिलके राजनांदगांव म राष्ट्रीय आंदोलन ल ठाहिल बनाइस । ये देश के छात्र मन के पहली हड़ताल माने जाथे। अइसन दौर म छत्तीसगढ़ के कांग्रेस सदस्य मन घलो गरम दल के नेता मन ले प्रभावित होके उंकर संग सामिल होगे ।  लोकमान्य बालगंगाधर तिलक हा जनवरी 1918 मा लखनऊ ले कलकत्ता जाय के समय रास्ता मा दुर्ग, रायपुर अउ बिलासपुर मा आमसभा ला संबोधित करिन । 1918 मा पं. सुंदर लाल शर्मा हा अछूतोद्धार  कार्यक्रम चलाइस। राजनांदगांव मा ये कारज पं. छविराम चौबे हा करिस।  अंग्रेजी शासन के काला कानून रोलेट एक्ट के विरोध मा रायपुर, बिलासपुर, रतनपुर, राजनांदगांव, राजिम मा  30 मार्च 1919 मा काला दिवस के रूप मा मनाय गिस । 30 मार्च 1919 मा रायपुर मा माधव राव सप्रे अउ राष्ट्र कवि माखन लाल चतुर्वेदी हा मध्य प्रांत हिंदी साहित्य सम्मेलन के आयोजन करिन जेकर उद्देश्य लोगन मा जनजागरण फैलाना रिहिस । सन 1920 मा रायपुर, दुर्ग, बिलासपुर मा जिला राजनीतिक सम्मेलन होइस । येमा रोलेट एक्ट अउ जलियांवाला बाग हत्याकांड के विरोध करे गिस ।


 हमर छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र के आदिवासी मन के जिनगी जल, जंगल अउ जमीन पर टिके हावे । आदिवासी मन अब्बड़ सिधवा रहिथे अउ अपन संस्कृति, संस्कार ला पालन करत सुघ्घर जिनगी बितात रहिथे पर जब कोनो उंकर स्वाभिमान ला ठेस पहुंचाथे ता वोमन डोमी करिया कस फूंफकारे ला लगथे ।  अपन सुरक्षा खातिर तीर कमान ले निसाना लगाय बर नइ चुके । अइसने निरंकुश राजशाही अउ अंग्रेज मन के गलत वन नीति के कारण बस्तर क्षेत्र मा सन 1910 मा विद्रोह होइस तेला भूमकाल विद्रोह के नांव ले जाने जाथे । रानी सुवर्ण कुंवर,लाल कलेन्द्र सिंह हा ये आंदोलन के अगुवाई करे के जिम्मेदारी नेतानार गांव के रहवइया नवजवान आदिवासी वीर गुंडाधूर ला सौंपिस। वीर गुंडाधूर बस्तर के स्वाभिमान के प्रतीक माने जाथे । नायक वीर गुंडाधूर ला अंग्रेजी शासन आखिरी तक नइ पकड़ पाइस । 

गांधी जी जब पहिली बार 20 दिसंबर 1920 मा छत्तीसगढ़ आइस त इहां के नेतामन के संगे-संग जनता मन म अब्बड़ उछाह छागे ।  गांधी जी संग मौलाना शौकत अली घलो आय रिहिन । गाधी जी रायपुर के गांधी चौक मा सभा ला संबोधन करके असहयोग आन्दोलन के महत्ता ला बताइस । छत्तीसगढ़ के नारी मन गांधी जी ला तिलक स्वराज फंड खातिर लगभग दो हजार रूपया के आभूषण भेंट करिन ।  गांधी जी धमतरी क्षेत्र के कंडेल नहर सत्याग्रह के सिलसिले म आय रिहिन । गांधी जी के छत्तीसगढ़ आय ले अंग्रेजी सासन म हड़कंप मचगे।कंडेल नहर सत्याग्रह के अगुवाई पं. सुंदर लाल शर्मा करिन अउ सहयोगी मन मा छोटे लाल श्रीवास्तव, नारायण राव मेघावाले, नत्थूजी जगताप सामिल रिहिन । येकर संबंध असहयोग आंदोलन ले रिहिस ।  गांधी जी के कंडेल जाय से पहिलीच अंग्रेजी सासन ह आंदोलनरत किसान अउ स्वतंत्रता संग्राम सेनानी मन के बात ल मान लिस।


छत्तीसगढ़ के प्रमुख शहर मन मा सन 1921 मा स्कूल कालेज के बहिष्कार करके राष्ट्रीय विद्यालय,  सत्याग्रह अउ असहयोग आश्रम खोले गिस । 12 मई 1921मा राष्ट्र कवि अउ कर्मवीर पत्रिका के संपादक माखन लाल चतुर्वेदी ला बिलासपुर मा अंग्रेजी शासन के विरुद्ध जमगरहा भाषण देय खातिर गिरफ्तार कर जेल भेज दे गिस । 5 जुलाई 1921 मा असहयोग आन्दोलन के समर्थन मा प्रचार प्रसार बर राष्ट्रीय नेता मन बिलासपुर पहुंचिस जेमा डा. राजेन्द्र प्रसाद,सी. राजगोपालाचारी अउ कवयित्री सुभद्रा कुमारी चौहान मन पहुंच के आम सभा ला संबोधित करिस। अइसने रायपुर मा गांधी चौक मा जमनालाल बजाज अउ मौलाना कुतुबुद्दीन हा जनता मन ला संबोधित करके उछाह बढ़ाइस। 


21 जनवरी 1922 मा धमतरी के सिहावा नगरी मा छत्तीसगढ़ के पहिली जंगल सत्याग्रह चालू होइस। अंग्रेजी शासन के गलत वन नीति, आदिवासी मजदूर मन के शोषण के विरोध मा येकर अगुवाई पं. सुंदर लाल शर्मा, छोटे लाल श्रीवास्तव, नारायण राव मेघावाले के संगे संग स्थानीय नेता शोभा राम साहू, श्याम लाल,बिसंभर पटेल मन करिन।  1924 में जब बीएनसी मिल के दुबारा हड़ताल चालू होइस तब ठाकुर प्यारेलाल सिंह ल जिला बदल कर दे गिस। राजनांदगांव ले निष्कासित करे के बाद सन 1925 म ठाकुर साहब रायपुर चले गे अउ अपन जिनगी के आखिरी तक ऊंहचे रहि के अपन राजनीतिक काम मन ल संचालन करत रिहिन।

26 जनवरी 1930 मा पुरा भारत वर्ष मा स्वाधीनता दिवस के रूप म मनाय गिस । गांधी जी देशवासी मन ले आह्वान कर चुके रिहिन कि स्थानीय समस्या ल लेके आंदोलन चालू करय । येकर असर पूरा छत्तीसगढ़ मा देखे ला मिलिस । 26 जनवरी 1930 मा पूरा देश जइसे छत्तीसगढ़ मा घलो प्रतिज्ञा दिवस मनाके पूर्ण स्वाधीनता के मांग दुहराय गिस । रायपुर, बिलासपुर, दुर्ग, राजनांदगांव, जांजगीर चांपा अउ आने जगह मा राष्ट्रीय झंडा फहराय गिस । गांधी जी द्वारा चलाय गे नमक कानून तोड़व आंदोलन छत्तीसगढ़ मा अब्बड़ जोर पकड़िस ।  

9 दिसंबर 1930 मा महासमुंद के तमोरा गांव मा जंगल सत्याग्रह के समय बालिका दयावती हा महिला मन संग जंगल गिस । महिला मन ला जब अनुविभागीय अधिकारी एम.पी. दुबे हा रोके के उदिम करिस ता बालिका दयावती हा वोला तमाचा मार दिस । 


 हमर छत्तीसगढ़ मा महात्मा गांधी के दूसरइया बार अवई  छुआछूत ला दूर करे के उद्देश्य ले 22 नवम्बर 1933 के होइस अउ हफ्ता भर रिहिन । ये समय गांधी जी संग मीराबेन, ठक्कर बापा, महादेव भाई देसाई मन आय रिहिन। गांधी जी के छत्तीसगढ़ दौरा ले इहां के राजनेता अउ आम मनखे मन मा स्वतंत्रता के प्रति जागृति भाव मा बढ़वार होइस। गांधी जी हा सबले पहिली दुर्ग पहुंच के मोती तरिया के पास एक बड़का सभा ला संबोधित करिन जेमा करीब 25 हजार लोगन मन गांधी जी के दरसन करे बर पहुंचिस । 18 जनवरी 1940 मा सरदार वल्लभ भाई पटेल हा रायपुर पहुंच के कार्यकर्ता मन मा जोश भरिस। 1938 मा छुईखदान मा समारू बरई अउ राजनांदगांव जिला के छुरिया, घोघरे, बापूटोला मा 3 जनवरी 1939 मा विद्या प्रसाद यादव अउ विश्वेश्वर प्रसाद यादव के अगुवाई मा जंगल सत्याग्रह होइस ।  राजनांदगांव म विद्रोही कवि कुंज बिहारी चौबे छात्र जीवन म अंग्रेज शासन के झंडा ल उतार के भारतीय झंडा फहरा दिस । येकर सेति वोला बेत ले अब्बड़ मारे गिस पर वोहा महात्मा गांधी के जय अउ भारत माता के जय कहत गिस ।  21 जनवरी 1939 मा राजनांदगांव जिला के छुरिया क्षेत्र मा जंगल सत्याग्रह चलिस जेमा बादराटोला गांव के आदिवासी युवक रामाधीन गोंड उपर गोली चला दे गिस जेमा वोहा शहीद होगे । इहां बुद्धू लाल साहू के अगुवाई मा अंग्रेजी शासन के गलत वन नीति के कारन जंगल सत्याग्रह चालू होय रिहिस । महात्मा गांधी के आह्वान मा 17 अक्टूबर 1940 मा देशभर मा व्यक्तिगत सत्याग्रह चालू होइस। ये समय छत्तीसगढ़ के बिलासपुर, रायपुर, दुर्ग, धमतरी मा स्थानीय कार्यकर्ता मन व्यक्तिगत सत्याग्रह ला सफल बनाइस।


1942 मा रायपुर षड्यंत्र केस इतिहास मा अमर होगे। छत्तीसगढ़ के भगत सिंह परस राम सोनी के अगुवाई मा विस्फोट सामग्री अउ बम बनाय के काम चलिस। परसराम सोनी के संगवारी मन मा गिरी लाल लोहार, सुधीर मुखर्जी, दशरथ लाल दुबे, प्रेमचंद वासनिक,क्रांति कुमार भारतीय, बिहारी चौबे  ,कुंज बिहारी चौबे,गोवर्धन राम, समर सिंह ,बहादुर , भूपेंद्रनाथ मुखर्जी, सुरेंद्रनाथ दास ,सीताराम शास्त्री, निखिल भूषण सूर अउ देविकांत झा सामिल रिहिन। परसराम सोनी ला सात बछर के सजा सुनाय गिस । 


 8 अगस्त 1942 मा बंबई मा आयोजित अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के बैठक मा छत्तीसगढ़ के राजनेता मन भाग लिस। गांधी जी हा 9 अगस्त 1942 ले भारत छोड़ो आंदोलन के चालू होय के घोषणा करिन। आंदोलन चालू होय ले पहिली गांधी जी सहित देश के सबो बड़का नेता मन ला अंग्रेजी शासन हा गिरफ्तार कर लिस। बंबई बैठक मा सामिल छत्तीसगढ़ के ग्यारह राजनेता मन ला घलो मलकापुर रेलवे स्टेशन ले गिरफ्तार करके नागपुर जेल मा बंद कर दे गिस। छत्तीसगढ़ मा भारत छोड़ो आंदोलन जोर पकड़ लिस । सबो जिला के स्थानीय नेता मन ला अंग्रेजी शासन गिरफ्तार कर लिस तब इहां के कार्यकर्ता अउ रहवासी मन आजादी के लड़ाई मा खुदे आगू आके आंदोलन ला सफल बनाइस । इहां के आजादी के सेनानी मन अंग्रेजी शासन ले जोम देके लड़िस । हमर छत्तीसगढ़ ले आजादी के लड़ाई म अपन योगदान देवइया मन म  शहीद गेंद सिंह,वीर नारायण सिंह, हनुमान सिंह, सुरेन्द्र साय, कल्याण सिंह,वीर गुंडाधूर, पं. सुंदर लाल शर्मा, पं. रविशंकर शुक्ल, माधव राव सप्रे, दादा साहब खापर्डे, डा. मुंजे, कुंज बिहारी अग्निहोत्री, शहीद रामाधीन गोंड, ठाकुर प्यारेलाल लाल सिंह, केदार नाथ ठाकुर, डा. ई. राघवेन्द्र राव, बैरिस्टर छेदी लाल, घनश्याम सिंह गुप्त, मुंशी अब्दुल रउफ मेहवी, वामन राव लाखे, नारायण राव मेधावाले, पं माखन लाल चतुर्वेदी, हरख राम सोम, विशंभर पटेल, पंचम सिंह सोम, शोभा राम साहू, शिवदास डागा, महंत लक्ष्मी नारायण दास, महंत नयन दास, कुंज बिहारी चौबे, यति यतन लाल, क्रांति कुमार भारतीय, डा. खूबचंद बघेल, डा. राधा बाई, बालिका दयावती, बाबू छोटे लाल श्रीवास्तव, राम प्रसाद देशमुख, शोभा राम साहू, बुद्ध लाल साहू, हीरा लाल सोनबोइर,नरसिंह प्रसाद अग्रवाल, वाय, व्ही. तामस्कर, रत्नाकर झा, रघुनंदन सिंगरौल, नत्थू जी जगताप, सेठ गोविंददास, पं. द्वारिका प्रसाद मिश्र, गयाचरण त्रिवेदी, राम गोपाल तिवारी, गजाधर साव, कालीचरण शुक्ल, गंगाधर प्रसाद चौबे, नंद कुमार दानी, आनंद राम गोंड, श्याम लाल गोंड, फिरतू राम गोंडा, मंगलू गोंड, शंकर राव गनौद वाले, बालक बलीराम आजाद, अवध राम सोनी, पं. मुरलीधर मिश्र, कैलाश चंद्र श्रीवास्तव, कन्हैया लाल सोनी, परस राम सोनी, सुधीर मुखर्जी, रामचंद्र, बल्देव प्रसाद मिश्र, गोवर्धन लाल श्रीवास्तव, सखा राम रूईकर, शिव लाल मास्टर, केलकर, हरि सिंह गौर, शंकर खरे, तुलसी प्रसाद मिश्रा, विश्राम दास बैरागी, विश्वेश्वर प्रसाद यादव, विद्या प्रसाद यादव, कन्हैया लाल अग्रवाल, दामोदर दास टावरी, पं. राम नारायण मिश्र हर्षल, समारू बरई, वली मोहम्मद, इंदु केंवट, अरिमर्दन गिरि, रामाधार दुबे, वासुदेव देवरस, शेख मुंतजीमुद्दीन, सी.एम. ठक्कर, बद्री प्रसाद साव, राम राव चिंचोलकर, राजू लाल शर्मा, छवि लाल चौबे, पं. विष्णु दत्त शुक्ल, असगर अली, सोमेश्वर शुक्ल,जमुना प्रसाद वर्मा, विद्याचरण वर्मा, कैलाश सक्सेना, अब्दुल कादिर सिद्दीकी, बल्देव सतनामी, याकूब अली, ठाकुर राम कृष्ण सिंह सहित आने नांव सामिल है.

 भारतीय मन के अंग्रेजी शासन ले अब्बड़ लड़ाई के बाद भारत 15 अगस्त 1947 मा आजाद होइस । बिरबिट करिया रतिहा के बाद नवां बिहान आइस । अंग्रेज मन के सैकड़ों बछर के गुलामी के बाद भारतमाता हा मुक्त होइस अउ ये प्रकार ले अब इहां के जनता मन खुद मालिक बनगे । भारत मा अब राजा महाराजा मन के शासन समाप्त होके जनता द्वारा निर्वाचित जनप्रतिनिधि मन के शासन चालू होइस। भारत के तरक्की के रद्दा खुलगे । अठहत्तर बछर मा हमर भारत अउ छत्तीसगढ़ के  सुघ्घर विकास होइस ।हम सब के कर्तव्य बनथे कि महापुरूष अउ सहीद मन के बताय रद्दा मा चल के देश के विकास मा योगदान देवन। 


भारत माता की जय । जय छत्तीसगढ़ । 


ओमप्रकाश साहू अंकुर

ग्राम व पोष्ट - सुरगी

जिला व तह. - राजनांदगॉंव छ.ग.

Thursday, 15 January 2026

छत्तीसगढ़ी के गद्य साहित्य ;नाटक

 

छत्तीसगढ़ी के गद्य साहित्य ;नाटक


     डॉ पीसी लाल यादव


कोनों भी भाषा के साहित्य होय गद्य ओखर पोठ विधा आय | जतके मह्त्तम पद्‌य के होथे, ओतके महत्तम गद्य के होथे। इही बात हमर माई भाषा छत्तीसगढ़ी बर घलो लागू होथे। छत्तीसगढ़ी गदय म जतके महत्तम कहानी अउ उपन्यास के हवय ओइसने महत्तम नाटक के घलो हवय । मोला तो अइसे लगथे के कहानी अउ उपन्यास ले जादा प्रभाव नाटक के परथे। काबर के कहानी अउ उपन्यास ल पढ़े जाथे , जबकि नाटक ला सुने के  संग-संग सऊँहत देखे घलो जाथे । येखरे सेती नाटक ल दृश्यश्रव्य केहे जाथे। येहा पाठक, श्रोता अउ दर्शक ला जादा प्रभावित करथे । संवाद, अभिनय के सेती नाटक के मंचन म सजीवता होथे । नाटक म गीत-संगीत अउ अभिनय के त्रिवेणी होथे। छत्तीसगढ़ी नाटक के इतिहास ल सौ-दू सौ साल म बांधना या ओला समेटना, मोला उचित नई लागय । येला जाने-समझे बर हमला लोक के सहारा लेना परही। ओ लोक, जेन हा श्रम परिहार बर, समुदाय के मनोरंजन बर, रात-रात भर नाचथे-गाथे, अपन दुख-पीरा ला अभिनय के माध्यम ले उद्‌गारथे । ओ आय छत्तीसगढ़ी नाचा, जेला नाचा-गम्मत घलो कहिथन । के हे जाय त नाचा लोक जीवन के दरपन आय। जेमा ओखर दुख-सुख, हास-परिहास, उछाह-उमंग, हांसी-रोआसी, दया-मया ,करुना, मीत-मितानी, भाईचारा जम्मो के दर्शन होथे | लोक जीवन के विसंगति नीत-अनीत येमा सब कुछ समाय रहिथे । एक बानगी देखव् – 


भांग मांगय चना रे संगी, गांजा मांगय घी । दारू मांगय जूता-चपाल, मन लगे तो पी ।। 


छत्तीसगढ़ नाटक के गढ़ आय। कोनों नई पतियाय त ओला रामगढ़ के प्राचीन नाट्‌य शाला ल जा के देखना चाही। जेन ह ईसा पूर्व तीसरी शताब्दी के आय, जिहाँ कालीदास के मेघदूत के रचना होय हे। अउ येहा दुनिया भर के सबले जुन्ना नाट्य शाला आय | अइसन विद्‌वान मन  कहिथे। जब हमर छत्तीसगढ़ में अतका  जुन्नबी नाट्य शाला हे ,त का इहाँ के मनखे नाचत -कुदत नई रिहिन होहीं ? नाच-कूद के अपन मनोरंजन नई करत रिहिन होहीं । ये हा गुने के बात आय। ये बात जरूर हे के तब नाटक या नाचा के कोनों लिखित रूप नई रिहिस, भलुक ओहा वाचिक परम्परा पीढ़ी-दर-पीढ़ी समय के अनुसार लोक कंठ म समाय रिहिस। ओखर प्रत्यक्ष प्रमाण हे आज के हमर लोक नाट्य ‘नाचा' जेन हा आज भी वाचिक परम्परा ले जनमानस के मनोरंजन के साधन बने हे । जन-चेतना के माध्यम बने हे | जेमा स्त्री पात्र के भूमिका पुरुष मन निभाथे । इही लोक रूप में जऊन आदिकाल से चले आवत हे । जेमा शोषित, दलित,पीड़ित के स्वर मुखर होथे |


अइसने छत्तीसगढ़ी लोकनाट्य के दूसर रूप हे ‘रहस’ | रहस धार्मिक अनुष्ठानिक आयोजन ये, जेखर कथा कृष्ण लीला ऊपर आधारित होथे। येखर संवाद लिखित रूप  में होथे अउ येखर आधार आय बाबूवा का राम लिखित गुटका । रहस ला रास लीला घलो केहे जाथे | कृष्ण लीला के बाद  ईही मंच में जेन ला बेड़ा केहे जाथे , जिहाँ श्री कृष्ण लीला से संबंधित मूर्ति मन के स्थापना होय, रहिथे तेमा ‘छैला नाच’ के घलो प्रदर्शन होथे। येहा नाचाच आय जेमा  गम्मत देखाय जाथे। छैला नाचा के कोनों स्क्रीप्ट नई होय । नाचा के खड़े साज, देवारिन साज, अउ अब बइठक साज छत्तीसगढ़ी नाटक के आदि रूप, प्रारंभिक स्वरूप आय । पंडवानी, चंदैनी, भरथरी गायन मा घलो अब नाट्य तत्व माने अभिनय के दर्शन होथे ,जेन हा छत्तीसगढ़ी नाटक के महत्तम ला उजागर करथे। बस्तर उड़ीसा ले लगे सीमांचल म भतरा नाच के चलन हे । जेमा मुखौटा के उप‌योग करे जाथे | येहूँ ह नाटक के आदि रूप के गवाही हे | तब जुन्ना समय म  शिक्षा के प्रचार –प्रसार नई रिहिस, लोगन पढ़े-लिखे नई रिहिन, तभो नाटक ह वाचिक रूप में लोगन के मनोरंजन के संगे संग लोक चेतना के माध्यम बने रिहिस। ये मन छत्तीसगढ़ी लोकनाट्य के वाचिक रूप आय, जऊन हा आजो चलत हे । नाचा ह अंग्रेजन के खिलाफ स्वतंत्रता के शंखनाद करिस |  ऊँखर जोर-जुलुम बर अवाज उठइस । अजादी बर लोगन ल जगइस  - 


भागेल ल हरथे ग मोंरो, भागे ल हरथे ना आये हे बिदेसी सगा, भागे ल हरथे ना ।      अंग्रेजन मन बिदेसी सगा ये , जेन मन हमर भाग माने हमर आजादी ला हर ले हे। अइसन भाव हे येमा । आजादी के बाद जइसे-जइसे शिक्षा के प्रचार-प्रसार होइस, लोगन जागरुक बनिन, तब छत्तीसगढ़ी नाटक के लोक रूप, वाचिक परम्परा ह घलो लिखित रूप मा अइस । राष्ट्रीय चेतना के संचार होइस । तब जागरूक सियान साहित्यकार मन समाज ल जगाय बर, अशिक्षा, अंधविश्वास के अंधियार ल मेटाय बर नाटक के रचना करिन । काबर के नाटक लोगन ल जादा प्रभावित करथे । कान के सुनई अउ आँखी के देखई दूनों संगे - संगे होय ले हिरदे में येखर जादा प्रभाव परथे। अउ मनखे चेतलग होथे। परंपरा ले हट के आधुनिक भाव बोध वाले नाटक के लेखन अउ मंचन होय लगिस | सन् 1‌904 में पंडित लोचन प्रसाद पाण्डेय लिखित नाटक 'कलिकाल' ल छत्तीसगढ़ी के पहिली नाटक माने जाथे। इही समय में पंडित शुकलाल पाण्डेय रचित नाटक ‘केकरा घरैया’ अउ ‘खीरा चोट्टा’ घलो प्रसिद्ध होइस | जेमा छत्तीसगढ़ी लोक जीवन अउ लोक संस्कृति के चित्रण हे । दूनों नाटक(एकांकी) शिक्षाप्रद अउ हँसी-मजाक से भरपूर मनोरंजक रिहिस। ये बेरा के नाटक में मनोरंजन के संग-संग लोकचेतना, समाज सुधार अउ स्वतंत्रता के भाव मुखर होइस ।


सन् 1948 में पंडित मुरलीधर पांडेय ह ‘विस्वास' नाटक के रचना करिन, जउन ह  30 अगस्त 1948 के ‘छत्तीसगढ़ केशरी' म छपिस । एमा बलि प्रथा के विरोध अउ सामाजिक चेतना के गोठ रिहिस। ये बेरा में धार्मिक भाव ले ओत-प्रोत 'छत्तीसगढ़ी राम चरित नाटक' श्री उदय राम जी ह 1963 म लिखिन | डॉ० रामलाल कश्यप जी ह ‘श्री कृष्णार्जुन युद्ध’ 1965 म लिखिन । श्री  रामकृष्ण लाल अग्रवाल के नाटक ‘गॅवई के अंजोर’ घलो उल्लेखनीय हे । छत्तीसग‌ढ़ी जन जागरण के अग्रदूत, छत्तीसगढ़ी माटी के सपूत समाज सुधारक डॉ खूबचंद बघेल के साहित्यिक अवदान ल कभू नई भुलाय जा सके। ऊँखर लिखे नाटक, ‘ऊँच अउ नीच’, ‘करम छड़हा’, ‘जनरैल सिंह’, ‘बेटवा बिहाव’ अउ 'किसान के करलई’ मन मील के पखरा साबित होईन। ‘ऊँच अउ नीच’ नाटक हरिजन उध्दार के दृष्टि से गांधी जी के सन 1933 के आगमन अउ अनंत राम बरछिहा द्वारा अपन गाँव के हरिजन भाई मन के हजामत बनाय के घटना ले संबंधित हे | उहें जन्‌रैल सिंह ह देशप्रेम अउ छतीसगढ़ प्रेम ले सराबोर हे । ये नाटक के मंचन ले छत्तीसगढ़ के आत्म सम्मान अउ देश के गौरव गरिमा, सीमा के रक्षा कइसे कर सकत हन | ये संदेश मिलिस | ‘बासी महात्म्य' इही म समाहित हे |        गजब विटामिन भरे हवय जी, छत्तीसगढ़ के बासी में        धान-उन्हारी उपजायेन जी , हम कम्हार मटासी में । 


हे किसान में गुन सेवा जस, संत अमर सन्यासी में | 


नंदिया जल विरमल जइसे, चंदा हर पूरन मासी में | 


छत्तीसगढ़ बर गजब मया हे, हर छत्तीसगढ़ वासी में। 


वीर नारायण सिंह देश बर ,चढ़गे हाँसत फांसी में || सन् 1963 में टिकेन्द्र टिकरिहा के नाटक ‘साहूकार से छुटकारा’ अउ सर्वनाश, फंदी घलो महत्वपूर्ण नाटक ये | ‘साहूकार से छुटकारा'  साहूकार मन के शोषण ल उजागर करथे । दुर्ग निवासी श्री ग‌जाधर प्रसाद रजक के ‘बांटा’, बाबू लाल सिरिया के 'महासती बिंदारमती’ | धमधा निवासी बंगाली प्रसाद ताम्रकार के 'मसाल के जोन’, डॉ महेंद्र कश्यय राही के 'गांधी अउ गंगा के देश में घलो छत्तीसगढ़ी के महत्वपूर्ण नाटक आय | श्री नंदकिशोर तिवारी  द्वारा रचित नाटक ‘परेमा’ के अपन अलग चिन्हारी हे, जेखर प्रसारण आकाशवाणी रायपुर ले बेरा-बेरा म होवत रहिथे । येमा पांच नाटक ‘बंटवारा’, नई जानन का चीज, लुकाय जेमा सब्बो बीज’  रंग सा एक’, ‘महारसिया’, ‘परेमा’ के संकलन हे। श्री नंदकिशोर तिवारी जी के एक अउ नाटक “रानी दाई डभरा के” बहुत प्रसिद्ध होईस। डॉ योगेन्द्र चौबे के निर्देशन ये नाटक के कतको प्रभावी मंचन होय हे। ‘अहिमन कैना’,’नारद मोह’,'उरुभंगम’, ‘मोर कुंआ गँवागे’ घलो इंखर चर्चित नाटक आय । सन् 1977 में प्रकाशित श्री नारायण लाल परमार रचित ‘मतवार’ अउ दूसर एकांकी’ घलो बड़ प्रसिध्द होइस । श्री लखन‌लाल गुप्त के नाटक 'बेटी के मनसूबा' , 'वर के खोज’,अउ ‘नवा बिहान’ 'हार-जीत' एकांकी मन घलो नाटक के रूप आय।‘महाकवि कपिलनाथ कश्यप छत्तीसगढ़ी साहित्य के पुरोधा आँय । ऊँखर एकांकी नाटक ‘अधियारी रात’ (1992), ‘नवा बिहान' (1994), ‘गोहार’ (1994), ‘पूजा के फूल’ (1997), 'पापी पेट' (1997), ‘गुराँवट बिहाव’ (1998) प्रसिद्ध हे । सन् 1998 में डॉ. परदेशी राम वर्मा रचित नाटक ‘मैं बइला नौहव' तो साक्षरता कला जत्था मंच के माध्यम ले शिक्षा के अलख जगइस । ये संग्रह में क्रमशः मैं बइला नो हंव’, ‘टोटका के फोटका’, ‘लोकवा’, ‘भांवर',‘जनौला', 'जॉगर’ अउ ‘बिदाई' एकांकी मन के जोर न हे | श्री विश्वेन्द्र ठाकुर के नाटक ‘जवाहर बंडी’ (1996), 'घुरुवा के दिन बहुरगे’, ‘राजिम’, श्री श्यामलाल चतुर्वेदी के  'मया के मोटरी’ एमन छत्तीसगढ़ी नाट्य लेखन ल नवा दिशा दिन । बेरा बदलथे अउ सब ला अपन रंग म  रंग लेथे। साहित्य बर घलो ये बात लागू होथे | त भला नाटक ह कइसे छूटही ? पारंपरिक नाटक के स्थान म नवा लेखन, नवा प्रयोग शुरू होईस अउ नाटक के तेवर घलो बद‌लिस । डॉ. सुरेन्द्र दुबे के नाटक ‘पीरा' एखर बढ़िया उदाहरण ये । डॉ. जीवन यदु के गीत नाट्य "अइसने च रात पहाही, संतोष कुमार चौबे के ‘ठोमहा भर चाउर’ शंकुतला तरार के ‘चूरी' ,रघुबर सिंह चंद्राकर के "पटवारी” के परपंच’, ‘मुड़ पेलवा’ , ‘गुड़ी के गोठ’, डॉ योगेन्द्र चौबे के ‘बाबा पाखंडी’,'रानी दाई’, अजय आठले के ‘बकासुर’ | लोकनाथ साहू ललकार के ‘रंग विहार’, घनश्याम साहू के 'अघनिया’, नकुल जायसवाल के ‘सबास बेटी’, ‘गुरांवट’, 'मोरो मन करथे'। रामनाथ साहू के नाटक ‘जागे-जागे सुतिहा गो’, ‘हरदी पीयंर झांगा-पागा’ अउ ‘बिलासा, अरपा के बेटी’ छत्तीसगढ़िया लोकजीवन के दरपन आय । अभी डॉ पीसी लाल यादव के छत्तीसगढ़ी लोक नाट्य" नाचा के मूल पाठ छपे हे तेनो संहराय के लइक हे | श्री दुर्गा प्रसाद पारकर के नाटक ‘चिन्हारी', शिवनाथ, ‘सुकवा’, ‘चंदा’, ‘सुग्घर गाँव’ अउ ‘ सुराजी गाँव’ नवा लिखइया मन ला प्रेरणा देवत नाटक आंय |


सन् 1971 में दुर्ग जिला के गाँव बघेरा ले कला-संस्कृति के क्षेत्र म नवा अंजोर बगरिस । जब दाऊ रामचंद्र देशमुख जी ह चंदैनी-गोंदा के सिरजन करिन | छत्तीसगढ़ी गीत-संगीत के संगे-संग नाटक ल घलो नवा दिशा मिलिस । दाऊ रामचंद देशमुख जी ह नाचा कलाकार मन ला संगठित करके छत्तीसगढ़ देहाती कला विकास मंडल के माध्यम ले नाटक के क्षेत्र म नवा उदिम करिन । ये बात सन् 1953 के आय । पाछु चंदैनी गोंदा म गीत नाट्य के माध्यम ले 'पूजा के फूल’, ‘एक रात का स्त्रीराज' ‘देवार डेरा' अउ कारी नाटक के मंचन करिन, जेन बड़ लोकप्रिय होइस । उही बेरा म हबीब तनवीर जी मन नाचा कलाकार मन ल लेके नवा थियेटर के माध्यम से छत्तीसगढ़ी नाटक में नवा प्रयोग करिन । ‘चरनदास चोर’ नाटक के दुनिया भर म खूब शोर होइस। अइ सनेहे ‘मोर नाँव दमाद, गाँव के नांव ससुरार’, ‘बहादुर कलारिन’ अउ ‘आगरा बजार’ जइसे लोकप्रिय नाटक के मंचन करिन, तब  दुनिया भर म नाचा के डंका बाजे लगिस । ये हा छत्तीसगढ़ी नाटक के स्वर्णिम काल आय । चंदैनी गोंदा के प्रेरणा ले दाऊ महासिंह चंद्राकर ह,डॉ नरेन्द्र देव वर्मा के उपन्यास के नाट्य रूपांतरण ‘सोनहा बिहान’ के सिरजन करिन । येहू खूब लोकप्रिय होइस । फेर पाछु येमन चिंता दास बंजारे चंदैनी लोक गायक के गाथा ऊपर “लोरिक-चंदा" नाटक के निर्माण करिन, तेखर बाद ‘गौरी’ नाटक के घलो मंचन करिन। प्रेम साइमन के लिखे नाटक घर कहाँ हे ? के बाते निराला रिहिस। छत्तीसगढ़ी नाटक के निर्देशन में रामह्रदय तिवारी जी के नाव ल नई भुलाय जा सके। लक्ष्मण चंद्राकर के 'हरेली’, दीपक चंद्राकर के ‘गम्मतिहा’, राकेश तिवारी के ‘दसमत कैना’, ‘राजा फोकलवा’, मिर्जा मसूद के ‘सैंया भए कोतवाल’, चंद्रशेखर चकोर के चंदैनी शैली के नाटक ‘टेकहा राजा’, ‘खोखन खल्लू’, रामशरण वैष्णव के “बुढ़वा बिहाव”, डॉ.पीसी लाल यादव के “अक्कल बड़े के भईस”, “हवलदार हरिराम”, “भोला भगवान” छत्तीसगढ़ी नाटक मन आज घला ओतके लोक प्रिय हे । भूपेंद्र साहू के नाटक भरथरी म परम्परा के संग आधुनिक मंची प्रभाव दर्शक मन ल भावविभोर कर देथे | छत्तीसगढ़ी म नाटक के लेखन बहुत होय हे | फेर ओखर मंचन ओतका नई हो पाय हे | जबकि मंचन बहुत जरुरी हे । एक बात संहराय के लईक हे के आकाशवाणी रायपुर ह बहुत अकन छत्तीसगढ़ी नाटक मन के प्रसारण करे हे, जेन ह बहुत ही प्रभावी बने हे । सुग्घर संगीत अउ सारथक संवाद ले ये नाटक मन मन म उतर जथे । बजेन्द्र बैद्ध , किशन गंगेले, लखन लाल परगनिहा, लाल रामकुमार सिंह, मिर्जा मसूद, मोहन सी रामानी, राजेश फाये , समीर शुक्ल, विष्णु प्रसाद साहू अउ याद राम पटेल के निर्देशन में प्रसारित ये नाटक मन छत्तीसगढ़ी नाट्य साहित्य के बड़ उपलब्धि आय । प्रसारित नाटक मन ये प्रकार हे-  आँखी के टोपा लेखक बजेन्द्र बैद्ध, चना बूट- राजेश गनौद वाले , मोला गुरु बनई लेते – डॉ.नरेन्द्र देव वर्मा, अपन गाँव अपन छाँव - विष्णु प्रसाद साहू, अप्पड़-जीवनदास मानिकपुरी, बरत-रक्सा - आदित्य नारायण सिंह, गियान अउ धियान - तपस्विनी साहू, गुरु बाँटा -राकेश साहू, कुंआ के मेचका - राजेश रंगारे, मतवार-आशीष सेन्द्रे, नई जानन - नंदकिशोर तिवारी, पंच परमेश्वर - जीवन यदु, पाँचवाँ हड़िया-पुष्पलता वर्मा ,परेमा - नंद‌किशोर तिवारी, अंजोर- खेमप्रसाद शर्मा, अंजोर - सुरेश कुमार दुबे, गिदरी- उर्मिला देवी ताम्रकार, गुंरावट - नकुल जायसवाल, हंसा नियाँव-जीवन यदु, जंगल मा आगी- पुनऊ sराम साहू, लछनी - राकेश तिवारी, लकड़‌हारा के किस्सा- खोमप्रसाद शर्मा, मन-चलहा-पुनऊ राम साहू, नवा बिहान के अंजोर- पुष्पलता वर्मा , नवा जिनगी नवा रद्दा – खोमप्रसाद शर्मा, पुरखौती- पुष्पलता वर्मा, पूत-सपूत - प्रेम साइमन, सोनाखान - सुशील यदु , रतिहा पहागे- सुरेखा कश्यप, सठियाय उमर - आशीष सेन्द्रे, सोन के खिनवा- माँघी लाल यादव, ठग ले बड़े जग - माँघी लाल यादव, भरथरी - प्रेम साइमन, हंडा-पुष्पलता वर्मा, अहा रे चहा (झलकी) – रामेश्वर वैष्णव , भरम - निवेदिता सिंह, दूध दाई, भीष्म देव चतुर्वेदी, लक्ष्मण रेखा - निवेदिता सिंह, मनबोध - पुष्पेन्द्र सिंह, पीरा - भीष्मदेव चतुर्वेदी, सुंता सलाह -दीनदयाल साहू, भरम- सुरेश वर्मा, अंजार - भीष्मदेव चतुर्वेदी, कुलवंतीन- रविशंकर दुबे |


इंखर अलावा अउ कतकोन छतीसगढ़ी नाटक हे, जउन छत्तीसगढ़ी वेब साइट मन म हे। श्री संजीव तिवारी दुर्ग के मुताबिक ऊँखर वेबसाइट "गुरतुर गोठ" डाट काम में सीताराम पटेल के लगभग 20-25 छत्तीसगढ़ी नाटक संग्रहित हे । जऊन ऊँखर स्वयं के लिखे अउ कतको हिन्दी के बड़े कथाकार मन के कहानी के नाट्य रूपांतर आय । जइसे विष्णु सखाराम खांडेकर के एकांकी शांति के नाट्य रूपांतरण | जयशंकर प्रसाद के कहानी पुरस्कार के नाट्‌य रूपांतरण बिरहा के आगी । फणीश्वर नाथ रेनु के कहानी नित्य लीला ल किसना के लीला नांव से | आजाद परिन्दे के रुपांतरण चिरई-चिरगुन नांव से । लाल पान की बेगम के रूपांतरण पान के मेम के नांव से | सिरी पंचमी के सगुन ठेस कहानी के नाट्य रूपांतरण ठेंसा नांव ल करे गे हे | इंखर छोड़ अउ कतकोन अउ नाटककार मन छूटगे होही ऊँखर से मैं क्षमा चाहत हंव । मोर जतका जानकारी होइस, मैं ओतके भर ला सरेख पाये हंव | 


ये तरहा से देखे जाय तो छत्तीसगढ़ी गद्य साहित्य में नाटक के बड़ सुग्घर स्थान हे । परंपरा ले लेके आधुनिक रंगमंच तक देखे जाय त नाटक के क्षेत्र में लेखन सरलग चलत हे। फेर अतके म संतोष करना जड़ता होही । हमला समय ला देख के समय के संग चले ला लगही । नाटक के क्षेत्र में होवत प्रयोग अउ नवाचार ल अपनाय ल लगही। समाज के विसंगति ऊपर लेखनी ल चलाय ल परही। जिनगी के सुख-दुख, जय-पराजय, दया-मया, समता –सद्भाव ,भाईचारा के बढ़‌वार बर, मनखेपन के रखवार बने ला परही। नवा पीढ़ी ले तो अउ जादा उमेंद हे के ओमन नाटक लेखन ले हमर छत्तीसगढ़ी साहित्य के ढोली –ढाबा ल छलकत ले भरंय |  


     डॉ. पीसी लाल यादव


      ‘‘साहित्य कुटीर‘‘


  गंडई-पंड़रिया, जिला खैरागढ़-छुईखदान-गंडई (छ.ग.) 


      मो. नं. 9424113122


Email – pisilalyadav55@gmail.com






छत्तीसगढ़ी व्यंग्य बाबा बिल्होरन दास

 छत्तीसगढ़ी व्यंग्य

बाबा बिल्होरन दास

वीरेन्द्र सरल

पहिली हमर देश ह कृषि प्रधान रिहिस अब बाबा प्रधान होंगे हावे। कहे कि मतलब है कि बाबा मन अब काबा होगे हे। अधर्मानन्द ले लेके निशर्मानन्द तक किसम - किसम के बाबा नेता के मतदाता के चक्कर लगाय बरोबर हमर चारो कोती चक्कर लगावत है। खांस- खखार के थूंके के पहिली घला बने चेत लगा कि आजु-बाजू ल देखना पड़थे, डर लागथे कहूँ थूकत बेर भोरहा म कोन्हों बाबा उप्पर झन पड़ जाय नहीं ते कोन्हों तपस्या करत बाबा  कहूँ गुसियाके श्राप  दे  दिही तब गड़बड़ हो जही। खने- कोड़े के बेर घला ध्यान रखना पड़थे कि कोन्हों बाबा ह भुइयां भीतरी समाधि लगा के झन बइठे रहय। मुख्य रूप ले बाबा मन के दु ठन बुता होथे। पहिली प्रवचन झाड़ना अउ दूसर दक्षिणा के हिसाब ले आशीर्वाद देना।

 एक दिन एक झन संगवारी ह बतावत रिहिस कि बाबा बिल्होरन दास ह दक्षिणा तो जमा के लिस फेर मोला सस्ता वाला आशीर्वाद थमा दिस तइसे लागथे। वोहा आशीर्वाद देवत कहे रिहिस की जा तोर घर अन्न-जल गौ लक्ष्मी के भंडार भरही फेर आज ले मोर घर अन्न धन तो नई आइस बल्कि धरे रहेंव तहू धन ह ओला दक्षिणा देवय म सिरागे। बाबा बिल्होरन दास के नावेच ह बड़ा गजब के हे। उंखरे संग भेंट कर के आशीर्वाद बिसाय के मोरो मन होय लगिस।

मैं अपन संगवारी ल कहेंव-" संगी अभी तक किसम- किसम के बाबा मन के नाव सुनत रहेव फेर बाबा बिल्होरन दास के नाव पहली बार सुनत हंव, नवा- नवा उद्गरे हे का?"

संगवारी बताइस -"नहीं वो तो सीनियर बाबा आय। बाबागिरी के मैदान के जुन्ना खिलाड़ी । अपन गोठ-बात म अपन भक्त मन ल अइसे बिल्होर देथे की भक्त ह कंगला हो जथे अउ ओला पता घला नई चलय। जब तक भक्त ल पता चलते तब तक बाबा अंतर्ध्यान हो जथे। अउ ओखर जूनियर बाबा मरखण्डा नन्द के तो बातेच मत पूछ। भक्त के भूत अउ वर्तमान के बात ल सऊंहत बता देथे। भविष्य के बात ल अपन मन रखथे जउन उंखर भक्त मन ल उंखर अंतर्धान होय के बाद पता चलथे। बाबा मरखण्डा नन्द ह जउन बात ल बताथे ओला कले चुप सुने के आय। जादा आंय-तांय पूछबे तब खींच के लताड़ा चमकाथे।"

 संगवारी के गोठ ल सुनके मैं मन में गुनेव, यह बइ हागे हे तइसे लागथे ? तभे अन्ते-तन्ते गोठियात हे? ये बाबा मन के गोठ गोठियावत धुन चिटफंड कंपनी वाले मन के?

 एक तो ये बाबा मन के नावेच ल उटपटांग बताथे अउ दूसर लताड़ा- छताड़ा के बात घला करथे। अब तो बाबा मरखण्डा नन्द के दर्शन करके उंखर आशीर्वाद पाय के शौक महुँ ल चर्रागे।

 एक दिन के बात आय। अपन फटफटी म मैं गांव जावत रहेंव। एक ठन बड़का गांव के चौक म पहुँचेव तब देखथव कि मनमाने भीड़ सकलाय रहय। भीड़ ह गोल खड़े रहय अउ भीतरी ले नदिया बइला बुगबुग - बुगबुग कहिके आवाज आवत रहय। महुँ फटफटी ले उतर के भीड़ के तीर म पहुँचेंव। अउ एड़ी ऊँचाके देखे लगेंव। नदिया बइला के गोसान ह चिन्हे- जाने असन लगिस। रब ले सुरता आगे, ये तो अपन पड़ोसी गांव के बैल कोचिया बुधारू आय।

 कोचियाई म पहिली पैसा तो बहुत कमाय रिहिस फेर सब ला मन्द-मउहाँ, जुआ - ताश म फूँक घला डारे रिहिस। येखर मेर एक ठन फुटहा ढोल, जुन्ना चिमटा अउ एक ठन बूड़गा बइला भर बाचे रिहिस, ये कब ले बाबागिरी विभाग म  पोस्टिंग पा गे हावे भाई ? बाबागिरी में तो मनमाने पैसा झोरत हे बुधारू कका ह।

 मैहा जोर से चिचिया परेंव- बुधारू कका। वोहा मोर कोती नल देखिस, तीर म आइस अउ मोल समझावत किहिस-" तोला भोरहा होवत हे बच्चा। मैहा बुधारू कका नो हंव। मैहा बाबा बिल्होरन दास  अउ ये मोर चेला बाबा मरखण्डा नन्द आय, स उँहत नन्दी के अवतार आय। तैहा नई पतियावस तब देख मैहा जउन पुछहुँ तेखर जवाब ये मोर चेला ह दिही। बाबा ह पूछिस बोल चेला -" ये सब भक्त मन के गरीबी ह दूर होही या नहीं, मंहगाई कम होही या नहीं, बेरोजगार भगत मन ल रोजगार मिलहि की नहीं?

 बाबा के सवाल सुनके चेला ह हंव कहिके अपन मुड़ीं ल डोलावय। ताहन भीड़ ह मनमाने थपड़ी पिटय अउ पैसा चढ़ावय। जउन ज्यादा पैसा चढ़ावय ओला बाबा मरखन्दा नन्द ह जादा आशीर्वाद देवय। आशीर्वाद के लालच म दस रुपए के नोट निकाल के मैहा बाबा मरखण्डा नन्द के आघू म खड़े हो पारेंव। दस के नोट ल देख के वोहा मोर बर बगियागे अउ हुमेले बर दौड़ गे। मैहा डर के मारे ओखर पाछू कोती जा के पूछ पारेंव-" देश के गरीबी अउ महंगाई कब दूर होही बाबा?'

 बाबा मरखण्डा नन्द मोला  लताड़ा जमा दिस। मोर थोथना ह फुटगे। मैहा अपन मुड़ी ल धरके सोचत रही गेंव , बाबा ल सही बात पुछबे तब लताड़ा जमा थे तइसे लागथे ददा।  अब येला मरखण्डा नन्द कहंव कि लटारा नन्द । जय हो बाबा मरखण्डा नन्द। क्षमा करबे ददा।

 वीरेन्द्र सरल

ग्राम-बोड़रा ( मगरलोड ) 

पोष्ट - भोथीडीह

व्हाया-मगरलोड

जिला-धमतरी ( छत्तीसगढ़)

चंदा

 चंदा


चंदा के नाम सुनके मन म हिलोर मारथे। अऊ मनके भार्री भांठा ह लहलहा उठथे । ऐकर उलटा कोनो ल चंदवा कही देबे त भांठा के पेरावठ म आगी जरे कस लागथे। काबर की चंदवा मन के मुड़ी अधियारी पाख के तीज, चऊत के चांद कस दिखथे।


चंदा के नाम सुनबे तेमे अइसे लागये मानो पूरा सर्व गुण सम्पन्न होही। फेर ओकर  असलियत तो पाख के एम्कम, दूज तीज के पता चलथे ।चंदा ल कहिबे त सिरिफ अऊ सिरिक अंधियारी पाख के पून्नी के चंदा ह  दगदग ले लागथे। कतनो मनखे मन पून्नीपूनवास बर मेला मड़ई म नहाखोर के पूजा-पाठ दानपून घलो करथे। 


ये बात धलो सिरतोन आय चंदा हर सबो मनखे ल नई मिले। सकल सुरत सुभाव ल देख के मिलथे ।एक ठन चंदा दानपुन वाले घलो होथे।कोनो समाजिक, सामुहिक काम, कारज बर चंदा लागबे करथे ।चंदा मंगई धूलो अड़बड़ हिम्मत के काम आय। ये कोनो जंग (लड्ई) लड़े ले कम नोहे। चंदा मांगे बर बहुत बड़े करेजा चाही। जइसे माइनस डिगरी म देश के रक्षा करना ।चंदा देवईया मन घलो दुश्मन ले कम नी राहय । भले चंदा दस, बीस रुपया ल दीही फेर सुनाही अतिक ठाढ़े-ठाड़ सुखा जबे । अइसे लागथे दुबारा ओकर डेरोठी म गोड़ ती राखतेव ।अऊ मुख नी देखतेंव।अऊ अइसने मन डिमांड ल घलो बड़े बड़े नाचाकूदा के करथे।अऊ कहीं भणडारा होगे त अइसन मनके घर के चूल्हा ह उपवास घलो रहिथे।

चंदा के असली मजा ल राजनीतिक पारटी वाले मन उठाथे।मानो आरबीआई हर नोट छापे के ठेका इही मन दे देहे। चुनावी चंदा मतलब हरहा गोल्लर।जिनगी के संग जिनगी के बाद।सब चीज म छुट।ते हर कोनो ईनाम जीत जबे तेमे टैक्स,फेर ऐमन टैक्स फीरी रहिथे।इंखरो सोंचना ठीक हे। जनता ल सब फीरी दे सकथे त एकात ठन फीरी यहू मन ल मिलना चाही।हमन दस बीस चंदा बर तरसथन ऐमन ल करोड़ों मिल जथे।इही सकल सुरत के कमाल आय।विमल दाना दाना म केसर के सुवाद?


         कतनो मनखे मन के काम चंदा म चलथे। कतनो मनखे मन चंदा के पईसा ल पूड़ी ल चपका म चमकथे तईसे चपक ( दबा) दबा देथे। भले देवी देवता के राहय चाहे धारमिक काम कारज के।ददा लगे न भईया सबले बड़े रुपईया।

        कहां राजा भोज अऊ कहां गंगू तेली।एक झन बुधियार साहित्यकार हर सोसल मिडिया म लिखे राहय साहित्यिक कार्यक्रम बर चंदा ज़ोन ज़ोन मन देना चाहत हे नगद नही ते फोन पे कर सकत हे।ये हर उंखर बर गरिबी म आंटा गीला कस आय।चाहे गोष्ठी म जाय बर होय चाहे कराय बर। ये बुद्धिजीवी मन ल न थूंकत बने न लिलत। भले घर के सुवारी लईका मन झंझेट राहय।बिचारा मन बड़ दिलवाला रहिथे।मंच म स्वांत:सुखाय बोलेबर नी छोड़े।

     कहिथे जब -जब देश के राजनीति लड़खड़ाथे तब तब साहित्यकार ह उठाथे।फेर साहित्यकार -------------।

हाय मोर चंदा?

         

 *फकीर प्रसाद साहू* 

       *फक्कड़*

          सुरगी 🙏

छत्तीसगढ़ी म गद्य साहित्य (व्यंग्य) वीरेन्द्र सरल

 छत्तीसगढ़ी म गद्य साहित्य (व्यंग्य)

वीरेन्द्र सरल

 छत्तीसगढ़ी म व्यंग्य ये विषय म चर्चा करे के पहली हमला व्यंग्य काय हरे? व्यंग्य काखर ऊपर अउ कइसे करे जाथे ?  व्यंग्य के उद्देश्य काय हरे ? येला बहुत गम्भीरता ले समझे के जरूरत हे । तब आवव सबले पहली व्यंग्य के स्वरूप ल समझे के कोशिश करथन।

 व्यंग्य के बड़े - बड़े विद्वान मन येला अपन - अपन ढंग ले परिभाषित करे हावे। व्यंग्य ल प्रतिरोध के स्वर माने जाथे। व्यंग्य हमेशा विपक्ष के भूमिका निभाथे। एक झन विद्वान ह व्यंग्य ल सार्थक हस्तक्षेप के लोकतांत्रिक अधिकार कहे हे। व्यंग्य सदैव आम आदमी के पीड़ा ल स्वर देथे। सत्ता चाहे राजनीतिक हो, धार्मिक हो, सामाजिक हो चाहे अउ आने प्रकार के हो यदि ओखर काम मानव या मानवता विरोधी होथे तब उही मेर ओला चेताय बर व्यंग्य के काम शुरू होथे। साहित्य ल समाज के दर्पण कहे जाथे। जब साहित्य के आने सबो विधा ह समाज के आघू म दर्पण असन खड़े हो के ओखर चित्र देखाथे तब व्यंग्य ह एक्सरे अउ सोनोग्राफी के मशीन असन समाज ल ओखर चरित्र देखाथे। कहे कि मतलब आय के व्यंग्य ह केवल बाहर - बाहर नहीं भितरौन्धी बात ल समाज के सामने लाय के काम करथे। व्यंग्य  समाज के वस्तुगत परिस्थिति म समाय अंतर्विरोध के अभिव्यक्ति आय। व्यंग्यकार अपन समय अउ समाज के सच्चाई के प्रति जागरूक रहिथे अउ वोहा कोंदा-भैरा असन ओला कलेचुप देखत नई रहय भलुक सच ल सच कहें के खतरा उठाथे। इही पाय के व्यंग्यकार ल गूंगी जनता के वकील कहे जाथे। व्यंग्य ह  साहित्य के सीमा म बंधाय नई हे बल्कि जिंहा तक मानव जीवन के प्रसार हे उँहा तक व्यंग्य के विस्तार हे।

 व्यंग्य ह समकालीन समाज अउ राजनीति के दर्पण होथे जउन ह समाज के विकृति अउ कमजोरी ल बताथे। व्यंग्य के काम केवल मनोरंजन नोहे वो हा चेतना ल झकझोर के मनखे ल सोचे - विचारे बर बाध्य करथे। व्यंग्यकार के काम कबीर के ये दोहा कि कबीरा खड़ा बाजार में, मांगे सबकी खैर, न काहूँ से दोस्ती न काहूँ से बैर।। असन होथे । वोहा तटस्थ भाव ले लोक मंगल के भावना रखत अपन बात कहिथे।

कभू - कभू हमन हास्य ल घलो व्यंग्य कहे के या माने के गलती कर देथन। जबकि दुनो एकदम अलगेच आय। कोन्हों घटना, क्रिया, परिस्थिति, लेख या विचार के दो मुंहापन, असमानता, आसमजस्य ल देख, सुन या महसूस करके मनखे के मन म जो आनन्द भाव उतपन्न होथे वोहा हास्य आय। हास्य के काम केवल मनोरंजन होथे जबकि व्यंग्य के काम पाखण्ड के पर्दाफाश करके सामाजिक जागरुकता अउ राजनीतिक चेतना लाना होथे। येला अउ अच्छा ये उदाहरण ले समझ सकथन कि  हास्य ह कोन्हों फिल्म के कॉमेडियन आय अउ व्यंग्य ह फ़िल्म के हीरो।

कोन्हों - कोन्हों मन आरोप लगाथे कि व्यंग्यकार मन हमेशा गलतीच ल देखथे बने - बने बात ल काबर नई देखे अउ लिखे? तब भैया डॉक्टर के काम ह बीमारी देखे के आय कि स्वास्थ्य देखे के? डॉक्टर चाहथे कि मनखे आज जतका स्वस्थ्य हे आने वाले समय म ओखर ले जादा चुस्त, दुरुस्त अउ तंदुरस्त रहय। डॉक्टर ह मरीज के शरीर के फोड़ा फुंसी के ऑपरेशन करे बर चाकू चलाथे तब ओखर मन में गुस्सा नहीं भलुक करुणा अउ दया के भाव होथे। ओखर उद्देश्य ह मरीज के पीरा ल बढ़ाना नहीं भलुक पीरा से मुक्ति दिलाना होथे बस वइसनेच काम व्यंग्य अउ व्यंग्यकार के होथे। वोहा अपन समकालीन समाज ल अउ बढ़िया स्वस्थ्य बनाना चाहथे। तिही पाय के सबो किसिम के कमजोरी ल देख के लिखत रहिथे। ये काम कबीर ल लेके आज तक चलत हे अउ जब तक समाज म विसंगति, विद्रूपता , शोषण अउ असमानता रही तब तक आघू घला चलते रही।

 ये तो बात होइस व्यंग्य काबर? अब बात व्यंग्य कइसे करे जाय। तो व्यंग्य अइसे हो कि गलती करने वाला अपन गलती ल समझ घला जाय अउ ओला दुख घला होय फेर वोहा व्यंग्यकार ल तै मोर ऊपर व्यंग्य करे कहिके कहि घला झन सकय। मतलब व्यंग्य व्यक्ति विशेष ऊपर नहीं बल्कि प्रवृति विशेष ऊपर होथे। मने कोन्हों आन मेर नजर अउ कोन्हों आन मेर निशाना । व्यंग्य ह करू होथे तब ओखर स्वाद ल बढ़ाय बर हास्य के तड़का लगाय बर लागथे। जइसे डॉक्टर मन करू दवाई ल मन्दरस म मिला के खाय बर कथे या सब्जी के सुवाद ल बढ़ाय बर सुवारी ह नून, तेल, मिर्चा के उपयोग करथे। कोन्हों साग कम अउ नून, तेल, मिर्चा मन जादा हो जहि तब तो साग के सुवादेच बिगड़ जहि। अइसने व्यंग्य ल सुस्वादु बनाए बर हास्य के उपयोग करे जाथे। कहूँ हास्य के मात्रा जादा होईस कि व्यंग्य के सुवाद ह बिगड़ीस।

ऊपर म लिखाय गोठ -बात के आधार म छतीसगढ़ी व्यंग्य के विकास  यात्रा ल समझे के कोशिश करे म हम पाबो कि छत्तीसगढ़ी व्यंग्य अभी अपन किशोरावस्था म हे । मने न पूरा परिपक्व होय हे  अउ न बिल्कुल नासमझ हे। 

 वइसे भी हिन्दी व्यंग्य के इतिहास ल घला विद्वान मन बीसवीं शताब्दी के सुरुआत ले ही मानथे। विद्वान मन के कहना हे कि पहली तो व्यंग्य ल विधा घला नई माने जावत रिहिस। हिंदी के सुप्रसिद्ध व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई जी ह खुदे व्यंग्य ल विधा के बजाय स्प्रिट कहे हे जउन कविता, कहानी, नाटक, निबन्ध सबो म हो सकत हे। 

  जब हिंदी व्यंग्य के इतिहास ह लगभग सौ -डेढ़ सौ बरस के माने जावत हे तब छत्तीसगढ़ी व्यंग्य के इतिहास ल हम बहुत आसानी से  समझ सकत हन।

   हाँ लिखित सहित्य के बजाय हम वाचिक परम्परा के सहारा ले के कोन्हों इतिहास मानबो तब जरूर येहा जुन्ना हो सकत हे। वाचिक परम्परा के लोक कथा, लोकगीत, हाना-ठेही म जगह-जगह व्यंग्य के पुट देखे बर मिलथे। जइसे बिहाव के ये भड़ौनी गीत म देखव-

बड़े -बड़े तोला जानेन्व सगा, कुंआ म डारेंव बांस रे।

झाला-पाला लुगरा लाने जरय तुंहर नाक रे।

दार करे चाऊंर करे लगिन ल धराय रे।

बेटा के बिहाव करे बाजा ल डर्राय रे।

मेंछा हावय लाम लाम मुँहू हावय करिया रे।

समधी बपरा काय करय पहिरे हावय फरिया रे

 अइसने बानगी पंथी गीत म घलव देखव---

घट-घट म बसे हे सतनाम, खोजे ल हंसा कहाँ जाबे रे।

ये मूरख पापी चोला सुन ले गुरु के वाणी ल।

अन्तस् म सतनाम बसा ले झन हो तै अज्ञानी ग।

 या

अपन घट के देव ल मनईबो, मन्दिरवा म का करेल जईबो।

 अइसने व्यंग्य के बानगी  छत्तीसगढ़ी हाना अउ ठेही म गजब दिखथे--जइसे---

घर म नाग देव भिम्भोरा पूजे ल जाय। कोरा म लइका अउ गांव भर गोहार। जोग म साख नहीं भभूत म आँखी फोड़य। कुकुर ह गंगा जाही तब पतरी ल को चांटही। सहराय बहुरिया डोम घर जाय। नवा बइला के नवा सींग, चल रे बइला टिंगे टिंग। पइधे गाय कछारे जाय। खाय बर लरकु, कमाय बर टरकु। हाथ म घड़ी कान म सोन तेखर बुता ल करही कोन। नांगर के न बख्खर के दौरी बर बजरंगा। देखब म श्याम सुंदर पादे बर ढमक्का। ये तो छत्तीसगढ़ी के वाचिक परम्परा म समाय व्यंग्य के बात होइस फेर चर्चा के मूल बात तो छत्तीसगढ़ी के व्यंग्य आय। एखर लिखित रूप के गोठबात बिन तो ये लेख अधूरा हो जही। तब आवव मिले जानकारी के आधार म ये विषय ऊपर चर्चा करन। 

  सन 1950 म रचित अउ 1955 म प्रकाशित कपिल नाथ मिश्र जी के खुसरा चिरई के बिहाव नाव के कृति ल अभी- अभी छत्तीसगढ़ी के प्रथम व्यंग्य होय के रूप प्रचारित - प्रसारित करे जावत हे फेर  अकलतरा डॉट कॉम म येला पढ़े के बाद येहा मोला हास्य रचना के रूप म लागिस जउन ह कविता संग्रह आय। दूसर बात येला पढ़े म विशुद्ध छत्तीसगढ़ी असन नई लागे बल्कि हिंदी अउ छत्तीसगढ़ी के मिंझरा रूप असन लागिस हे। अइसनेच किसिम के रामेश्वर वैष्णव जी के काव्य संग्रह नोनी बेन्द्री अउ  उधोराम झकमार जी के कविता संग्रह ररूहा सपनाय दार -भात घला रिहिस। झकमार जी के किताब ला प्रांतीय छत्तीसगढ़ी साहित्य समिति ह प्रकाशित कराय रिहिस। यदि छत्तीसगढ़ी कविता म व्यंग्य के बात करन तब एला वैश्विक प्रसिद्धि देवाय म सबले बड़े योगदान छत्तीसगढ़ राज भाषा आयोग के पूर्व सचिव अउ अंतराष्टीय कवि पद्मश्री डॉ सुरेन्द्र दुबे जी के योगदान सबले बड़का अउ अविस्मरणीय हे।

   ये सत्र ह छत्तीसगढ़ी म गद्य व्यंग्य ऊपर केंद्रित हे तब गद्य रूप के चर्चा करना ही ज्यादा महत्वपूर्ण हे।

 मिले जानकारी के मुताबिक सन 1970 म दैनिक युगधर्म रायपुर में स्व हेमनाथ यदु द्वारा छत्तीसगढ़ी कालम लिखे के शुरुआत होइस। फेर छत्तीसगढ़ी व्यंग्य ल पोट्ठ करे म सबले ज्यादा काम रामेश्वर वैष्णव जी के दिखथे। बागबाहरा ले दिलीप सोनी जी के द्वारा संपादित पत्रिका बांगो टाइम्स म ओमन 1976 ले 77 तक  आँखी मूंद के देख ले कालम लिखिन। छत्तीसगढ़ी झलक म 1978 ले 80 तक दार-भात चटनी नाम के कालम लिखिन। छत्तीसगढ़ी सेवक म 1980 ले 86 तक गुरतुर - चुरपुर कालम लिखिन। 1986 ले 1993 तक अउ 2010 ले 2013 तक लगभग दस साल ले दैनिक नवभारत म उत्ता-धुर्रा कालम लिखिन अउ 1998 ले 2000 तक दैनिक भास्कर म उबुक-चुबुक नाव ले कालम लिखिन जउन ह अभी 2024 म पुस्तक रूप म प्रकाशित होय हे। दैनिक देशबन्धु म परमानन्द वर्मा के बेरा - बेरा के बात अइसने किसम के नव भास्कर म लक्ष्मण मस्तूरिहा जी ह घला माटी कहे कुम्हार से, दैनिक स्वदेश म जी एस राम पल्लीवार ह रईचुली ,   सुशील भोले के आखर अंजोर अउ किस्सा कलयुगी हनुमान के , रामेश्वर शर्मा के जाती - बिराती,  आनन्दी सहाय शुक्ल के कांव -कांव , दैनिक नवभारत बिलासपुर म  डॉ पालेश्वर शर्मा के गुड़ी के गोठ, दैनिक नवभारत म 2003 म  सुशील यदु  ह लोकरंग नाम के कालम लिखिन। व्यंग्य के रंग किताब के माध्यम ले जानकारी मिलिस कि सुधा वर्मा जी ह एक लेख के माध्यम ले बताय हावे कि 1962 म घला कालम लेखन होवत रिहिस  जेखर नाम बेरा - बेरा के बात रिहिस अउ ओला पहिली  टिकेंद्र टिकरहा जी लिखत रिहिन बाद म उही ल भूपेन्द्र टिकरहा जी मन लिखिन। बाद म परमानंद वर्मा जी द्वारा लिखित कालम  डहरचला घला रोज छपत रिहिस। हरनारायण शर्मा जी ह बहेरा के भूत अउ दुर्गा प्रसाद पारकर जी ह रौद्र मुखी स्वर म 1992 ले 94 तक आनी-बानी के गोठ अउ दैनिक भास्कर म चिन्हारी नाव ले कालम लिखिन। पहट म भैया गुलाल वर्मा जी के कालम का कहिबे लगातार छपत रिहिस आजकाल शायद येहा दिखत नई हे। एखर छोड़ भी बहुत अकन कालम लिखे गे होही जेखर जानबा मोला नई हो पाय हे । ये कालम मन म यद्यपि हास्य अउ व्यंग्य के बहुत पुट जरूर होही फेर येला व्यंग्य माने म विद्वान लेखक मन के अलग अलग मत हे अउ ये कालम मन के लेख वाजिब म व्यंग्य के  शर्त ल पूरा करथे या निमगा निबन्ध आय ये तो समकालीन विद्वान लेखक मन जादा अच्छा बता सकथे।

 अभी तक छत्तीसगढ़ी व्यंग्य के प्रकाशित किताब के रूप म जयप्रकाश मानस जी के कलादास के कलाकारी, स्व राजेन्द्र सोनी जी के खोरबाहरा तोला गांधी बनाबो, कृष्ण कुमार चौबे जी के लंदफंदिया अउ गम्मतिहा,  सुशील यदु जी के घोलघोला बिना मंगलू नई नाचय, विट्ठल राम साहू के नीम चघे करेला, द्वारिका प्रसाद वैष्णव जी के ठोंक रेट म चिल्हर ज्ञान अउ बनगे तोर बिगड़गे,  धर्मेन्द्र निर्मल जी के तुंहर जंउहर होवय,  दुर्गा प्रसाद पारकर जी के राजा के विकासयात्रा,  कांशीपुरी कुंदन जी के बेईमान के मुड़ी म पागा अउ गदहा माल उड़ावत हे, महेंद्र बघेल मधु जी के झन्नाटा तुंहर द्वार , राजकुमार चौधरी रौना जी के का के बधाई, विजय मिश्रा अमित के कल्लू कुकुर के पावर, गुलाल वर्मा के का कहिबे नाव ले किताब प्रकाशित होय के अउ बन्धु राजेश्वर खरे जी के गाय के परमोशन नाव के प्रकाशनाधीन होय के जानकारी मिले हे।

 छत्तीसगढ़ राज्य बने के बाद सबो कोती विकास के गंगा बोहावत हे तब साहित्य अउ विशेषकर छत्तीसगढ़ी व्यंग्य लेखन कइसे पाछु रही? यहु म गति आय हे। इंहा लिखैय्या मन अब व्यंग्य के मरम अउ धरम ल समझ के व्यंग्य लेखन करत हे। तभो ले हास्य व्यंग्य के कवि मन के तुलना म गद्य व्यंग्य लेखन करने वाला लेखक कमेच हावे। हरिशंकर देवांगन, संजीव तिवारी, कुबेर साहू,  रीझे यादव , ललित नागेश, हीरालाल गुरुजी , ललित जख्मी,  महेंद्र बघेल मधु, राजकुमार चौधरी, धर्मेंद्र निर्मल, चोवा राम वर्मा बादल, विवेक तिवारी  जइसे सरलग व्यंग्य लिखैय्या के संगे-संग छिट-पुट व्यंग्य लेखन करैया लेखक मन में दीनदयाल साहू , अरुण निगम, दिनेश चौहान,  दादुलाल जोशी असन अउ व्यंग्य के कतको लेखक मन ह  लेखन करके ये विधा ल समृद्ध करत हे। आप मन चाहो तो ये क्रम म मोरो नाव ( वीरेन्द्र सरल ) ल रख सकत हव। छत्तीसगढ़ी व्यंग्य ल पोट्ठ करे म दैनिक हरिभूमि के चौपाल, देशबन्धु के मड़ई, पत्रिका के पहट  प्रखर समाचार के सप्तरंग, अमृत सन्देश के अपन डेरा संगे संग लोकाक्षर व्हाट्सएप समूह अउ गुरतुरगोठ डॉट कॉम के बहुत महत्वपूर्ण योगदान हे। हिन्दी व्यंग्य म घला बने पोट्ठ आलोचना के किताब  ह घला अंगरी म गिने के लइक हे अइसन बेरा म छत्तीसगढ़ी व्यंग्य आलोचना के किताब संजीव तिवारी जी द्वारा लिखित व्यंग्य के रंग बहुतेच महत्वपूर्ण हे। बहुत झन लेखक मन छत्तीसगढ़ी सरलग तो नहीं फेर कभु - कभू व्यंग्य लिख के छत्तीसगढ़ी व्यंग्य ल पोट्ठ करत हे। आजकल सोशल मीडिया म सुशील भोले जी के कोंदा - भैरा के गोठ के गजब चर्चा हे।  मैं अपन मति अउ उपलब्ध जानकारी के आधार म ये लेख ल लिखे के कोशिश करे हंव। सम्भव हे बहुत झन लेखक अउ उंखर व्यंग्य किताब के नाव ये लेख म छुटगे होही। येला मोर अज्ञानता समझ के मोला माफी देहु।

 वीरेन्द्र सरल

ग्राम -बोड़रा 

पोष्ट -भोथीडीह

व्हाया-मगरलोड

जिला-धमतरी ( छत्तीसगढ़)

पिन 493662

मो -7828243377