(लघुकथा )
जेब खर्चा
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एके पारा के रहइया राकेश अउ दिनेश दूनों छटवीं कक्षा मा पढ़त हें।
आज खाना छुट्टी मा दूनों झन गुपचुप-चाट लेके गोठियावत-गोठियावत खावत हें।
"अरे भाई राकेश तोला रोज खजानी खाये बर कोन पइसा देथे"--दिनेश हा पूछिस।
"मोला तो मम्मी अउ पापा दूनों कोई देथें। मोर पापा हा फैकटिरी मा नौकरी करथे अउ मम्मी हा आँगन बाड़ी मा। उँकर सो पइसा के कमी नइ रहाय"--राकेश हा खुश होके कहिस तहाँ ले पूछिस--
" अउ तोला पइसा कोन देथे जी। "
"मोला कोनो नइ देवयँ भाई।"
"वाह!कइसे नइ देवत होहीं। रोज तो बहुत खजानी खाथच। कहाँ ले पइसा पाथच"
"मैंहा रोज बिहनिया दारू के खाली शीशी बेंचथँव भाई।बहुत पइसा मिल जथे। एक दू ठो ददा अउ बबा के घर मा खाली करे अउ दस-बीस ठो तरिया पार मा मिल जथे।"--
दिनेश कहिस।
"देख भाई शीशी बेंचत-बेंचत तोर ददा कस शीशी ढरकाये ला झन सीख जबे।जेब हा खाली होये ला धर लिही" --राकेश कहिस।
चोवा राम वर्मा 'बादल '
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