Thursday, 15 January 2026

छत्तीसगढ़ी के गद्य साहित्य ;नाटक

 

छत्तीसगढ़ी के गद्य साहित्य ;नाटक


     डॉ पीसी लाल यादव


कोनों भी भाषा के साहित्य होय गद्य ओखर पोठ विधा आय | जतके मह्त्तम पद्‌य के होथे, ओतके महत्तम गद्य के होथे। इही बात हमर माई भाषा छत्तीसगढ़ी बर घलो लागू होथे। छत्तीसगढ़ी गदय म जतके महत्तम कहानी अउ उपन्यास के हवय ओइसने महत्तम नाटक के घलो हवय । मोला तो अइसे लगथे के कहानी अउ उपन्यास ले जादा प्रभाव नाटक के परथे। काबर के कहानी अउ उपन्यास ल पढ़े जाथे , जबकि नाटक ला सुने के  संग-संग सऊँहत देखे घलो जाथे । येखरे सेती नाटक ल दृश्यश्रव्य केहे जाथे। येहा पाठक, श्रोता अउ दर्शक ला जादा प्रभावित करथे । संवाद, अभिनय के सेती नाटक के मंचन म सजीवता होथे । नाटक म गीत-संगीत अउ अभिनय के त्रिवेणी होथे। छत्तीसगढ़ी नाटक के इतिहास ल सौ-दू सौ साल म बांधना या ओला समेटना, मोला उचित नई लागय । येला जाने-समझे बर हमला लोक के सहारा लेना परही। ओ लोक, जेन हा श्रम परिहार बर, समुदाय के मनोरंजन बर, रात-रात भर नाचथे-गाथे, अपन दुख-पीरा ला अभिनय के माध्यम ले उद्‌गारथे । ओ आय छत्तीसगढ़ी नाचा, जेला नाचा-गम्मत घलो कहिथन । के हे जाय त नाचा लोक जीवन के दरपन आय। जेमा ओखर दुख-सुख, हास-परिहास, उछाह-उमंग, हांसी-रोआसी, दया-मया ,करुना, मीत-मितानी, भाईचारा जम्मो के दर्शन होथे | लोक जीवन के विसंगति नीत-अनीत येमा सब कुछ समाय रहिथे । एक बानगी देखव् – 


भांग मांगय चना रे संगी, गांजा मांगय घी । दारू मांगय जूता-चपाल, मन लगे तो पी ।। 


छत्तीसगढ़ नाटक के गढ़ आय। कोनों नई पतियाय त ओला रामगढ़ के प्राचीन नाट्‌य शाला ल जा के देखना चाही। जेन ह ईसा पूर्व तीसरी शताब्दी के आय, जिहाँ कालीदास के मेघदूत के रचना होय हे। अउ येहा दुनिया भर के सबले जुन्ना नाट्य शाला आय | अइसन विद्‌वान मन  कहिथे। जब हमर छत्तीसगढ़ में अतका  जुन्नबी नाट्य शाला हे ,त का इहाँ के मनखे नाचत -कुदत नई रिहिन होहीं ? नाच-कूद के अपन मनोरंजन नई करत रिहिन होहीं । ये हा गुने के बात आय। ये बात जरूर हे के तब नाटक या नाचा के कोनों लिखित रूप नई रिहिस, भलुक ओहा वाचिक परम्परा पीढ़ी-दर-पीढ़ी समय के अनुसार लोक कंठ म समाय रिहिस। ओखर प्रत्यक्ष प्रमाण हे आज के हमर लोक नाट्य ‘नाचा' जेन हा आज भी वाचिक परम्परा ले जनमानस के मनोरंजन के साधन बने हे । जन-चेतना के माध्यम बने हे | जेमा स्त्री पात्र के भूमिका पुरुष मन निभाथे । इही लोक रूप में जऊन आदिकाल से चले आवत हे । जेमा शोषित, दलित,पीड़ित के स्वर मुखर होथे |


अइसने छत्तीसगढ़ी लोकनाट्य के दूसर रूप हे ‘रहस’ | रहस धार्मिक अनुष्ठानिक आयोजन ये, जेखर कथा कृष्ण लीला ऊपर आधारित होथे। येखर संवाद लिखित रूप  में होथे अउ येखर आधार आय बाबूवा का राम लिखित गुटका । रहस ला रास लीला घलो केहे जाथे | कृष्ण लीला के बाद  ईही मंच में जेन ला बेड़ा केहे जाथे , जिहाँ श्री कृष्ण लीला से संबंधित मूर्ति मन के स्थापना होय, रहिथे तेमा ‘छैला नाच’ के घलो प्रदर्शन होथे। येहा नाचाच आय जेमा  गम्मत देखाय जाथे। छैला नाचा के कोनों स्क्रीप्ट नई होय । नाचा के खड़े साज, देवारिन साज, अउ अब बइठक साज छत्तीसगढ़ी नाटक के आदि रूप, प्रारंभिक स्वरूप आय । पंडवानी, चंदैनी, भरथरी गायन मा घलो अब नाट्य तत्व माने अभिनय के दर्शन होथे ,जेन हा छत्तीसगढ़ी नाटक के महत्तम ला उजागर करथे। बस्तर उड़ीसा ले लगे सीमांचल म भतरा नाच के चलन हे । जेमा मुखौटा के उप‌योग करे जाथे | येहूँ ह नाटक के आदि रूप के गवाही हे | तब जुन्ना समय म  शिक्षा के प्रचार –प्रसार नई रिहिस, लोगन पढ़े-लिखे नई रिहिन, तभो नाटक ह वाचिक रूप में लोगन के मनोरंजन के संगे संग लोक चेतना के माध्यम बने रिहिस। ये मन छत्तीसगढ़ी लोकनाट्य के वाचिक रूप आय, जऊन हा आजो चलत हे । नाचा ह अंग्रेजन के खिलाफ स्वतंत्रता के शंखनाद करिस |  ऊँखर जोर-जुलुम बर अवाज उठइस । अजादी बर लोगन ल जगइस  - 


भागेल ल हरथे ग मोंरो, भागे ल हरथे ना आये हे बिदेसी सगा, भागे ल हरथे ना ।      अंग्रेजन मन बिदेसी सगा ये , जेन मन हमर भाग माने हमर आजादी ला हर ले हे। अइसन भाव हे येमा । आजादी के बाद जइसे-जइसे शिक्षा के प्रचार-प्रसार होइस, लोगन जागरुक बनिन, तब छत्तीसगढ़ी नाटक के लोक रूप, वाचिक परम्परा ह घलो लिखित रूप मा अइस । राष्ट्रीय चेतना के संचार होइस । तब जागरूक सियान साहित्यकार मन समाज ल जगाय बर, अशिक्षा, अंधविश्वास के अंधियार ल मेटाय बर नाटक के रचना करिन । काबर के नाटक लोगन ल जादा प्रभावित करथे । कान के सुनई अउ आँखी के देखई दूनों संगे - संगे होय ले हिरदे में येखर जादा प्रभाव परथे। अउ मनखे चेतलग होथे। परंपरा ले हट के आधुनिक भाव बोध वाले नाटक के लेखन अउ मंचन होय लगिस | सन् 1‌904 में पंडित लोचन प्रसाद पाण्डेय लिखित नाटक 'कलिकाल' ल छत्तीसगढ़ी के पहिली नाटक माने जाथे। इही समय में पंडित शुकलाल पाण्डेय रचित नाटक ‘केकरा घरैया’ अउ ‘खीरा चोट्टा’ घलो प्रसिद्ध होइस | जेमा छत्तीसगढ़ी लोक जीवन अउ लोक संस्कृति के चित्रण हे । दूनों नाटक(एकांकी) शिक्षाप्रद अउ हँसी-मजाक से भरपूर मनोरंजक रिहिस। ये बेरा के नाटक में मनोरंजन के संग-संग लोकचेतना, समाज सुधार अउ स्वतंत्रता के भाव मुखर होइस ।


सन् 1948 में पंडित मुरलीधर पांडेय ह ‘विस्वास' नाटक के रचना करिन, जउन ह  30 अगस्त 1948 के ‘छत्तीसगढ़ केशरी' म छपिस । एमा बलि प्रथा के विरोध अउ सामाजिक चेतना के गोठ रिहिस। ये बेरा में धार्मिक भाव ले ओत-प्रोत 'छत्तीसगढ़ी राम चरित नाटक' श्री उदय राम जी ह 1963 म लिखिन | डॉ० रामलाल कश्यप जी ह ‘श्री कृष्णार्जुन युद्ध’ 1965 म लिखिन । श्री  रामकृष्ण लाल अग्रवाल के नाटक ‘गॅवई के अंजोर’ घलो उल्लेखनीय हे । छत्तीसग‌ढ़ी जन जागरण के अग्रदूत, छत्तीसगढ़ी माटी के सपूत समाज सुधारक डॉ खूबचंद बघेल के साहित्यिक अवदान ल कभू नई भुलाय जा सके। ऊँखर लिखे नाटक, ‘ऊँच अउ नीच’, ‘करम छड़हा’, ‘जनरैल सिंह’, ‘बेटवा बिहाव’ अउ 'किसान के करलई’ मन मील के पखरा साबित होईन। ‘ऊँच अउ नीच’ नाटक हरिजन उध्दार के दृष्टि से गांधी जी के सन 1933 के आगमन अउ अनंत राम बरछिहा द्वारा अपन गाँव के हरिजन भाई मन के हजामत बनाय के घटना ले संबंधित हे | उहें जन्‌रैल सिंह ह देशप्रेम अउ छतीसगढ़ प्रेम ले सराबोर हे । ये नाटक के मंचन ले छत्तीसगढ़ के आत्म सम्मान अउ देश के गौरव गरिमा, सीमा के रक्षा कइसे कर सकत हन | ये संदेश मिलिस | ‘बासी महात्म्य' इही म समाहित हे |        गजब विटामिन भरे हवय जी, छत्तीसगढ़ के बासी में        धान-उन्हारी उपजायेन जी , हम कम्हार मटासी में । 


हे किसान में गुन सेवा जस, संत अमर सन्यासी में | 


नंदिया जल विरमल जइसे, चंदा हर पूरन मासी में | 


छत्तीसगढ़ बर गजब मया हे, हर छत्तीसगढ़ वासी में। 


वीर नारायण सिंह देश बर ,चढ़गे हाँसत फांसी में || सन् 1963 में टिकेन्द्र टिकरिहा के नाटक ‘साहूकार से छुटकारा’ अउ सर्वनाश, फंदी घलो महत्वपूर्ण नाटक ये | ‘साहूकार से छुटकारा'  साहूकार मन के शोषण ल उजागर करथे । दुर्ग निवासी श्री ग‌जाधर प्रसाद रजक के ‘बांटा’, बाबू लाल सिरिया के 'महासती बिंदारमती’ | धमधा निवासी बंगाली प्रसाद ताम्रकार के 'मसाल के जोन’, डॉ महेंद्र कश्यय राही के 'गांधी अउ गंगा के देश में घलो छत्तीसगढ़ी के महत्वपूर्ण नाटक आय | श्री नंदकिशोर तिवारी  द्वारा रचित नाटक ‘परेमा’ के अपन अलग चिन्हारी हे, जेखर प्रसारण आकाशवाणी रायपुर ले बेरा-बेरा म होवत रहिथे । येमा पांच नाटक ‘बंटवारा’, नई जानन का चीज, लुकाय जेमा सब्बो बीज’  रंग सा एक’, ‘महारसिया’, ‘परेमा’ के संकलन हे। श्री नंदकिशोर तिवारी जी के एक अउ नाटक “रानी दाई डभरा के” बहुत प्रसिद्ध होईस। डॉ योगेन्द्र चौबे के निर्देशन ये नाटक के कतको प्रभावी मंचन होय हे। ‘अहिमन कैना’,’नारद मोह’,'उरुभंगम’, ‘मोर कुंआ गँवागे’ घलो इंखर चर्चित नाटक आय । सन् 1977 में प्रकाशित श्री नारायण लाल परमार रचित ‘मतवार’ अउ दूसर एकांकी’ घलो बड़ प्रसिध्द होइस । श्री लखन‌लाल गुप्त के नाटक 'बेटी के मनसूबा' , 'वर के खोज’,अउ ‘नवा बिहान’ 'हार-जीत' एकांकी मन घलो नाटक के रूप आय।‘महाकवि कपिलनाथ कश्यप छत्तीसगढ़ी साहित्य के पुरोधा आँय । ऊँखर एकांकी नाटक ‘अधियारी रात’ (1992), ‘नवा बिहान' (1994), ‘गोहार’ (1994), ‘पूजा के फूल’ (1997), 'पापी पेट' (1997), ‘गुराँवट बिहाव’ (1998) प्रसिद्ध हे । सन् 1998 में डॉ. परदेशी राम वर्मा रचित नाटक ‘मैं बइला नौहव' तो साक्षरता कला जत्था मंच के माध्यम ले शिक्षा के अलख जगइस । ये संग्रह में क्रमशः मैं बइला नो हंव’, ‘टोटका के फोटका’, ‘लोकवा’, ‘भांवर',‘जनौला', 'जॉगर’ अउ ‘बिदाई' एकांकी मन के जोर न हे | श्री विश्वेन्द्र ठाकुर के नाटक ‘जवाहर बंडी’ (1996), 'घुरुवा के दिन बहुरगे’, ‘राजिम’, श्री श्यामलाल चतुर्वेदी के  'मया के मोटरी’ एमन छत्तीसगढ़ी नाट्य लेखन ल नवा दिशा दिन । बेरा बदलथे अउ सब ला अपन रंग म  रंग लेथे। साहित्य बर घलो ये बात लागू होथे | त भला नाटक ह कइसे छूटही ? पारंपरिक नाटक के स्थान म नवा लेखन, नवा प्रयोग शुरू होईस अउ नाटक के तेवर घलो बद‌लिस । डॉ. सुरेन्द्र दुबे के नाटक ‘पीरा' एखर बढ़िया उदाहरण ये । डॉ. जीवन यदु के गीत नाट्य "अइसने च रात पहाही, संतोष कुमार चौबे के ‘ठोमहा भर चाउर’ शंकुतला तरार के ‘चूरी' ,रघुबर सिंह चंद्राकर के "पटवारी” के परपंच’, ‘मुड़ पेलवा’ , ‘गुड़ी के गोठ’, डॉ योगेन्द्र चौबे के ‘बाबा पाखंडी’,'रानी दाई’, अजय आठले के ‘बकासुर’ | लोकनाथ साहू ललकार के ‘रंग विहार’, घनश्याम साहू के 'अघनिया’, नकुल जायसवाल के ‘सबास बेटी’, ‘गुरांवट’, 'मोरो मन करथे'। रामनाथ साहू के नाटक ‘जागे-जागे सुतिहा गो’, ‘हरदी पीयंर झांगा-पागा’ अउ ‘बिलासा, अरपा के बेटी’ छत्तीसगढ़िया लोकजीवन के दरपन आय । अभी डॉ पीसी लाल यादव के छत्तीसगढ़ी लोक नाट्य" नाचा के मूल पाठ छपे हे तेनो संहराय के लइक हे | श्री दुर्गा प्रसाद पारकर के नाटक ‘चिन्हारी', शिवनाथ, ‘सुकवा’, ‘चंदा’, ‘सुग्घर गाँव’ अउ ‘ सुराजी गाँव’ नवा लिखइया मन ला प्रेरणा देवत नाटक आंय |


सन् 1971 में दुर्ग जिला के गाँव बघेरा ले कला-संस्कृति के क्षेत्र म नवा अंजोर बगरिस । जब दाऊ रामचंद्र देशमुख जी ह चंदैनी-गोंदा के सिरजन करिन | छत्तीसगढ़ी गीत-संगीत के संगे-संग नाटक ल घलो नवा दिशा मिलिस । दाऊ रामचंद देशमुख जी ह नाचा कलाकार मन ला संगठित करके छत्तीसगढ़ देहाती कला विकास मंडल के माध्यम ले नाटक के क्षेत्र म नवा उदिम करिन । ये बात सन् 1953 के आय । पाछु चंदैनी गोंदा म गीत नाट्य के माध्यम ले 'पूजा के फूल’, ‘एक रात का स्त्रीराज' ‘देवार डेरा' अउ कारी नाटक के मंचन करिन, जेन बड़ लोकप्रिय होइस । उही बेरा म हबीब तनवीर जी मन नाचा कलाकार मन ल लेके नवा थियेटर के माध्यम से छत्तीसगढ़ी नाटक में नवा प्रयोग करिन । ‘चरनदास चोर’ नाटक के दुनिया भर म खूब शोर होइस। अइ सनेहे ‘मोर नाँव दमाद, गाँव के नांव ससुरार’, ‘बहादुर कलारिन’ अउ ‘आगरा बजार’ जइसे लोकप्रिय नाटक के मंचन करिन, तब  दुनिया भर म नाचा के डंका बाजे लगिस । ये हा छत्तीसगढ़ी नाटक के स्वर्णिम काल आय । चंदैनी गोंदा के प्रेरणा ले दाऊ महासिंह चंद्राकर ह,डॉ नरेन्द्र देव वर्मा के उपन्यास के नाट्य रूपांतरण ‘सोनहा बिहान’ के सिरजन करिन । येहू खूब लोकप्रिय होइस । फेर पाछु येमन चिंता दास बंजारे चंदैनी लोक गायक के गाथा ऊपर “लोरिक-चंदा" नाटक के निर्माण करिन, तेखर बाद ‘गौरी’ नाटक के घलो मंचन करिन। प्रेम साइमन के लिखे नाटक घर कहाँ हे ? के बाते निराला रिहिस। छत्तीसगढ़ी नाटक के निर्देशन में रामह्रदय तिवारी जी के नाव ल नई भुलाय जा सके। लक्ष्मण चंद्राकर के 'हरेली’, दीपक चंद्राकर के ‘गम्मतिहा’, राकेश तिवारी के ‘दसमत कैना’, ‘राजा फोकलवा’, मिर्जा मसूद के ‘सैंया भए कोतवाल’, चंद्रशेखर चकोर के चंदैनी शैली के नाटक ‘टेकहा राजा’, ‘खोखन खल्लू’, रामशरण वैष्णव के “बुढ़वा बिहाव”, डॉ.पीसी लाल यादव के “अक्कल बड़े के भईस”, “हवलदार हरिराम”, “भोला भगवान” छत्तीसगढ़ी नाटक मन आज घला ओतके लोक प्रिय हे । भूपेंद्र साहू के नाटक भरथरी म परम्परा के संग आधुनिक मंची प्रभाव दर्शक मन ल भावविभोर कर देथे | छत्तीसगढ़ी म नाटक के लेखन बहुत होय हे | फेर ओखर मंचन ओतका नई हो पाय हे | जबकि मंचन बहुत जरुरी हे । एक बात संहराय के लईक हे के आकाशवाणी रायपुर ह बहुत अकन छत्तीसगढ़ी नाटक मन के प्रसारण करे हे, जेन ह बहुत ही प्रभावी बने हे । सुग्घर संगीत अउ सारथक संवाद ले ये नाटक मन मन म उतर जथे । बजेन्द्र बैद्ध , किशन गंगेले, लखन लाल परगनिहा, लाल रामकुमार सिंह, मिर्जा मसूद, मोहन सी रामानी, राजेश फाये , समीर शुक्ल, विष्णु प्रसाद साहू अउ याद राम पटेल के निर्देशन में प्रसारित ये नाटक मन छत्तीसगढ़ी नाट्य साहित्य के बड़ उपलब्धि आय । प्रसारित नाटक मन ये प्रकार हे-  आँखी के टोपा लेखक बजेन्द्र बैद्ध, चना बूट- राजेश गनौद वाले , मोला गुरु बनई लेते – डॉ.नरेन्द्र देव वर्मा, अपन गाँव अपन छाँव - विष्णु प्रसाद साहू, अप्पड़-जीवनदास मानिकपुरी, बरत-रक्सा - आदित्य नारायण सिंह, गियान अउ धियान - तपस्विनी साहू, गुरु बाँटा -राकेश साहू, कुंआ के मेचका - राजेश रंगारे, मतवार-आशीष सेन्द्रे, नई जानन - नंदकिशोर तिवारी, पंच परमेश्वर - जीवन यदु, पाँचवाँ हड़िया-पुष्पलता वर्मा ,परेमा - नंद‌किशोर तिवारी, अंजोर- खेमप्रसाद शर्मा, अंजोर - सुरेश कुमार दुबे, गिदरी- उर्मिला देवी ताम्रकार, गुंरावट - नकुल जायसवाल, हंसा नियाँव-जीवन यदु, जंगल मा आगी- पुनऊ sराम साहू, लछनी - राकेश तिवारी, लकड़‌हारा के किस्सा- खोमप्रसाद शर्मा, मन-चलहा-पुनऊ राम साहू, नवा बिहान के अंजोर- पुष्पलता वर्मा , नवा जिनगी नवा रद्दा – खोमप्रसाद शर्मा, पुरखौती- पुष्पलता वर्मा, पूत-सपूत - प्रेम साइमन, सोनाखान - सुशील यदु , रतिहा पहागे- सुरेखा कश्यप, सठियाय उमर - आशीष सेन्द्रे, सोन के खिनवा- माँघी लाल यादव, ठग ले बड़े जग - माँघी लाल यादव, भरथरी - प्रेम साइमन, हंडा-पुष्पलता वर्मा, अहा रे चहा (झलकी) – रामेश्वर वैष्णव , भरम - निवेदिता सिंह, दूध दाई, भीष्म देव चतुर्वेदी, लक्ष्मण रेखा - निवेदिता सिंह, मनबोध - पुष्पेन्द्र सिंह, पीरा - भीष्मदेव चतुर्वेदी, सुंता सलाह -दीनदयाल साहू, भरम- सुरेश वर्मा, अंजार - भीष्मदेव चतुर्वेदी, कुलवंतीन- रविशंकर दुबे |


इंखर अलावा अउ कतकोन छतीसगढ़ी नाटक हे, जउन छत्तीसगढ़ी वेब साइट मन म हे। श्री संजीव तिवारी दुर्ग के मुताबिक ऊँखर वेबसाइट "गुरतुर गोठ" डाट काम में सीताराम पटेल के लगभग 20-25 छत्तीसगढ़ी नाटक संग्रहित हे । जऊन ऊँखर स्वयं के लिखे अउ कतको हिन्दी के बड़े कथाकार मन के कहानी के नाट्य रूपांतर आय । जइसे विष्णु सखाराम खांडेकर के एकांकी शांति के नाट्य रूपांतरण | जयशंकर प्रसाद के कहानी पुरस्कार के नाट्‌य रूपांतरण बिरहा के आगी । फणीश्वर नाथ रेनु के कहानी नित्य लीला ल किसना के लीला नांव से | आजाद परिन्दे के रुपांतरण चिरई-चिरगुन नांव से । लाल पान की बेगम के रूपांतरण पान के मेम के नांव से | सिरी पंचमी के सगुन ठेस कहानी के नाट्य रूपांतरण ठेंसा नांव ल करे गे हे | इंखर छोड़ अउ कतकोन अउ नाटककार मन छूटगे होही ऊँखर से मैं क्षमा चाहत हंव । मोर जतका जानकारी होइस, मैं ओतके भर ला सरेख पाये हंव | 


ये तरहा से देखे जाय तो छत्तीसगढ़ी गद्य साहित्य में नाटक के बड़ सुग्घर स्थान हे । परंपरा ले लेके आधुनिक रंगमंच तक देखे जाय त नाटक के क्षेत्र में लेखन सरलग चलत हे। फेर अतके म संतोष करना जड़ता होही । हमला समय ला देख के समय के संग चले ला लगही । नाटक के क्षेत्र में होवत प्रयोग अउ नवाचार ल अपनाय ल लगही। समाज के विसंगति ऊपर लेखनी ल चलाय ल परही। जिनगी के सुख-दुख, जय-पराजय, दया-मया, समता –सद्भाव ,भाईचारा के बढ़‌वार बर, मनखेपन के रखवार बने ला परही। नवा पीढ़ी ले तो अउ जादा उमेंद हे के ओमन नाटक लेखन ले हमर छत्तीसगढ़ी साहित्य के ढोली –ढाबा ल छलकत ले भरंय |  


     डॉ. पीसी लाल यादव


      ‘‘साहित्य कुटीर‘‘


  गंडई-पंड़रिया, जिला खैरागढ़-छुईखदान-गंडई (छ.ग.) 


      मो. नं. 9424113122


Email – pisilalyadav55@gmail.com






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