. *बने आदमी के सबो ला जरूरत रहिथे!*
(छत्तीसगढ़ी कहानी)
- डाॅ विनोद कुमार वर्मा
एक गँवई गाँव मं किसान के घर सुग्घर नोनी के जनम होइस। ओकर नाम रहिस ननकी नोनी। जइसे-जइसे ओहा बाढत रोठ्ठ-पोठ्ठ नान्हे ले बड़े होवत गइस वइसे-वइसे ओकर सुघरई बाढ़त गइस। उपर वाला जइसने सुंदर रूप गढ़े रिहिस ओइसने ओकर मीठ अवाज रहय अउ बड़ मीठ गाना गावय। जइसने मीठ गाना गावय वइसने सुग्घर ओकर रंग-रूप रहिस। ओकर रँग-रूप ला जेन देखय त देखते रहि जावय। जब ओहा पैडगरी म रेंगत-रेंगत नहाय बर तरिया जावय त लोगन मन ओला देख के ठिठक के रुक जाँवय अउ जब गावत रहे त ओकर गाना ला सुने बर चिरई-चिरगुन मन तीर-ताखर के पेड़-पौधा, आट-परसार अउ ओकर गोड़ तरी आ के बइठ जाँवय।
ओकर प्रसिद्धि के खबर यमराज तक पहुँच गे। एला तो जानतेच्च होइहा कि यमराज के मुंशी चित्रगुप्त मनुष्य अउ सबो चराचर जीव मन के करम के सबो लेखा-जोखा ला रखथे।
यमराज कहिस- ' जे नोनी के पृथ्वी लोक मा अतेक प्रसंसा होवत हे वोकर गाना सुने के मन होवत हे चित्रगुप्त। अउ कतेक दिन पृथ्वी लोक मा रइही? इहाँ कब आही? '
चित्रगुप्त जनम-मरन हिसाब के खाता बही ला देख के कहिस-' प्रभु, ओकर पृथ्वी लोक मा रहे के समे तो हमर लेखा म खतम हो गे हे, फेर ओहा धरती लोक मा अभी बहुत लंबा समय तक रहिही! '
' काबर रही धरती लोक मा? ओला धर-बाँध के इहें ले आ ओकर गाना सुनबो! देव लोक मा अप्सरा मन नाचथें तो बने, फेर ओकर कस मीठ-मीठ गाना कहाँ गा पाथें! '
' ए बूता बड़ मुश्किल हे प्रभु! सत्यवान -सावित्री के कथा ला तो सुनेच्च होइहा? '
' हाँ, त? '
' कुछु नि करे सकँव प्रभु! ..... माता लक्ष्मी मनुष्य मन ला एक ठिन वरदान देहे हें कि सद्कर्म अउ आन-आन मन के आशीष अउ शुभकामना ले ओमन के उमर एक-एक दिन बाढ़त जाही! ..... ओ नोनी ला झोला भर-भर के रोजेच्च आशीष मिलत हे! एकरे सेती ओकर उमर ह हनुमान के पूछी कस लामत जावत हे! ...... कोनो आने ला बुला लेवा। ..... मुम्बई के एक झिन हिरोइन समुन्दर के बीच मा फोटो शुट करवावत हे! फोटो शुट ला देखे बर हजारों रूपिया के टिकिट ले के रईस मनखे मन गेहे हें। कहिहव त पानी जहाज मा बड़का भोलका करवा देवत हँव! हिरोइन के संग ओकर चेला-चाँटी मन-ला घलो इहेंच ले आनबो! '
' अरे! इहाँ हिरोइन के का जरूरत हे? हमर देव लोक मा एक ले आगर एक अप्सरा अउ मेनका, उर्वशी तो हाँवय! ...... अउ फेर ओकर जम्मो चेला-चाँटी मन ला कते मेर रखिहँव? मोर दरबार मा बने आदमी के जरूरत रहिथे! एमन करिया आँखी ले उर्वर्शी अउ मेनका ला देखहीं त इन्द्र देवता जंगा जाँहीं! ..... मोला थोरिक सोचन दे चित्रगुप्त! '
' थोरिक सोच लेवा प्रभु! '
' तोर बात ह थोरकुन जँचत हे चित्रगुप्त! ...... ननकी नोनी ला इहाँ लानहूँ त लक्ष्मी अउ सरस्वती मैया नाराज हो जाहीं, जेमन नोनी-ला रूप सँग गायकी के आसिस देहे हें! '
' ठीक हे प्रभु, जइसन आपके विचार होही ओला बता देहू! .... फेर बने आदमी के जरूरत तो पृथ्वी लोक मा घलो हावय! '
..........................................
Story written by-
डाॅ विनोद कुमार वर्मा
व्याकरणविद्, कहानीकार, समीक्षक
No comments:
Post a Comment