Monday, 5 January 2026

किताब - झन्नाटा तुंहर द्वारा ( व्यंग्य संग्रह)

 


   किताब - झन्नाटा तुंहर द्वारा ( व्यंग्य संग्रह)


लेखक - महेन्द्र कुमार बघेल "मधु"


समीक्षक - गिरीश ठक्कर 



महेंद्र बघेल के व्यंग्य–संग्रह “झन्नाटा तुंहर द्वार” अपन धारदार सोच, चुटीला छत्तीसगढ़ी अंदाज अउ सरकारी–सामाजिक व्यवस्था ला घलोले बर बनाई गे “गंभीर–मजा” वाला किताब लगथे।�� शिक्षक होके, बीएससी, एम.ए., बी.एड. जइसने पढ़ई के धरातल ले बघेल जी जऊन हिम्मत ले सरकार, व्यवस्था, मीडिया, बाजार अउ गांव–घर के ढोंग मं ठेहका लगाइन हे, वोला देख के कहि सकथन – “डर गे रहिस त जम्मो दिन टूरी कस सिकुड़ के रहना परतिस।”�किताब के बनाहट अउ भाषा“झन्नाटा तुंहर द्वार” 25 रंग (व्यंग्य–लेख) के संकलन आय जउन म आधुनिक छत्तीसगढ़ी गद्य के अलग–अलग परछाईं दिखथे।� बघेल जी शब्द चुने बर “पेपर–चंद” कस सटीक तरीका अपनाइन हे – मोटा चश्मा लगाये बांची घलो अराम ले पढ़ सकय, जाहिर हे कि छपाई, फॉन्ट अउ पेज–सजावट मं भी पाठक के सुविधा ला देखे गे हे।�भाषा के बात करन त बघेल जी छत्तीसगढ़ी–हिंदी दूनों के संग–संग लेके चलथें – “कंपटीशन नइ, सेटिंग होथे”, “हवाई चप्पल ले हवाई जहाज के सपना” जइसने वाक्य मन गोंदी मिरची कस छछरथें।� कहावत–लोकोक्‍ति के भरपूर झोंका – “नाली ले ताली तक”, “ना खाता, ना भाई”, “जेकर जेब मं पैसा, ओकर तूती बोलथे” – किताब के हर रंग मं “देहाती अक्ल” के चमक दिखथे।�विषय–विस्तार: सरकार, गांव अउ सपना बघेल जी के व्यंग्य के सबले मोटा निशाना “सरकार” आथे – वो ह सरकार ला जिंदा देह नइ, एक “निर्जीव प्राणी” मानथें जेन ला काबर कहो, वो ह अपने रस्ता चलत रहिथे – “नाली के पानी मं उबुक–चुबुक होवत रहिथे।”�� योजना, दिवस, कार्यक्रम – “मुक्ति दिवस, लंगड़ा दिवस, ललुआ दिवस” – सब ला वो ह स्कूल के जिंदगी के संग जोड़े के बहाना बनाथें, फेर असल सवाल उठाथें – का ये दिवस मनई के जिनगी बदले बर आये हें, कि फोटो–सेशन बर?“व्यवस्था के चरण दास” अउ पंचायत–सरपंच वाला रंग मं गांव के राजनीति के कुर्सी–चौथा पाया ला वो ह खूब नंगा कर देथे – चौथा पाया ढीला हो जाथे त पूरा कुर्सी डोल जाथे, ये बात ला वो ह बिन गाली–गलौज, सिरिफ ठंडा व्यंग्य ले रखथें।� “बरेड़ी मं ईमानदारी” मं त्योहार बखत खाद विभाग, जांच–पड़ताल, अखबार अउ विज्ञापन के गठजोड़ ला दिखावत–दिखावत किसान के फसल, बाजार के चहल–पहल, अउ अखबार के “कमई” ला घलो भूलत नइ।�“सपना के पंचनामा” किताब के सबले जमदार रंग मन मं ले एक लगथे – कोरोना–काल ले डिजिटल इंडिया तक के सपनात्मक भारत मं बेरोजगारी, टेक्नोलॉजी अउ संविधान के असली मतलब के सवाल उठा के बघेल जी पूछथें – हवाई चप्पल मं हवाई जहाज के सपना त देखथव, फेर डेली वेटेज वाला मजदूर के आंखी मं नींद कहां से आय? �ग्रामीण परिवेश, प्रकृति अउ सामाजिक विडंबना बघेल जी के कलम मं गांव–घर के माटी के गमक तगड़े परे दिखथे – डबरा, नाली, नरवा, ई–रिक्शा मं धान–चावल, प्रधानमंत्री सड़क योजना के अधूरा सपना – वो सब “मुरली सिंह के चावल” कस रोजमर्रा के प्रतीक बनके आवत रहिथे।� “अमित कहे के भरम” जइसने रंग मं प्रकृति के सुघ्घर वर्णन के संग–संग पर्यावरण के दोहन, गली–कूची के गंदगी, अउ “अपन आंगन टेढ़ा” होते घलो दूसर के निंदा करे के आदत के खूब मजा उड़ाय गे हे – “पहिली अपन आंगन जोहव, फेर दूसर के बारी गिनव।”�“छाटत–छाटत अटल कुमारी” मं बीपीएल, एपीएल, अंत्योदय सेती सरकार के योजनामन के पोल खोलत–खोलत वो ह “बिलो मैच्योरिटी लाइन” जइसने नया मुहावरा गढ़थें – गरीबी रेखा ले घलो नीचे ला देखे के नजर, जेकर मं मनखे बस जिनगी घसीटत रहिथे।� एखर संग छत्तीसगढ़ के  तिहार, दिवाली ले होली तक, बहू खोजइया दौड़, बेटी बहाना, सब ला वो ह हलका मुस्कान अउ गहरा कटाक्ष के संग जोड़े के कोसिस करथें।�मीडिया, गुटखा संस्कृति अउ ग्राहक–युगकिताब के कुछ रंग मीडिया अउ उपभोक्तावाद के ऊपर तीखा चोट करथें। “कतका करो बखान” मं पुरखा पुरखा के कोटवार–चिट्ठी वाला जमाना ले “गूगल बाबा” तक के यात्रा ला देखावत कहिथें – आज जानकारी तो ह बरसत हे, फेर मनखे मनचाही अस्मिता के भूखे हें।� येथें एकदम सही कहावत जबान मं फिट होथे – “अक्ल बंटत बखत ह वो ह हाट मं नई गे।”“गुटका सीटर” वाला रंग मं केसरिया गुटखा, फिल्मी हीरो के विज्ञापन, अउ बच्चा–बुजुर्ग सबके मुंह लाली कर देही लत के उपर बघेल जी भरपूर झनाटा झोंकतें – “कैंसर–मुक्तक” अउ “कैंसर–युक्त गुटखा” जइसने शीर्षक खुद मं व्यंग्य के फटाका हवय।� “सूतक ग्राहक सुतो” मं “जागो ग्राहक जागो” के नारा ला छत्तीसगढ़ी जमीन मं उतारत बघेल जी बाजार, हाट–बाजार, तेल–नून–सब्जी के बढ़त दाम अउ असहाय ग्राहक के हाल ला बड़ा रोचक ढंग ले रखथें।चरित्र, कहावतें अउ शैली के मजबूती“बचरू ढीला” मं आवत मवेशी–समस्या, “नेता चरित्र बखान”, “पार्टी के पांव”, “कूटनी चाल” जइसने रंग मं नेता, बूढ़ा, पड़ोसी, जन–प्रतिनिधि सबके चाल–ढाल ला बघेल जी हलके–फुलके संवाद, ठेठ छत्तीसगढ़ी कहावत–जुमला ले भर देथें।� जगह–जगह “नाली ले ताली”, “जइसे देश–वैसे भेस”, “मनखे के डेहरी, चिंता के ढेरी” जइसने भाव छुपे हे, जेन ला पढ़के लगथे – ये लेखक ह रोज कतका मन लगाके लोगों के बोली–बानी सुनत रथे।आप मन अपने लेख में जऊन बात जोर ले कहे हव – कि बचपन मं कहावत अपन आप दिनचर्या मं आय, अब किताब के सहारे बचत हे – वो सही दिखथे।� महेंद्र बघेल के ये संग्रह म कहावत, लोकोक्ति, कहनी–कहानी के “संकलित माटी” हे – हर व्यंग्य एक–एक “गागर म सागर” कस दिखथे।संगठन, प्रकाशन अउ सांस्कृतिक योगदान साकेत साहित्य परिषद सुरगी, शिवनाथ साहित्य धारा डोंगरगांव जइसने मंच मन हर साल किताब छाप के, आर्थिक संकट झेल के, गावं–देहात म महतारी बोली के गद्य ला जिंदा रखथे – ये बात खुद मं बहुत बड़ा हिम्मत के काम हे।�� “हर बरस किताब निकालना अउ उही मं अपन आर्थिक शोषन झेलना”, अइसने हालचाल के बावजूद जऊन जुझारूपन दिखत हे, वोला छत्तीसगढ़ी मं कहिथें – “जेन करा जज्बा होथे, ओला रद्दा का जंजाल नइ रोक सकय।”महेंद्र बघेल जइसन शिक्षक–लेखक जेन ह गांव–गांव के माटी ले प्रसंग उठाके सरकारी नीति, बाजार, शिक्षा, मीडिया, नारी–पुरुष, किसान–मजदूर, बच्चे–बूढ़ा – सबके ऊपर एक संग सोच करथें, वो मन छत्तीसगढ़ी गद्य ला सही माने मं “गद्य–रंग” देत हें। वोकर व्यंग्य म गुस्सा कम, मया जादा दिखथे; जइसे काहत होवय – “मंय तोर गलती ला हंसे–हंसे बता देथों, अब समझना तेर मं हे।”थोकिन सुझाव – घरघुसना मया के संग कहीं–कहीं आधुनिक हिंदी–अंग्रेजी शब्द (“हाईटेक, वैरायटी, कंपटीशन”) के घनघोर भीड़ के बीच छत्तीसगढ़ी शब्द खो जाथें, एखर बर अगला संस्करण म कुछ जगह अउ सुघ्घर लोक–शब्द जोड़े जाही त मजा दूना हो जाही।�“नेता चरित्र बखान” जइसने रंग मं आप मन घलो कहे हव – कुछ बहुत नया नइ, फेर यही जगह बघेल जी के पैनी नजर ले थोरो अउ “घर–घर के उदाहरण” जुड़े त व्यंग्य के धार अउ चमक सकत हे।�किताब के आखिर म अगर “कहावत–सूची” या “छत्तीसगढ़ी–हिंदी शब्दावली” दे दी जाही त स्कूल–कॉलेज के छात्र मन बर ये बहुत उपयोगी संदर्भ–पुस्तक बन सकथे।�समग्र रूप ले देखन त “झन्नाटा तुंहर द्वार” ला एके बात म समेट सकथन – “सन्नाटा रहिस, त बघेल के कलम आके दरवज्जा झनझना दिस।” ये किताब छत्तीसगढ़ी गद्य–व्यंग्य ला नवा पहिचान देय बर भरोसा जगाथे अउ लेखक म अभी अउ बड़े व्यंग्य–परियोजना के संभावना छोड़ जाथे – जइसे आप कहे हव, “उखाड़–इंतजार” अब पाठक मन करत हें।


             गिरीश ठक्कर *स्वर्गीय *

               राजनांदगांव

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