Saturday, 24 January 2026

छत्तीसगढ़ी व्यंग्य मुसुवा के इंटरव्यू

 छत्तीसगढ़ी व्यंग्य

 मुसुवा के इंटरव्यू

वीरेन्द्र सरल

राजधानी के तीर राष्ट्रीय राज मार्ग म मुसुवा मन ल दल के दल आवत देख के मय बक खा गेंव। गुने लगेंव मुसुवा मन बर कोन्हों परिवार नियोजन कार्यक्रम चले रहितिस तब इंखर संख्या अतेक नई बाढ़े रहितिस। पूरा राजमार्ग म कब्जा कर डारे हे बिया मन। हो सकथे कहूँ मेर मुसुवा मेला लगे होही । नहीं ते कहूँ मेर इंखर राष्ट्रीय सम्मेलन होवत होही तिहां जावत होही बपरा मन फेर उंखर चाल-ढाल म अइसन कोई उत्साह नई दिखत रिहिस। थोथना ल ओथारे लरघाय असन रेंगत रिहिन बिचारा मन। कोरोना काल म जउन पीड़ा शहर ले गांव लहुटत प्रवासी मजदूर मन के शकल म दिखत रिहिस उही पीड़ा अभी मुसुवा मन के शकल म दिखत रिहिस। थोड़किन अउ ध्यान से देखेंव तब का देखथंव सब मुसुवा मन के माथ म टीका लगे हावे। मोर भीतरी के पत्रकार जाग गे। मन होइस एकाध झन मुसुवा संग गोठ-बात करके सच ल जाने के कोशिश करंव।

  बने मोठ-डांट मुसुवा ल ज उन ल उंखर संगवारी मन घुस मुसुवा साहब कहत रिहिन उही ल राम रमुआ करके माइक धरे-धरे महुँ ओखर पाछु-पाछु रेंगत पूछेंव- मुसुवा साहब नमस्कार! सबले पहली हमर चैनल म आपके बहुत -बहुत स्वागत हे। आप अतेक झन एकेच संग कहाँ ले आवत हव अउ कहाँ ले जावत हव? अउ तुंहर माथ म ये टीका कोन लगाय हावे? का कहूँ मेर आप मन के स्वागत सत्कार होय हे?

 घुस मुसुवा अपन पीड़ा ल पियत किहिस - हमन कवर्धा ले आवत हन भैया। हमर मन ऊपर आरोप लगे हे कि हमन सात करोड़ के बाइस हजार किवंटल धान ल सफाचट कर दे हन। हमर माथ के ये टीका कलंक के टीका आय अभी अउ सुनई आय हे कि बागबाहरा म घला हमर गोटियार सगा मन ऊपर पांच करोड़ के धान ल खाय के आरोप लगे हे। जब ले ये कलंक के टीका माथ म लगे हे, हमर मन के सामाजिक बहिष्कार होगे हे। समाज म हमर इज्जत दु कौड़ी के नई रहिगे हे। समाज ल तो छोड़ घर म घला हमर मुसुवाईन मन रात दिन गारी-बखाना देवत हे। बिला के मेन गेट ल बन्द करके भीतरी ले मोर मुसुवाईन मोला घेरी -बेरी आई हेट यू अउ डोंट टच मी कहत हे। समाज म सब झन पहिली घुस मुसुवा कहिके सम्मान करय तेमन अब घूसखोर मुसुवा कहिके अपमान करत हे। हमन मुसुवा अन ददा, घूसखोर मनखे या कोन्हों बाबू, साहब , नेता या मंत्री नोहन जउन अतेक अपमान ल सही सकन। मन होथे मुसुवा दवई खा के आत्महत्या कर लेवन फेर संगवारी मन किहिन कि कलंक के टीका लगाय-लगाय मरबो तब तो नरक म घला ठउर नई मिलही तेखर ले  सात करोड़ के धान खवैय्या मुसुवा मन के पकड़ात ले हमन ल लड़ना पड़ही। हमर पेट ल देख के तुही मन अंदाज लगाव कि का अतेक धान ल खा के हमन पचा पाबो? बदहजमी म मर जबो ददा बदहजमी म। हमर पेट अउ मुँहूं के साइज ल देख के तो आरोप लगातिस बेईमान मन। हमन मनखे नोहन ददा कि पशुचारा, कोयला, गिट्टी, सीमेंट, रेती, लोहा लक्खर सब ल पचो लेन। हमर हालत तो अभी अइसे होगे हे कि हमरे बियाय  लइका मन घूसखोर पापा, घूसखोर पापा कहिथे चिढ़ावत हे। धिक्कार हे अइसन जिनगी ल। फेर वाह रे मनखे। अचरज लागथे घूस खाने वाला, घोटाला करने वाला, दूसर के हक छिनने वाला मनखे मन कतेक कूटहा अउ निशरमा होही जउन मन ल एकोकनी बात-बानी नई लागे। हमन अपन माथ के कलंक ल धोय बर राजधानी म धरना-प्रदर्शन करे बर जावत हन। ओती बागबाहरा वाला संगवारी मन घला संघरही तहन सबो झन मिलके धरना-प्रदर्शन करके सात करोड़ अउ पांच करोड़ के धान खवैय्या मुसुवा मन ल पकड़े के मांग करबो। बस धरना -प्रदर्शन करे के जगह ल बता देतेव तब बड़ा किरपा होतिस।

 घुस मुसुवा के बात ल सुनके मोर मुँहू बन्द होगे। नाव भले घुस मुसुवा हे फेर घूस ल कभू मुहुँ नई लगाय हे अउ येती कई झन अइसे मनखे हे जिंखर गजब सुंदर-सुंदर नाव हे फेर बिना घूस खाय टस ले मस नई होवय।

 मय कलेचुप ओ मेर ले रेंगे लगेंव तब घुस मुसुवा किहिस- " देख भैया। आजकाल पत्रकार भैया मन घला सही बात ल छापे म डर्राय ल धर ले हे। पत्रकारिता ल लोकतंत्र के चौथा स्तम्भ माने गे हे। जब तक दूध के दूध अउ पानी के पानी नई हो जही । कार वाला, फाइल वाला सात करोड़ी मुसुवा मन पकड़े नई जाही तब तक आप हमर पीड़ा ल जनता-जनार्दन ल बतावत रहू तभे तुंहर पत्रकारिता ह सार्थक होही।


वीरेन्द्र सरल

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