अंतस के पीरा ह बसंत के आय ले भगा जथे
जब ब्रम्हा जी सृष्टि के निर्माण करिस त पेड़ पउधा जीव जनावर अउ पूरा प्रकृति मूक मौन रिहिस तब, देवी सरस्वती के वीणा नाद ले पूरा सृष्टि मा जान आइस, सुखद परिवर्तन अउ चेतना के संचार होइस I तेकर सेती ये दिन ल सरस्वती पूजा के दिन के रूप म मनाथे I पूस के धुन्धरा छट के जाड़ भागे ले धरथे न तब समझ ले रितु बसंत ह अपन मोहक मादक रूप ल धरके पुरवा सन गीत बासंती गाय ले धरती म उतरत हे I प्रकृति के नवा सिंगार के परब आय,काबर जाड़ ह कमतिया जथे अउ सूरुज नारायण के तेज ह बेरा चढती म तेज होय ले धर लेथे, ये मौसम के बखान मँय हा काय करँव येकर बखान तो धरती, अगास, आगी, पानी, हवा,जीव जनावर,पर्वत,नदिया,झील झरना,घाटी, डीह डोंगरी,फूल पात ले लेके मनखे मन सबो करत रहिथें I
सबो परानी म अतेक उछाह भर जथे जेकर कोनों सीमा नइये I माघ के महीना चारों कोती जेती आँख गड़ाबे हरियरे-हरियर खेत-खार म उतेरा उन्हारी गहूँ,तिवरा,सरसों,राहर,मसूर अउ बारी बखरी म लाल,पालक, मेथी,धनिया,पताळ,मिर्ची,गोभी,मुरई आनी-बानी के साग भाजी शोभा ल बढ़ात रहिथे I बाग बगइचा म रंग-रंग के फूल म तितली अउ भौरा मन मंडरात रहिथे I अमरइया म कोयली के मीठ बोली मनला लुभात रहिथे, अमली अउ बोईर के लटलटा फर ल देखके मुँह म पानी आ जथे I माने बसंत रितु के स्वागत सत्कार म प्रकृति मानों सरग ले उतर के आय हे तइसे लागथे I
ऋतु राज उमंग भरे मन मा,सब पीर थकान मिटात हवै I
गमके चहुँ ओर सजे बगिया,सरसों अरसी लहरात हवै I
नव रूप धरे नव रंग सजे,खुशियाँ कतका बरसात हवै I
फुलवा महके पुरवा बहके,अउ कोयल गीत सुनात हवै I
पलाश के पेड़ ल देखबे त अंगरा आगी असन फुल के खिलई, आमा के बउँर के ममहई, कोयल के कुहकई, चिरई चिरगुन के ये डारा ले वो डारा फुदकई, तरिया, डबरी, नदिया नरवा के पानी के शांत चित्त गहरई, चारों कोती देख ले कोनों मेर सुन्ना नइ लागय, सबो जगा भरे-भरे उजास लागथे I घर होवय ते बन, खेत खार बियारा बारी अइसन निक लागथे अंतस के पीरा ह बसंत के आय ले भगा गे का I शादी बिहाव के होवई, गीता भागवत पूजा पाठ के चारों मुड़ा गियान बगरत रहिथे I तिहार असन उछाह, कोनों नाचत हे, कोनों गावत हे, झांझ मंजीरा बजात कतको झन स्नान धियान अऊ मेला मंडई जात, ते कोनों ह तीरथ बरथ करत दान पुन करत पुन कमात हे I अऊ ओकरे सेती कला,संगीत, वाणी, परेम, बिदया, लेखनी, ऐश्वर्य के देवी सरसती ह सबो परानी ऊपर अपन आशीष ल घलो बरसात रहिथे I देवी सरस्वती के आराधन करे के पर्व आय, एक ठन पौराणिक महत्व तको हावय, भगवान श्रीराम ह बनवास काल म भाई लक्ष्मण संग शिवरीनारायण तीर म शबरी के कुटिया म जाके उकर भक्ति ले अभिभूत होके, मया म जूठन बेर खाय रिहिस हे वो दिन भी बसंत पंचमी के दिन रिहिस हे I
तभे तो बसंत के महीना ल रीतु मन के राजा कहिथे I ये महीना ल सबो परानी के सेहत बर बड़ अच्छा माने गेहे,सबो परानी मन में नवचेतना अऊ नवउमंग के जोश समाथे I चारों कोती बहारे बहार ओनहारी पाती के झुमई ल देख डोकरा मन जवान हो जथे, ठुड़गा मन पहलवान बन जथे I सरसों के खेत के महर-महर महकई, गेहूं के बाली के निकलई, पंखुड़ियों में तितली के मंडरई, भंवरा के गुनगुनई, अइसे लागथे चारों मुड़ा मया के बरसात होवत हे I
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मउँरे घमघोर हवै अमुवा,परसा फुलवा मनहार लगे I
ऋतु राज बसंत जिहाँ दमके,बढ़िया चहुँ ओर तिहार लगे I
खिनवा पहिरे बँभरी भदरे,लहसे अमली फर डार लगे I
मउँहा ममहाय जलाय जिया,कपसा गदरे लगवार लगे I
धरती में होले-होले पवन के चलई, मतवाला मनखे के इतरई, तरिया डबरी में कमल के खिलई देख के अइसने अभास होथे कि कोनों नवा बहुरिया के घर मा गृह प्रवेश होय हे I जेकर सुगंध ह पूरा घर दुवार ल सुगन्धित करत हे I अऊ ओकर आय ले सब नाचत, गावत, झूमरत उछाह मनात हे, ये दिन सिरिफ धार्मिक अवसर के दिन नोहय बल्कि हमर संस्कृति,शिक्षा,प्रकृति अउ समाज के संग जुड़ाव के घलो उत्सव आय I बसंत पंचमी के पीला रंग जिनगी म खुशियाँ अउ उमंग भर देथे, वोइसने ज्ञान अउ कला के दीप मन भीतर उजियारा करथे I बसंत पंचमी ह उत्सव अउ पूजा के साथ सामाजिक संदेश तको देथे, तभे तो कहिथे न, ज्ञान सबले बड़का धन आय,शिक्षा समाज के रीढ़ आय,कला अउ संस्कृति बिना जिंनगी अँधियार आय I ये परब हमन ल प्रकृति के संरक्षण अउ पर्यावरण के संतुलन के संदेशा तको देथे I सियान मन के अनुभव ले सीख,गुरु शिष्य परंपरा के मजबूत संबंध अउ समाज म सीखे सिखाय के परंपरा ल जीवंत करथे I आज मोबाइल.इंटरनेट अउ आधुनिकता के दौड़ म हमन अपन संस्कृति ले दूर जात हन I बसंत पंचमी हमन ल अपन जड़ ले जुड़े रेहे बर शिक्षा अउ संस्कार के साथ नैतिकता के पाठ तको सिखाथे I ताकि येकर महक ह जनम जन्मातर तक पीढ़ी दर पीढ़ी बने राहय I
विजेन्द्र कुमार वर्मा
नगरगांव (धरसीवां)
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