मांदी भात
- डुमन लाल ध्रुव
बरसात के दिन रिहिस। गांव के हर कोना ले भाप उठत रिहिस। धान के खेत मा गोड़ेला चिरई मन हा धम्मक - धम्मक सुर लगात रिहिस। इही बूंदा-बांदी के महक मा सोनपुर गांव के बछरु - बछरिया मन खुस होय के बिचरत हे । काबर के आज हफता भर ले सब्बो झन
‘ मांदी भात ’ खाय के अगोरा करत हे।
गांव के बीच मा ठाढ़े हवे सांहड़ा देव के जुन्ना देवाला । ओही मा नेग नियम के बाद पहिली मांदी चढ़ाय जाथे। सोनपुर के मन ये रीत ला बड़े भकती भाव ले मानथे । मांदी भात धान बियासी बर बनाय जाने वाला मइया पूजा के भाखा, दाई - माई मन के सीख अऊ खेत-बारी के अगोरा हरे।
रज्जू महराज आज अपन दस बरिस के बेटा “ अमन ” ला संग मा खेत लेजे खातिर निकरे रिहिस । अमन उमर मा छोटे भले रिहिस फेर अक्कल मा चुस्त। बच्छर भर तक ओहर मांदी भात बनाय के चलन ला सुनत रिहिस फेर आज पहिलीच बखत ओला ये सब्बो जिनिस ला देखे बर मिलिस ।
“ ददा, मांदी भात बनगे ।सच मा दाना जिंहा परे ओहीच ले धान मोहर सुतूर जाथे ? ” अमन उछलत पूछिस ।
रज्जू महराज हांस परिस “अरे नादान, मांदी मा कहीं भी जादू हवय का ! मांदी बने मा दाई के मया, खेती डोली, धरती माता के आशीर्वाद अऊ गांव के एकता बाढ़थे । जादू जऊन हवे वो तो हमर बिसवास के हे । ”
अमन ददा के बात ला चिलिक लगा के सुनत रिहिस फेर ओखर मन मा किसिम किसिम के सवाल उठत रिहिस। “ददा, तुमन कहिथो के मांदी खाय ले देह चमकथे, बुद्धि बाढ़थे कहिके का ये बात सच हावे ? ”
रज्जू महराज खेत डहर देखावत किहिस “बेटा, जब हमन अपन धरती के भात ला नीम पत्ती, मेथा, चाउर-पानी मा पकाथन त देह ला हलकापन मिलथे अऊ जब गांव के सब्बो मन एकहाथ होके काम करथे त मन ला ताकत मिलथे । मांदी भात देह ला नइ मनखे ला जोड़ेच बर बने हवे । ”
अमन ये बात ला मन मा उतार लिस।
देवाला के आड़ मा आज घलो खूब भीड़ । दाई- माई मन धान के नवा बियासी ला चुंगी-चुंगी लानत रिहिन। जुन्ना तिलकधारी पंडित जी जऊन ला गांव के मन “ महा ददा ” कहय । ओखर आवाज गजब गूंजत रिहिस । “ देखव दाई मन! चंउरा ला साफ सफाई कर लेव । जऊन दाना सड़गे हवय वोला हटा देवव। देवी मइया के पूजा मा कभू खराब दाना झन परय । ”
अमन ददा के संग देवाला मा पहुंचिस । दाई- माई मन अमन ला देख के हांस परिस।
“एला देखव! रज्जू महराज के बेटा तो अब कोनो भी काम होवय पाछू नइ रहय । ”
अमन खुस होगे । ओला पहिलीच मलयागंधी महक आइस । धान के बाली , गोबर लेप, हल्दी, अऊ सुग्गर घाम।
रज्जू महराज महा ददा ला प्रणाम करिस । “बाबा, आज वो दिन भी आगे जऊन दिन ले गांव के मनखे मन हफ्ता भर ले मेहनत करत”
महा ददा किहिस -“ सही कहत हस रज्जू महराज। मांदी भात सिरिफ भात नइहे ये तो गांव बर एक बिसेस तिहार हवे ।”
दाई मन अपन-अपन घर ले दउड़-दउड़ के तइयारी करत रिहिन । कोनो नीम के पत्ती, कोनो धान के नवा मोहर, कोनो पनहेरी मा भरके चांउर पानी ।
मांदी बने बर पहिली चांउर ला धोये जाथे । चांउर-पानी जेन ला “ मांदी ” कहिथें ओला धूप मा सुखाय जाथे । फेर मेथा, नीम, अऊ कभू-कभू महुआ के पत्ती संग बघार देथे ।
अमन धियान ले देखत रिहिस। ओखर मन मा नवा-नवा बात बनत रिहिस। ग्राम्य जीवन के जऊन सजीव चित्रण होथे ओहा अमन के आंखी मा चमकत रिहिस । मोर बगरे चिकनादार कुम्हड़ा, मड़ई मा खेलत सुरही बछरु ।
मांदी के बड़े सानी सुघ्घर बासन मा उबाल देथे । उबाले के बाद ओला आधा ढांक देथे। जेखर भीतरी भाप हावे फेर हवा चलथे इही मा एक किसिम के खमीर उठथे ।
अमन पूछिस “ दाई, ये मांदी भात ला सुंघतस काबर, लगथे के देह बर बने होही ? ”
दाई हांस परिस “ बेटा, मांदी भात तो हमर छत्तीसगढ़ के दवा हवे । गरमी मा खा लेव देह ठंडा । बरसात मा खा लेव पेट साफ अऊ ठंड मा खा लेव बुखार उतर जाथे। ”
अमन मन मा सोचिस “वाह ! एमा तो जादू हावे !”
देवाला तीर मा कल्लू, सोनू, बहादुर अऊ दुलारु मन भइया हीरा के संग खेलत रिहिन । सोनपुर के लइका मन के शरारत हा अगुवागे रिहिस ।
दुलारु हा गांव के बड़े गंउटिया के बेटा हीरा ला किहिस।
“अरे हीरा! जानथस ? मांदी के गोठ कथा ले गांव मा भूत-पिसाच घलो डरथें !”
हीरा ठठा परिस - “ हाव भइया! मांदी त दवा हरे फेर का भूत मन दवा ले डरथें ?”
कल्लू उछल के किहिस “भूत नइ, दाई के चिमटे ले डरथें!”
जम्मो लइका मन कठल कठल के हांस परिस।
रज्जू महराज दूरिहा ले हांक दीन “अरे ओ लइका मन! देवाला अंदर हावे थोरिक चुपचाप रहव। आज महा ददा हा पूजा करही ।”
लइका मन चुप रिहिस, फेर मने मन लुक-छिप के मुसकात घलो रिहिस।
दूसर दिन सूरुज के किरन नवा-नवा अपन चमक दिखावत रिहिस।देवाला मा पूजा शुरु होगे । सुघ्घर फूल पान, दूबी, धान, अऊ कुम्हड़ा परदान होवत हे।
हा हीरा भजन मंडली संग भजन गावत रिहिस ।
“ मोर धान मइया जय होवय तोर,
मोर धरती मइया जय होवय तोर !”
पूजा के बाद गांव के हर घर मा मांदी भात बने लगिस । दाई माई मन बड़े मोह ले मांदी पकाइस । कोनो मा हरी मिर्ची के बघार त कोनो मा हलका जीरा के फोरन।
आज घर-घर मा खुशबू के जावर फैइलगे । लइका मन घलो भूख के मारे मांदी भात के अगोरा करत रिहिस।
हीरा बोलिस “दाई, का मंय पहिली थारी के भात ला रख सकत हंव ?”
दाई किहिन - “हाव बेटा, रख दे । आज तो तोरे हांथ के परसाद हवय ।”
हीरा पहिली थारी ला देवता पास रखिस । फेर खुद खाय के तइयार । थारी मा मांदी भात संग मा अम्मट मही मा रांधे कोचई - कुम्हड़ा के गजब मिठास रिहिस। भउजी मन के मुंहू मा पानी आगे।
हीरा जब पहिली कौर मुख मा डारिस त ओखर देह मा एक किसिम के हलकापन उतरिस जइसे धरती महतारी के मया हा ओला अपन चटकार मा धर लेइस ।
भोजन के बाद गांव मा जबर बइसका होइस । महा ददा हा गांव के जम्भो लोगन मन ला समझावत किहिन ।
“मांदी भात सिरिफ भात नइहे ये तो हमर छत्तीसगढ़ के पहचान हवय । जऊन गांव मा ये रसम चालू हवे ओ गांव मा कभू लई-फइ, झगड़ा, अउ मन मुटाव कभु नइ होवय । काबर के मांदी के दिन सब्बो मन एकेच चूल्हा के आगी मा आपसी परेम ले पकाथे ।”
हीरा ये बात के धियान देवत रिहिस।
रज्जू महराज हा पूछिन फेर “हीरा का समझिस ते ?”
हीरा बोलीस - “ददा, मांदी भात तो गांव के मनखे मन ला एकजुट करथे । अउ आपस मा मया बांटथे ।”
महा ददा किहिन “ इहीच हा सोला आना बात हवय ।”
हीरा जब संझोती बेरा देवाला ले लहुटिस त ओखर मन मा एक नवा विचार चमकत रिहिस ।
“का मंहू हा कोनो दूसर गांव बर मांदी भात के आयोजन कर सकत हंव ?”
ओखरे मन मा यहू एक भावना रिहिस के गांव के लइका मन बर एक छोटी लाइब्रेरी बनाय जाय जेखर ले जम्मो लिखा मन उंहे पढ़ई लइखई करही अउ मन हा घलो नेक काम करे बर रमही।
हीरा हा रात भर सोचत रिहिस। दूसर दिन रज्जू महराज ला घलो अपन मन के बात किहिस।
रज्जू महराज हांस परिन “अरे बेटा, ये तो गांव बर बड़े काम होही । जस के बात सोचत हस। मंय तोर संग मा हावंव ।”
हीरा के खुशी के ठिकाना नइ रहिस ।
हीरा कल्लू, सोनू, बहादुर अऊ दुलारु ला संग मा बोलाइस ।
हीरा किहिस - “चलव भइया मन, गांव मा किताब ला बांटबो। हमन एक छोटे लाइब्रेरी बनाबो । जइसे मांदी भात ला जम्मो लोगन मन बराबरी ले बांटथे वइसने किताब हा घलो लोगन मन मा गियान बांटही ।”
लइका मन खुश।
दुलारु किहिस “अरे, ये तो बने के बात हवय! हमन देवाला तीर मा लकड़ी के छानी बना सकथन ।”
सोनू बोलिस - “ मोरो तिर प्रेरक किताब हाबे लाहूं ।”
कल्लू बोलिस - “ मंय बेंच-टेबल बनाय बर ददा ला बताहूं ।”
दू महिना के भीतरी देवाला तीर एक छोटे लाइब्रेरी तइयार होगे । ओखरे नांव धरे “मांदी ज्ञानालय ।”
गांव के बड़े-बड़े मनखे मन खुशी ले देवाला मा गमछा ओढ़ाइस ।
बरसात पूरा होइस । खेत मा हरियाली बछरु जइसे मुसकावत सोनपुर गांव के लइका मन मांदी ज्ञानालय मा रोज जावत रिहिन । कोनो कहानी पढ़थे, कोनो कविता लिखथे, त कोनो पहेली सुनावत हे।
हीरा हा ददा ला किहिस— “ददा, मांदी भात के दिन मोला ये बात समझ आइस के दुनिया मा बने काम करे ले देह नइ लोगन मन काम आथे ।”
रज्जू महराज ओखर पीठ मा हाथ थपथपाइस । “ हां बेटा, मन मा मया अऊ धरती मा बिसवास होही त मनखे हर काज ला कर सकथे ।”
हीरा आसमान डहर देखिस। बादर मन झन-झन परत रिहिन, फेर ओखर मन मा एक नवा चमक , सियान के गोठ, सुकून के बात अऊ अपन गांव बनाय के सपना ।
हीरा हा कहि दीन -
“जय हो मोर देश के भुंइया ,
जय हो मोर सोन चिरैया
जय हो मोर गांव के मांदी भात!”
समय धीरे-धीरे अपन कदम बढ़ावत रिहिस पर सोनपुर के गांव वाला मन बर मांदी भात अब सिरिफ भात नइहे, गांव के एकता, संस्कृति, परंपरा अऊ गियान के नया अध्याय बनगे।
- डुमन लाल ध्रुव
मुजगहन, धमतरी (छ.ग.)
पिन - 493773
मोबाइल - 9424210208
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