*मंगनी-जोरनी, फलदान*
*बेटी -रोटी, बेटा -फेटा।।*
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हमर छत्तीसगढ़ के जम्मो नेंग - जोग,दस्तूर परकिरती ऊपर निरभर हावे । जेन गाँव के संसकीरती मा बसथे। काबर कि इहाँ के जाएदातर किसान, मजदूर , अउ आन मनखे मन तको गाँवें म रहिथें।
तेकरे सेती गवईहाँ किसम ले रीति- रिवाज परंपरा ला निभावत रहिथें। बछर मा तीन ठिनिक परमुख मउसम - सरदी, गरमी अउ बरसात होथे। ये तीनों मउसम म कोनो न कोनो तीज - तिहार के संगे- संग रिस्तेदारी के काम - बुता तको चलत रहिथे ।
पहिली काहय _ मांग महीना मंगनी बरनी, चइत बइसाख म बिहाव लट्ठाय अउ जेठ के पहिली बहु ला गउना कर लाय। फेर बदलत जमाना म अहु दिन बादर पतराय लगत हे। अब मनखे मन येकरो ले आगू- पाछू मंगनी , बर बिहाव ल करत रहिथें ।
जहाँ तक मंगनी - जोरनी के काम - बुता हे , वोहर धान - कोदो के लुवई , टोरई ले पहिली या पाछु होथे । परियास रहिथे फागुन महीना ले पहिली हो जाय ।
जब घर के बेटा - बेटी लइका ले जवान हो जाथे , तब लड़का बर लड़की अउ लड़की बर लड़का जुग - जोड़ी के जरूरत परथे।
तब लड़का पक्छ के मुखिया गाँव के दू - चार झन ल धरके लड़की खोजे बर आन गाँव डहर निकलथे।
सिरिस्टी मा नर- नारी के बिना जिनगी आगू बढ़बे नी करे , जुग - जोड़ी, नर - नारी के किस्सा सगरो जीव, परानी म पाय जाथे ।
त ए पराकिरतिक नियम ले मनखे कईसे बांच पाहि।समाजिक बुजुर्ग मन ये रिवाज ल बहुत सुग्घर ढंग ले निभाथें। अइसे जिनगी म होनच हे - जनम, बिहाव, मृत्यु । वइसनहे समाज म बियापत हे _ बेटा- फेटा, लेटा। रोटी- बेटी ,गोटी। जात - गोत ,नाता। आई - माई, दाई। घर- अंगना, दुवारी जइसन गोठ बात होबेच करथे।
बेटा आथे त फेंटा पाथे, माने बेटा के परसादे म समधी ऊपर फेटा बँधथे। बेटी - रोटी _ बेटी आथे त रोटी खाथे, मतलब बेटी के होय ले ही जम्मो समाज माई - पिल्ला हर जुरियाके माँदी भात खाथें ।
तइहा जमाना ले लेके आजो भी समाज मा बेटी के बड़ महत्ता हे। जइसे कोरे गाथे बेटी अउ नींदे कोड़े खेती, बड़ सुग्घर लगथे । समाज हर सब ले पहिली बेटीच घर जुरियाथे।
जब लड़का - लड़की के मनपसंद हो जाथे तब दुनो पक्छ के सियान मन मंगनी- जोरनी जेला - फलदान चुआ लेवई , मन चुहई तको कहे जाथे तेकर तिथि ल तय करथें।
आजकल फलदान हर " सगाई के कारेकरम हो गेहे। फलदान के दिन लड़का पक्छ के डाहर ले लड़की के सबो सवाँगा ल पुरा करे के जुम्मेदारी निभाथे।लुगरा, पोलखा, चूरी , मुंदरी , टीकली, फुंदरी,खिनवा, माला फुली , कंघी , दरपन , सेंट, तेल इस्नो , पउडर जइसे नारी के जम्मो सिंगार के जिनिस नेवरनीन होवइया बहुरिया बर बिसाथे। एकरे संगे संग फलदान के नेंग -जोग ल बिधि- बिधान पूर्वक करे बर नरियर, लईचिदाना, गुड़, हुम - धूप, अगरबत्ती जइसे समान घलोक लेय के नियम हे।
चूआलेवई के पहिली दुनो पक्छ के सियान मन पगड़ी बाँध के अँगना दुवार म बईठ के हुम -धुप, अगरबत्ती, दूबी, फूल, चंदन ले लोटा के माढ़े कलस संग धरती पूजा, गौरा गनेस पूजा ल करथे एक - दुसर ल तिलक लगाथें।
लड़का -लड़की के बाप (पिता) एक दूसर ल नरियर भेंट करथे। ता इही जगा लड़की के बाप कहिथे _ लेवव हमन अपन बेटी ल हारगेन सगा कहि के परेम बंधना ल सबीकार कर लेथे,, इही हरे फलदान ।
समधी सजन बनना,संबंधित, सनबंध बनाके भेंट होय के नेंग जोग आय, ये जगा पहिली बार दु -परिवार के नत्ता - रिस्ता के बंधना बँधा जाथे।
ये दुनो पक्छ के जोहार भेंट होय के पाछू, सबों सवाँगा ले लड़की ल सजाके लोकड़हीन (सहेली) मन लाथें। लड़का -लड़की ल दुनो आजू - बाजू पीड़हा म बइठाथें।
अहूमन सुमर के हुम, धूप, अगरबत्ती लगाके सेवा अर्जी देथे तहाँ ले लड़का हर लड़की के अंगरी म तांबा (धरती के पहिली धातु) के मुंदरी ल पहिनाथे, एक दुसर ल फूल के हार डारथे। जम्मो बइठें सगा सोदर समाज फूल सिंचके, थपड़ी पिटके, जुग- जुग जिए के आसीरबाद ल देथें।
तेकर पाछू चूंआलेवई के नेंग सुरू होथे, जेमा पहुँचे सगा समाज रिस्ते बँध मन लड़की- लड़का ल रुपिया पइसा धराके, सियान मन हर दाड़ही म हाथ रख, चुक चूँ बजाके चूआ लेके आसिरबाद देथे। त इही ल कहिथे चुआलेवइ।
आखिर म लड़का -लड़की संगे -संग सियान मन के पाँव परके जोड़ी बने के आसिरबाद सबो ले लेथे।
ये ढंग ले गृहस्थ जीवन के पहिली नेंग दस्तुर सम्पन्न हो जाथे।
येकर एकेक नियम के बरनन करबो त लम्भा हो जाहि। अलग - अलग समाज के नेंग दस्तुर अलगेच देखेल मिलथे। कोस- कोस मा पानी अउ बानी के संगे संग रीति- रिवाज, परम्परा म बदलाव तको हो सकत हे।
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लेखांकन -------------✍️
*मदन मंडावी*
ग्राम ढारा (करेला) डोंगरगढ़
राजनांदगांव ,छत्तीसगढ़।
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