Monday, 5 January 2026

देवउठनी एकादशी अउ मांगलिक काज*

 *देवउठनी एकादशी अउ मांगलिक काज*


                 मां भारती के कोरा मा सुशोभित छलकत धान के कटोरा 'छत्तीसगढ़' अपन संस्कृति-संस्कार, परब-तिहार, बन-बाग, नदी पहाड़ अउ खनिज संपदा बर जाने जाथे। हमर देश भारत होय या फेर हमर राज छत्तीसगढ़, दूनो के परब तिहार, संस्कृति संस्कार अउ उछाह मंगल के जम्मो कारज खेती किसानी के अनुसार चलथे। कतको झन मन प्रश्न करथें, कि कोनो भी मांगलिक काज देवउठनी एकादशी के बाद ही काबर करना चाही? कतको विद्वान में एखर कई कारण बताथें, फेर मूल कारण खेती किसानी अउ मौसम ही आय। देवउठनी एकादशी जेला छत्तीसगढ़ मा जेठवनी के नाम से जाने जाथे। ये दिन ला छोटे देवारी के रूप मा घलो मनाये जाथे। मनखें मन पूजा अर्चना, दान धरम करत फाटाका फोड़थें अउ खुशी मनाथें। ये दिन कतकोन गांव मा मातर होथे, गोधन ऊपर सोहाई बन्धाथे ता कतकोन कोती मड़ई मेला भराथे। संझा मनखें मन अपन तुलसी चौरा के तीर मा सुघर मंडप बनाके कुसियार अउ तोरन ताव ले सजाके, रिगबिग रिगबिग दीया जलाके भगवान सालिग्राम अउ तुलसी दाई के बिहाव के नेंग करथें। पूजा पाठ के बाद घरों घर प्रसाद दिए जाथे। वइसे तो कतकोन मन हर एकादशी के उपास रथे फेर देवउठनी तिहार के उपास के अलगे महत्ता हे। कथे ये उपास रहे ले सबे उपास के पुण्य प्रताप मिल जथे। महाभारत काल मा महाबली भीम हा घलो एकमात्र इही एकादशी के उपास रिहिस, जेखर ले प्रसन्न होके, भगवान विष्णु हा ओखर नाम ले एक अलग तिथि मा भीमसेन एकादशी व्रत अउ व्रत करइया मन ला विशेष पुण्य प्राप्ति के वरदान दिस। पौराणिक कथा अनुसार भगवान विष्णु देवउठनी एकादशी के चार मास के योगनिद्रा ले जागथे, ते पाय के ये तिहार मनाए जाथे। भगवान विष्णु के जागे के एक अउ कथा मिलथे- मुर नामक एक दानव हा भगवान विष्णु ला सुते देख ओखर ऊपर हमला कर देथे, जेखर ले विष्णु जी के निद्रा भंग हो जथे अउ 11 इंद्री ( 5 कर्म इंद्री+5 ज्ञान इंद्री+मन) के तेज ले एक दिव्य देवी उत्पन्न होथे, जे वो दानव के वध करथे। ये दिन घरों घर होवइया तुलसीविवाह के घलो पौराणिक कथा हे। एक समय रानी बृन्दा के सतीत्व के कारण ओखर पति राजा जलन्धर बहुते शक्तिशाली हो जथे, अउ अपन शक्ति ले देव अउ ऋषि मन ला सताएल लग जथे, ओखर वध बृन्दा के सतीत्व के कारण कोई नइ कर सकत रहय, ते पाय के भगवान विष्णु हा लोकद्धार बर छलपूर्वक रानी बृन्दा के सतीत्व ला भंग करके, जलन्धर के संहार करथे। जब ये बात बृन्दा जानथे ता भगवान विष्णु ला पथरा होय के श्राप दे देथें, अउ खुद सती हो जथें। उही पथरा सालिग्राम के रूप मा आजो पूजे जाथे, अउ रानी बृन्दा जेन जघा अपन आप सती करे रिहिस वो राख ले तुलसी के जन्म होथे। तब ले तुलसी अउ भगवान सालिग्राम के विवाह के चलागन हे। 


                आसाढ़ के देवशयनी एकादशी ले लेके कातिक के देवउठनी एकादशी तक भगवान विष्णु जब योगनिद्रा मा रथे, ता पृथ्वी के पालन पोषण भगवान महादेव सपरिवार करथें। ते पाय के आसाढ़, सावन, भादो अउ कुवाँर भर उही मन ला सुमिरथन। चाहे पोरा तिहार मा नन्दी महाराज होय, नांगपांचे मा नांग देवता होय, सावन सोममारी मा शंकर जी होय, तीजा मा पार्वती होय, गणेश चतुर्थी मा गणेश जी होय या फेर नवरात्रि मा मां भगवती। देवउठनी के बाद भरण पोषण के काज फेर भगवान विष्णु अपन हाथ मा  ले लेथें अउ जम्मों प्रकार के उछाह  मंगल के काज होएल लगथे। उछाह मंगल के काम देवउठनी के बाद होय के एक अउ महत्वपूर्ण कारण हमर कृषि परम्परा आय। काबर कि चतुर्मास(चौमास) भर बादर ले पानी बरसथे, घर-खेत, गली-खोर जम्मो कोती चिखला रथे, आदमी मन आये जाये मा असहज महसूस करथें, संगे संग खेती किसानी के बूता घलो चरम मा रथे अउ बरसा घरी जर बुखार के घलो डर रहिथे, एखरे सेती कोनो भी जुड़ाव अउ उत्सव के काज मा सब सपरिवार शामिल नइ हो पाए अउ व्यवस्थापक ला सहज व्यवस्था करे मा घलो कतको  दिक्कत होथे। ते कारण देवउठनी के बाद के समय ला अइसन काम बर  चुने जाथे। ये समय पानी बादर लगभग बन्द हो जथे, गुलाबी ठंड जनाय बर लगथे अउ धान पान के बूता घलो उसरे बर लग जथे। अइसन बेरा मा बर बिहाव, छट्ठी बरही, पूजा पाठ, भगवत रमायन, मड़ई मेला सब उत्साह अउ मंगल ले सबके उपस्थिति मा सुघ्घर ढंग ले निर्बाध सजथे। 


                       ये दिन घर भर भगवान के भक्ति मा लीन रथे। बिहना स्नान ध्यान के साथ पूजा पाठ चालू हो जथे। घर ला सुघ्घर रंगोली अउ तोरण ताव मा सजाये जाथे। आमा पाना अउ गन्ना के मंडप बनाये जाथे। घर के कतको झन उपास रथे अउ दीया जलाके, मेवा मिठाई, फरा चीला अउ नरियर के प्रसादी चढ़ाथें। ये दिन आयुर्वेद में विशेष स्थान रखइया तुलसी के पौधा लगाए अउ जतन करे के संकल्प लिए जाथे। कथे जे घर तुलसी के पौधा हे वो घर मा सुख समृद्धि अउ शांति रहिथे अउ इही सुख समृद्धि, शांति अउ दया मया के पावन परब आय देवउठनी।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

No comments:

Post a Comment