छत्तीसगढ़ी म गद्य साहित्य (व्यंग्य)
वीरेन्द्र सरल
छत्तीसगढ़ी म व्यंग्य ये विषय म चर्चा करे के पहली हमला व्यंग्य काय हरे? व्यंग्य काखर ऊपर अउ कइसे करे जाथे ? व्यंग्य के उद्देश्य काय हरे ? येला बहुत गम्भीरता ले समझे के जरूरत हे । तब आवव सबले पहली व्यंग्य के स्वरूप ल समझे के कोशिश करथन।
व्यंग्य के बड़े - बड़े विद्वान मन येला अपन - अपन ढंग ले परिभाषित करे हावे। व्यंग्य ल प्रतिरोध के स्वर माने जाथे। व्यंग्य हमेशा विपक्ष के भूमिका निभाथे। एक झन विद्वान ह व्यंग्य ल सार्थक हस्तक्षेप के लोकतांत्रिक अधिकार कहे हे। व्यंग्य सदैव आम आदमी के पीड़ा ल स्वर देथे। सत्ता चाहे राजनीतिक हो, धार्मिक हो, सामाजिक हो चाहे अउ आने प्रकार के हो यदि ओखर काम मानव या मानवता विरोधी होथे तब उही मेर ओला चेताय बर व्यंग्य के काम शुरू होथे। साहित्य ल समाज के दर्पण कहे जाथे। जब साहित्य के आने सबो विधा ह समाज के आघू म दर्पण असन खड़े हो के ओखर चित्र देखाथे तब व्यंग्य ह एक्सरे अउ सोनोग्राफी के मशीन असन समाज ल ओखर चरित्र देखाथे। कहे कि मतलब आय के व्यंग्य ह केवल बाहर - बाहर नहीं भितरौन्धी बात ल समाज के सामने लाय के काम करथे। व्यंग्य समाज के वस्तुगत परिस्थिति म समाय अंतर्विरोध के अभिव्यक्ति आय। व्यंग्यकार अपन समय अउ समाज के सच्चाई के प्रति जागरूक रहिथे अउ वोहा कोंदा-भैरा असन ओला कलेचुप देखत नई रहय भलुक सच ल सच कहें के खतरा उठाथे। इही पाय के व्यंग्यकार ल गूंगी जनता के वकील कहे जाथे। व्यंग्य ह साहित्य के सीमा म बंधाय नई हे बल्कि जिंहा तक मानव जीवन के प्रसार हे उँहा तक व्यंग्य के विस्तार हे।
व्यंग्य ह समकालीन समाज अउ राजनीति के दर्पण होथे जउन ह समाज के विकृति अउ कमजोरी ल बताथे। व्यंग्य के काम केवल मनोरंजन नोहे वो हा चेतना ल झकझोर के मनखे ल सोचे - विचारे बर बाध्य करथे। व्यंग्यकार के काम कबीर के ये दोहा कि कबीरा खड़ा बाजार में, मांगे सबकी खैर, न काहूँ से दोस्ती न काहूँ से बैर।। असन होथे । वोहा तटस्थ भाव ले लोक मंगल के भावना रखत अपन बात कहिथे।
कभू - कभू हमन हास्य ल घलो व्यंग्य कहे के या माने के गलती कर देथन। जबकि दुनो एकदम अलगेच आय। कोन्हों घटना, क्रिया, परिस्थिति, लेख या विचार के दो मुंहापन, असमानता, आसमजस्य ल देख, सुन या महसूस करके मनखे के मन म जो आनन्द भाव उतपन्न होथे वोहा हास्य आय। हास्य के काम केवल मनोरंजन होथे जबकि व्यंग्य के काम पाखण्ड के पर्दाफाश करके सामाजिक जागरुकता अउ राजनीतिक चेतना लाना होथे। येला अउ अच्छा ये उदाहरण ले समझ सकथन कि हास्य ह कोन्हों फिल्म के कॉमेडियन आय अउ व्यंग्य ह फ़िल्म के हीरो।
कोन्हों - कोन्हों मन आरोप लगाथे कि व्यंग्यकार मन हमेशा गलतीच ल देखथे बने - बने बात ल काबर नई देखे अउ लिखे? तब भैया डॉक्टर के काम ह बीमारी देखे के आय कि स्वास्थ्य देखे के? डॉक्टर चाहथे कि मनखे आज जतका स्वस्थ्य हे आने वाले समय म ओखर ले जादा चुस्त, दुरुस्त अउ तंदुरस्त रहय। डॉक्टर ह मरीज के शरीर के फोड़ा फुंसी के ऑपरेशन करे बर चाकू चलाथे तब ओखर मन में गुस्सा नहीं भलुक करुणा अउ दया के भाव होथे। ओखर उद्देश्य ह मरीज के पीरा ल बढ़ाना नहीं भलुक पीरा से मुक्ति दिलाना होथे बस वइसनेच काम व्यंग्य अउ व्यंग्यकार के होथे। वोहा अपन समकालीन समाज ल अउ बढ़िया स्वस्थ्य बनाना चाहथे। तिही पाय के सबो किसिम के कमजोरी ल देख के लिखत रहिथे। ये काम कबीर ल लेके आज तक चलत हे अउ जब तक समाज म विसंगति, विद्रूपता , शोषण अउ असमानता रही तब तक आघू घला चलते रही।
ये तो बात होइस व्यंग्य काबर? अब बात व्यंग्य कइसे करे जाय। तो व्यंग्य अइसे हो कि गलती करने वाला अपन गलती ल समझ घला जाय अउ ओला दुख घला होय फेर वोहा व्यंग्यकार ल तै मोर ऊपर व्यंग्य करे कहिके कहि घला झन सकय। मतलब व्यंग्य व्यक्ति विशेष ऊपर नहीं बल्कि प्रवृति विशेष ऊपर होथे। मने कोन्हों आन मेर नजर अउ कोन्हों आन मेर निशाना । व्यंग्य ह करू होथे तब ओखर स्वाद ल बढ़ाय बर हास्य के तड़का लगाय बर लागथे। जइसे डॉक्टर मन करू दवाई ल मन्दरस म मिला के खाय बर कथे या सब्जी के सुवाद ल बढ़ाय बर सुवारी ह नून, तेल, मिर्चा के उपयोग करथे। कोन्हों साग कम अउ नून, तेल, मिर्चा मन जादा हो जहि तब तो साग के सुवादेच बिगड़ जहि। अइसने व्यंग्य ल सुस्वादु बनाए बर हास्य के उपयोग करे जाथे। कहूँ हास्य के मात्रा जादा होईस कि व्यंग्य के सुवाद ह बिगड़ीस।
ऊपर म लिखाय गोठ -बात के आधार म छतीसगढ़ी व्यंग्य के विकास यात्रा ल समझे के कोशिश करे म हम पाबो कि छत्तीसगढ़ी व्यंग्य अभी अपन किशोरावस्था म हे । मने न पूरा परिपक्व होय हे अउ न बिल्कुल नासमझ हे।
वइसे भी हिन्दी व्यंग्य के इतिहास ल घला विद्वान मन बीसवीं शताब्दी के सुरुआत ले ही मानथे। विद्वान मन के कहना हे कि पहली तो व्यंग्य ल विधा घला नई माने जावत रिहिस। हिंदी के सुप्रसिद्ध व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई जी ह खुदे व्यंग्य ल विधा के बजाय स्प्रिट कहे हे जउन कविता, कहानी, नाटक, निबन्ध सबो म हो सकत हे।
जब हिंदी व्यंग्य के इतिहास ह लगभग सौ -डेढ़ सौ बरस के माने जावत हे तब छत्तीसगढ़ी व्यंग्य के इतिहास ल हम बहुत आसानी से समझ सकत हन।
हाँ लिखित सहित्य के बजाय हम वाचिक परम्परा के सहारा ले के कोन्हों इतिहास मानबो तब जरूर येहा जुन्ना हो सकत हे। वाचिक परम्परा के लोक कथा, लोकगीत, हाना-ठेही म जगह-जगह व्यंग्य के पुट देखे बर मिलथे। जइसे बिहाव के ये भड़ौनी गीत म देखव-
बड़े -बड़े तोला जानेन्व सगा, कुंआ म डारेंव बांस रे।
झाला-पाला लुगरा लाने जरय तुंहर नाक रे।
दार करे चाऊंर करे लगिन ल धराय रे।
बेटा के बिहाव करे बाजा ल डर्राय रे।
मेंछा हावय लाम लाम मुँहू हावय करिया रे।
समधी बपरा काय करय पहिरे हावय फरिया रे
अइसने बानगी पंथी गीत म घलव देखव---
घट-घट म बसे हे सतनाम, खोजे ल हंसा कहाँ जाबे रे।
ये मूरख पापी चोला सुन ले गुरु के वाणी ल।
अन्तस् म सतनाम बसा ले झन हो तै अज्ञानी ग।
या
अपन घट के देव ल मनईबो, मन्दिरवा म का करेल जईबो।
अइसने व्यंग्य के बानगी छत्तीसगढ़ी हाना अउ ठेही म गजब दिखथे--जइसे---
घर म नाग देव भिम्भोरा पूजे ल जाय। कोरा म लइका अउ गांव भर गोहार। जोग म साख नहीं भभूत म आँखी फोड़य। कुकुर ह गंगा जाही तब पतरी ल को चांटही। सहराय बहुरिया डोम घर जाय। नवा बइला के नवा सींग, चल रे बइला टिंगे टिंग। पइधे गाय कछारे जाय। खाय बर लरकु, कमाय बर टरकु। हाथ म घड़ी कान म सोन तेखर बुता ल करही कोन। नांगर के न बख्खर के दौरी बर बजरंगा। देखब म श्याम सुंदर पादे बर ढमक्का। ये तो छत्तीसगढ़ी के वाचिक परम्परा म समाय व्यंग्य के बात होइस फेर चर्चा के मूल बात तो छत्तीसगढ़ी के व्यंग्य आय। एखर लिखित रूप के गोठबात बिन तो ये लेख अधूरा हो जही। तब आवव मिले जानकारी के आधार म ये विषय ऊपर चर्चा करन।
सन 1950 म रचित अउ 1955 म प्रकाशित कपिल नाथ मिश्र जी के खुसरा चिरई के बिहाव नाव के कृति ल अभी- अभी छत्तीसगढ़ी के प्रथम व्यंग्य होय के रूप प्रचारित - प्रसारित करे जावत हे फेर अकलतरा डॉट कॉम म येला पढ़े के बाद येहा मोला हास्य रचना के रूप म लागिस जउन ह कविता संग्रह आय। दूसर बात येला पढ़े म विशुद्ध छत्तीसगढ़ी असन नई लागे बल्कि हिंदी अउ छत्तीसगढ़ी के मिंझरा रूप असन लागिस हे। अइसनेच किसिम के रामेश्वर वैष्णव जी के काव्य संग्रह नोनी बेन्द्री अउ उधोराम झकमार जी के कविता संग्रह ररूहा सपनाय दार -भात घला रिहिस। झकमार जी के किताब ला प्रांतीय छत्तीसगढ़ी साहित्य समिति ह प्रकाशित कराय रिहिस। यदि छत्तीसगढ़ी कविता म व्यंग्य के बात करन तब एला वैश्विक प्रसिद्धि देवाय म सबले बड़े योगदान छत्तीसगढ़ राज भाषा आयोग के पूर्व सचिव अउ अंतराष्टीय कवि पद्मश्री डॉ सुरेन्द्र दुबे जी के योगदान सबले बड़का अउ अविस्मरणीय हे।
ये सत्र ह छत्तीसगढ़ी म गद्य व्यंग्य ऊपर केंद्रित हे तब गद्य रूप के चर्चा करना ही ज्यादा महत्वपूर्ण हे।
मिले जानकारी के मुताबिक सन 1970 म दैनिक युगधर्म रायपुर में स्व हेमनाथ यदु द्वारा छत्तीसगढ़ी कालम लिखे के शुरुआत होइस। फेर छत्तीसगढ़ी व्यंग्य ल पोट्ठ करे म सबले ज्यादा काम रामेश्वर वैष्णव जी के दिखथे। बागबाहरा ले दिलीप सोनी जी के द्वारा संपादित पत्रिका बांगो टाइम्स म ओमन 1976 ले 77 तक आँखी मूंद के देख ले कालम लिखिन। छत्तीसगढ़ी झलक म 1978 ले 80 तक दार-भात चटनी नाम के कालम लिखिन। छत्तीसगढ़ी सेवक म 1980 ले 86 तक गुरतुर - चुरपुर कालम लिखिन। 1986 ले 1993 तक अउ 2010 ले 2013 तक लगभग दस साल ले दैनिक नवभारत म उत्ता-धुर्रा कालम लिखिन अउ 1998 ले 2000 तक दैनिक भास्कर म उबुक-चुबुक नाव ले कालम लिखिन जउन ह अभी 2024 म पुस्तक रूप म प्रकाशित होय हे। दैनिक देशबन्धु म परमानन्द वर्मा के बेरा - बेरा के बात अइसने किसम के नव भास्कर म लक्ष्मण मस्तूरिहा जी ह घला माटी कहे कुम्हार से, दैनिक स्वदेश म जी एस राम पल्लीवार ह रईचुली , सुशील भोले के आखर अंजोर अउ किस्सा कलयुगी हनुमान के , रामेश्वर शर्मा के जाती - बिराती, आनन्दी सहाय शुक्ल के कांव -कांव , दैनिक नवभारत बिलासपुर म डॉ पालेश्वर शर्मा के गुड़ी के गोठ, दैनिक नवभारत म 2003 म सुशील यदु ह लोकरंग नाम के कालम लिखिन। व्यंग्य के रंग किताब के माध्यम ले जानकारी मिलिस कि सुधा वर्मा जी ह एक लेख के माध्यम ले बताय हावे कि 1962 म घला कालम लेखन होवत रिहिस जेखर नाम बेरा - बेरा के बात रिहिस अउ ओला पहिली टिकेंद्र टिकरहा जी लिखत रिहिन बाद म उही ल भूपेन्द्र टिकरहा जी मन लिखिन। बाद म परमानंद वर्मा जी द्वारा लिखित कालम डहरचला घला रोज छपत रिहिस। हरनारायण शर्मा जी ह बहेरा के भूत अउ दुर्गा प्रसाद पारकर जी ह रौद्र मुखी स्वर म 1992 ले 94 तक आनी-बानी के गोठ अउ दैनिक भास्कर म चिन्हारी नाव ले कालम लिखिन। पहट म भैया गुलाल वर्मा जी के कालम का कहिबे लगातार छपत रिहिस आजकाल शायद येहा दिखत नई हे। एखर छोड़ भी बहुत अकन कालम लिखे गे होही जेखर जानबा मोला नई हो पाय हे । ये कालम मन म यद्यपि हास्य अउ व्यंग्य के बहुत पुट जरूर होही फेर येला व्यंग्य माने म विद्वान लेखक मन के अलग अलग मत हे अउ ये कालम मन के लेख वाजिब म व्यंग्य के शर्त ल पूरा करथे या निमगा निबन्ध आय ये तो समकालीन विद्वान लेखक मन जादा अच्छा बता सकथे।
अभी तक छत्तीसगढ़ी व्यंग्य के प्रकाशित किताब के रूप म जयप्रकाश मानस जी के कलादास के कलाकारी, स्व राजेन्द्र सोनी जी के खोरबाहरा तोला गांधी बनाबो, कृष्ण कुमार चौबे जी के लंदफंदिया अउ गम्मतिहा, सुशील यदु जी के घोलघोला बिना मंगलू नई नाचय, विट्ठल राम साहू के नीम चघे करेला, द्वारिका प्रसाद वैष्णव जी के ठोंक रेट म चिल्हर ज्ञान अउ बनगे तोर बिगड़गे, धर्मेन्द्र निर्मल जी के तुंहर जंउहर होवय, दुर्गा प्रसाद पारकर जी के राजा के विकासयात्रा, कांशीपुरी कुंदन जी के बेईमान के मुड़ी म पागा अउ गदहा माल उड़ावत हे, महेंद्र बघेल मधु जी के झन्नाटा तुंहर द्वार , राजकुमार चौधरी रौना जी के का के बधाई, विजय मिश्रा अमित के कल्लू कुकुर के पावर, गुलाल वर्मा के का कहिबे नाव ले किताब प्रकाशित होय के अउ बन्धु राजेश्वर खरे जी के गाय के परमोशन नाव के प्रकाशनाधीन होय के जानकारी मिले हे।
छत्तीसगढ़ राज्य बने के बाद सबो कोती विकास के गंगा बोहावत हे तब साहित्य अउ विशेषकर छत्तीसगढ़ी व्यंग्य लेखन कइसे पाछु रही? यहु म गति आय हे। इंहा लिखैय्या मन अब व्यंग्य के मरम अउ धरम ल समझ के व्यंग्य लेखन करत हे। तभो ले हास्य व्यंग्य के कवि मन के तुलना म गद्य व्यंग्य लेखन करने वाला लेखक कमेच हावे। हरिशंकर देवांगन, संजीव तिवारी, कुबेर साहू, रीझे यादव , ललित नागेश, हीरालाल गुरुजी , ललित जख्मी, महेंद्र बघेल मधु, राजकुमार चौधरी, धर्मेंद्र निर्मल, चोवा राम वर्मा बादल, विवेक तिवारी जइसे सरलग व्यंग्य लिखैय्या के संगे-संग छिट-पुट व्यंग्य लेखन करैया लेखक मन में दीनदयाल साहू , अरुण निगम, दिनेश चौहान, दादुलाल जोशी असन अउ व्यंग्य के कतको लेखक मन ह लेखन करके ये विधा ल समृद्ध करत हे। आप मन चाहो तो ये क्रम म मोरो नाव ( वीरेन्द्र सरल ) ल रख सकत हव। छत्तीसगढ़ी व्यंग्य ल पोट्ठ करे म दैनिक हरिभूमि के चौपाल, देशबन्धु के मड़ई, पत्रिका के पहट प्रखर समाचार के सप्तरंग, अमृत सन्देश के अपन डेरा संगे संग लोकाक्षर व्हाट्सएप समूह अउ गुरतुरगोठ डॉट कॉम के बहुत महत्वपूर्ण योगदान हे। हिन्दी व्यंग्य म घला बने पोट्ठ आलोचना के किताब ह घला अंगरी म गिने के लइक हे अइसन बेरा म छत्तीसगढ़ी व्यंग्य आलोचना के किताब संजीव तिवारी जी द्वारा लिखित व्यंग्य के रंग बहुतेच महत्वपूर्ण हे। बहुत झन लेखक मन छत्तीसगढ़ी सरलग तो नहीं फेर कभु - कभू व्यंग्य लिख के छत्तीसगढ़ी व्यंग्य ल पोट्ठ करत हे। आजकल सोशल मीडिया म सुशील भोले जी के कोंदा - भैरा के गोठ के गजब चर्चा हे। मैं अपन मति अउ उपलब्ध जानकारी के आधार म ये लेख ल लिखे के कोशिश करे हंव। सम्भव हे बहुत झन लेखक अउ उंखर व्यंग्य किताब के नाव ये लेख म छुटगे होही। येला मोर अज्ञानता समझ के मोला माफी देहु।
वीरेन्द्र सरल
ग्राम -बोड़रा
पोष्ट -भोथीडीह
व्हाया-मगरलोड
जिला-धमतरी ( छत्तीसगढ़)
पिन 493662
मो -7828243377
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