किसानी मा कोठार, झाला अउ अंगेठा के सांस्कृतिक महत्व
हमर छत्तीसगढ़ प्रदेश हा चारो मूड़ा ले हरियर-हरियर जंगल-झाड़ी अउ डोंगरी-पहाड़ी ले घिरे भू-भाग आय। ये धरती के गरभ मा करिया सोन्ना अउ लोहा के अनसम्हार भंडार भरे हवय। इहाँ के भोला-भाला रहवासी मनखे-मन बर खेती-किसानी के काम हा बड़ पुण्य के काम आय। काबर कि इही किसान-मन के उपजारे अन्न हा सरी दुनिया के भूख मिटाय के काम करथे। सही कहिबे ते जेन मन हा मनखे-मनखे ला जिंदा रखे बर भोजन के प्रबंध करे के सामर्थ रखथे, उही किसान मन हा भगवान ले कम घलव नोहे। गाँव-गँवई मा मनखे-मन के खेती-किसानी ले गहरा नाता हवय। समय-समय मा सबो काम-बूता के थीर-भाव ले जोखा-व्यवस्था करे बर किसान भाई-मन सदा साव-चेत रहिथें। समय मा बोनी, बियासी, निंदई, लुवाई अउ मिंजाई के संघर्ष यात्रा मा उनकर जाँगर-टोर कमई अउ पसीना ओगरई ह ककरो ले छुपे तो नइहे।
किसानी शब्द ला सुनते सात खेती-खार , पानी-बादर, मुहीं-पार, किसान-बनिहार, बैला-भैंसा के दृश्य हा आँखी के आगू मा झूल जाथे। यानि कि खातू-कचरा ले लेके हँसिया-डोरी, करपा-कोबी, सूर-भारा, रवन-रस्ता, पैर-पैरावट, खरही, कून, रास-दाब, काठा-खंडी, चूरी-पाटा, मोखला काटा, सूपा-चरिहा, झाला-अंगेठा, उलानबांटी अउ हूम-धूप जइसन कतको शब्द-मन ले भेंट-मुलाकात करत किसानी के काम ला सीध करना पड़थे।
किसान भाई-मन जमीन के कद के मुताबिक धान के बोनी करे बर पारंगत होथें। जिहाँ तक बोवाई के बात हे ता इहाँ जमीन के कद( गुणवत्ता) देख-देख के लगभग तीन किसम के धान के बोनी करे के परम्परा हवय। भाठा-टिकरा मा हरहूना, टंगहा मा अरधना अउ गद डोली मा माई धान..।
1) भाठा-टीकरा- अइसन जमीन मा पानी हा जादा समय तक नइ ठहरे अउ लघियाँत अटा जथे। येमा हरहुना धान के बोनी करे जाथे।
2) टंगहा डोली- जिहाँ पानी हा भाठा-भुइँया ले जादा दिन तक माढ़े रहिथे। अइसन जमीन मा अर्धना धान के बोनी करे जाथे। अउ ओन्हारी के रूप मा अरसी ला घलव उतेरे जाथे।
3) गद डोली- ये डोली-मन मा पानी हा लंबा समय तक नइ सूखाय। तेकर सेती येमा माई धान के बोनी करे जाथे। ओन्हारी मा लाख-लाखड़ी के पैदावारी कर लेथें।
धान के छोड़ भर्री-भाठा मा किसान-मन कोदो-कुटकी, मड़िया-उरीद, तीली, राहेर जुँवारी अउ गजामूंग के खेती करथें।
हम सब जानथन कि मनखे समाज हा जिहाँ अपन जाँगर ला थिराय अउ हिताय के जतन करथें उही हा उनकर बर आवास (घर) बन जथे। ठीक वइसनेच धान के फसल सही ओन्हारी-सियारी वाले जम्मों फसल के लुवाई के बाद मिंजाई के काम-बूता ला सीध करे के ठीहा हा कोठार-ब्यारा कहलाथे। किसान भाई-मन के किसानी के गोठ-बात करई हा समुंदर के पानी ला ठोम्हा मा नपई बरोबर बूता तो घलव आय। बात हा चलतेच हे ता चलो आज सियारी वाले धान के गोठ-बात चलाय के उदीम करथन।खेती किसानी मा बाँवत-बियासी अउ निंदई-गुड़ई के पाछू जब खेत-खार मा धान के सोनहा फसल हा लहस-लहस के झुमरन लगथे। तब किसान-मन ला कुँआर-कातिक महीना मा धान के थेभा लगाय बर कोठार के सुध करनाच पड़थे।
ओन्हारी-सियारी के जम्मों फसल ला मींजे-कूटे के ठउँर के नाम आय कोठार।कोठार हा खेत बरोबर समतल जगा आय, येला गाँव-गली के तीर मा सुभित्ता के हिसाब ले बनाय जाथे। कोठार बनाय के सुरक्षित जगा के उपयोग बरसात मा साग-भाजी नइते हरुना धान बोंय बर घलव करे जाथे। कातिक महीना मा उही जगा के हरुना धान ला लुवा के नइते बखरी ला उजार के जम्मों नरई-जरई अउ बन-बांगड़ ला छोल-चाँच के साफ करे जाथे।फेर पानी ला दरप-दरप के भुइँया ला नरम करत खुरदई मताय जाथे नइते बेलन चलाय के उदीम होथे।खुरदई अउ बेलनई बूता हा उबड़-खाबड़ भुइँया ला बरोबर (समतल) करे के एक ठन उपाय आय। येकर बाद घलव भुइँया मा खोधरा-डीपरा बच जाय रहिथे तब सनाय माटी मा सबे खोधरा ला छाब के अउ बरंड के कोठार ला बरोबर करे के बूता कर लेथें। अउ आखिर मा निरवा गोबर-पानी मा लिपाई ले किसानी बूता बर कोठार हा तैयार हो जाथे।
एक ठन डोली के धान हा लुवा जथे तहान किसान हा लुवाय धान ला कोठार मा अमराय के चिभिक करथे। जब धान लुवई के काम हा एकदम मात जथे तब एक जुआर लुवई अउ दूसर जुआर डोहरई के काम ला करना पड़थे। तेकर पाछू धान लुवई के हाड़ाटोर कमई के बूता हा बढ़ोना मा जाके सीध हो पाथे। सबले पहिली लुवाय धान के करपा ला कोबी मा सकेल-सकेल के भारा बाँध लिए जाथे। फेर दू-दी ठीं भारा ला सूर के आजू-बाजू मा गोभ-गोभ के कोठार मा डोहार के सकेले जाथे। भारा ला जल्दी ले जल्दी डोहारे बर गाड़ा नइते टेक्टर ट्राली के उपयोग होथे। जम्मों सकलाय भारा जे कोठार मा जतर-कतर परे रहिथे ,उनला एक जगा सकेल के खरही रचे के काम करना पड़थे। भारा ला कोठार तक अमराय बर किसान अउ बनिहार सब्बो-झन मिलजुल के काम करथें। देखब मा आथे कि धान लुवई अउ डोहरई के काम हा बनिहारिन ( माईलोगन) मन ला जादा उसरथें। भारा बँधई अउ खरही रचई के काम हा थोकिन ताकत वाले काम आय तेकर सेती ये कड़क बूता ला बनिहार ( बबालोगन) मन हँसी-खुशी ले कर लेथें।दिन भर भराही (भारा डोहरई) के बूता उरके के पाछू साँझकुन जम्मों बनिहार मन खरही रचे बर तैयार रहिथें।
दौड़-दौड़ के कोठार मा भारा डोहारत बनिहारिन मन पानी पीयत थोकिन सुस्ता लेथे, एक-दूसर ले दू-टप्पा बोल-बता लेथें। साँझकुन खरही रचे के पहिली किसान-बनिहार-मन एक जगा बैठ के चहा-पानी अउ चोंगी-माखुर पीयत थोकिन सुसता लेथें। तेकर पाछू नवा उर्जा के संग खरही ला सिघियाय बर भीड़ जथें। लुवई अउ भराही ये दूनो काम हा संघरा चलत रहिथे।धान लुवई के आखिरी दिन हा बढ़ोना के दिन होथे। उही दिन जम्मों किसान-बनिहार- बनिहारिन मन बढ़ोना के नेंग करत लुवई बूता के समापन करथें। सही कहिबे ता ये बढ़ोना हा धान लुवईया-मन डहर ले किसान ला आशीर्वाद सरूप देय जाने वाला प्रतीकात्मक बधाई और शुभकामना संदेश आय। कि अइसने हर साल लुवई के मौका मिलत रहय अउ किसान के कोठी-डोली हा सोनहा धान ले छलकत रहय। ये बेरा मा किसान हा घलव खुशी मनावत सबला मुर्रा नइते झाँझी फरा अउ लड्डू-जलेबी असन मिठई परोस के सबके प्रति आभार प्रकट करथे।
बीजहा धान के जोरा करई हा घलव किसान बर बड़े जान बूता आय। येकर चेत करत किसान भाई-मन कोठार मा बीजहा के अलग नानमुन खरही रच लेथें। कातिक महीना ले शुरू होय लुवई-टोरई हा अगहन महीना तक चलत रहिथे। इही बीच मा किसानी के सुविधा ला देखत किसान-मन गाँव-बनई के काम ला सिरजा डारथें। तहाँ किसान-मन खरही ला फोर के मिंजाई करे बर स्वतंत्र हो जथें। अब मिंजाई के काम कोठार मा होय के सेती धान-पान के रखवारी करे बर कोठार मा झाला नामक अस्थाई घर बनाय जाथे। जिहाँ रातकुन सूतके कोठार-बियारा के रखवाली करे जाथे। आज ले उही तीस-चालीस साल पहिली खेत मा धान के उपज बहुत कम होवय,गाँव-गँवई मा गरीबी-भूखमरी के हालात रहय। तेकर सेती कुछ मन हा झिमझाम देखत कोठार के धान-पान ला चोरा डरँय, इहाँ तक कि खेत के खड़े फसल ला सुल्हर के नइते लू-लुवा के चोरा डरें। खेत-खार के बँधाय भारा ला रातोंरात चोरा डरँय।तेकर सेती कोठार ला का कहिबे खेत-खार के मेंड़-पार मा झाला बनाके फसल के रखवाली करना पड़ जावय।
दौरी फाँदे बर कोठार के बीचो बीच मा मेड़वार ( सब्बल/ खंभा) गड़ाय जाय। ओकर गोल भाँवर पैर छींच के बैला मन ला फाँदे जाय। दौरी फाँदे के बेर ये खयाल रखना पड़थे कि सजोर बैला हा मेड़वार तीर मा रहय।काबर कि उही ला जादा तान पड़थे।मेड़िया( मेड़वार तीर के बैला ) ला लेके पखरिया ( आखरी के बैला) तक सबो बैला मन ला कासड़ा डोरी मा फाँदके मिंजाई बूता शुरू हो जाथे।सनद रहे कि कोठार बनाय के बेर मेड़वार के चारो मूड़ा अइसने बैला रेंगई के बूता ला खुरदई मताना घलव कहे जाथे ।दौरी फाँदे बर बहुत अकन बैला के जरवत पड़े।जे किसान के पास एके ठन बैला जोड़ी रहय ओला दौरी फाँदे बर दूसर किसान भाई मन ले सहयोग लेके काम ला सीध करना पड़े।
ओन्हारी फसल के मिंजाई के कुछ अलगे कहानी हवय।जइसे कि लाख-लाखड़ी के मिंजाई बूता ला भरे मँझनिया कुन घामे-घाम मा करना पड़े। तेकर सेती किसान मन सीधा गौठान( खैरखाडाड़) ले बैला-मन ला लान के दौरी फाँदे के बूता करँय। येमा किसान हा बैला के गोसान ला बिना पूछे गौठान ले बैला लाके अपन मिंजाई बूता ला घलव सीध कर डरे। कतको भैंसा बैर रहितिस तभो ले एक किसान हा दूसर किसान ला कभू नइ कहय कि मोला बिना पूछे मोर मवेशी ला लान के तँय काबर दौरी फाँदे। अइसन समरसता के भाव हा भला अउ कहाँ देखे बर मिलथे। तेकरे सेती कहना पड़थे कि गाँव-गँवई मा ये दौरी बूता हा सामूहिकता अउ समरसता के जीयत-जागत उदाहरण आय।
मिंजाई करे बर पहिली दौंरी फाँदे जाय।फेर बेलन के दौर आइस, बेलन के पाछू गाड़ा मा मींजे के काम होय।धान मिंजाई के पैर मा नान्हे लइका मन बेलन के पीछू मा उलांनबाटी खेलय। बेलन के पाछू मा उंडत-उंडत लइका-मन खेल के मजा लेवँय अउ अनजाने मा ही सहीं कसरत के कमी ला पूरा कर डरें।
बहुत साल पहिली गरीबी-भूखमरी जइसन अभाव के समय मा सूते-बसे बर ओढ़ना-दसना के कमी रहय । तेकर सेती हाड़ाटोर ठंडा ले बाचे बर घरोघर गोरसी मा आगी-अंगरा के ताप ले तन ला गरम करे के जतन करे जाय। ठँउका उही समय अगहन-पूस के ठंडा महिना मा मिंजाई शुरू होवय तब कोठार मा सुभित्ता जगा देखके तापे बर अंगेठा सिमचाय के उदीम हर हाल मा करनाच पड़े। अंगेठा बारे बर राचर के तीर-तखार के जगा ला जादा फभित माने जाय।
ठंडा ले बाचे बर मिंजइया-मन बीच-बीच मा अपन हाथ-गोड़ ला सेंकय। पैर कोड़ियाय के बेरा मा एकाद कनि सुसतावत आगी तापे के अलगेच मजा रहय। रस्ता रेंगइया मन घलव आगी तापे के लालच मा उही कन बैठ जावय। तहान घर-परिवार अउ देश-दुनिया के गोठ-बात के दौर चल निकले। काकर मिंजाई कतिक बाचे हे, एकड़ पाछू कतिक धान उतरत हे । कते खेत के कबार कैसे रहिस, ए साल भाँवर चक मा कतिक भारा निकलिस। कते डोली मा, के गाड़ा गोबर खातू कुढ़ोय रहिन। कीरा-काटा बर का-का दवई छिंचना पड़िस। समय-समय मा पानी मिलिस ते टोटकोर्रो होइस। पाछू साल के हिसाब मा ए साल धान के कूत के का हाल-चाल हे। अइसन गोठबात ले कोठार के वातावरण हा गमकत रहय।
मिंजई घरी पहातीच ले बेलन फँदा जाथे। बैला-भैसा ला हकालत मिंजइया-मन के मुख ले निसरित लोकगीत के बानगी हा सोवा परे गाँव ला जगाय बर टाॅनिक कस काम करथे। खेती-किसानी मा लुआई-मिंजाई के काम हा श्रम साध्य बूता तो आय। जाँगर टोर कमई ले थके-चूरे काया ला आराम के जरवत तो पड़बे करथे। अइसन काम-कमई के दिन मा रात हा लम्बा अउ दिन हा छोटे होथे। मने रगड़ के हाड़ाटोर काम-कमई के बाद आराम करे बर भरपूर समय घलव मिल जथे। तब तो इही कहे जा सकथे कि प्रकृति के लीला हा अपरंपार हे।
पहातीच ले बेलन-गाड़ा मा फँदाय बैला-मन ला ओहो-तोतो हकाले के आवाज हा गाँव-गली मा गूँजत रहिथे। इही ओहो-तोतो के अवाज हा घर-द्वार के काम करइया माईलोगिन मन ला जगाय-उठाय के काम करथे। फेर परछी-दुवार ला बहारे-बटोरे के काम शुरू हो जाथे।पनिहारिन-मन पानी भरे बर अउ रउताइन मन गोबर-कचरा के बूता मा चिभक जाथें। रद्दा रेंगत नता मा भउजी मन बेलबेलावत अपन देवर बाबू ला ताना मारना शुरू कर देथें-" कइसे देवर बाबू, के कोड़ियान होगे हवय ,घुघुवा बरोबर जागत बेलन फाँदे हस, जादा हाय-हाय झन कर, सुसता ले सुंदरू बाबू सुसता ले।"अतिक ला सुनके देवर बाबू हा जवाबी हमला करे बर थोरको सुस्ती नइ करे। " तुम्हर सापर कमई के मारे हमला बनिहार नइ मिलत हे , देवर बर अतिक चिंता-फिकर हवय ते आज पैर निकाले बर आ जबे भउजी।"
अइसने बोली-वचन ला सुनके क्षितिज मा लुकाय सुरूज नरायण हा घलव ऑंखी नटेरत अपन रंगरूप ला गली-खोर अउ कोठार-बयारा मा बगरा देथे।
गाँव-गँवई मा मनखे-मन कोठार के खरही के आकार-प्रकार ला देखके किसान के रासियत के ऑंकलन करत रहिथें। आखिर मा उनकर ऑंकलन हा पैरावट के आयतन ला नापत-जोखत थिरा पाथे।नाती-नतरा ला खेलावत सियान-बबा-मन आगी तापे बर कोठार मा धमक देथें। येमन अंगेठा के गोल-भाँवर बैठके दिन-दुनिया के गोठ-बात मा रम जथें। काकर बेटी-बेटा के सगाई-बिहाव कब अउ कहाँ माड़े हे। कते किसान के कतिक कर्जा हे। आज काकर झरती कोठार हे अउ काकर घर छट्ठी-बरही के नेवता हवय।
लुदलुद-लुदलुद काँपत नाऊ ठाकुर हा उही कर आगी तापत अवइया-जवइया-मन ला हूँत करा-करा के उनकर साँवर बनाय बर भीड़ जावय।अउ चुटुर-चुटुर गोठियावत घरोघर के करम-कहानी के वाचिक लेखा-जोखा प्रस्तुत करे मा सुस्ती नइ करे।नोई ला अपन नरी मा अरोके राउत हा जब लुहुंग-लुहुंग दँउड़त दूध दूहे बर निकलथे।तब वहू हा आगी-अंगेठा ला देख के कोठार मा जाके अपन हाथ-पाँव ला सेंक लेथे। अउ कान मा खोंचाय बीड़ी ला सिमचावत अपन सुराँट ला सुड़क्का मार के ठंडा ले बाचे के जतन कर लेथे।अइसनेच गोठ-बात ला सुनत-समझत अउ अनुभव करत एती कोठार के झाला हा छत्तीसगढ़ी कृषि संस्कृति के हर रूप ला अपन अंतस मा समोखत रहिथे।
रातकुन झाला मा सुते-सुते कोठार के रखवाली करई हा घलव बड़े जन बूता आय।पैरा के बिछावन उपर चद्दर बिछा के कमरा (कंबल) ओढ़ के सूते के अलगे मजा रहय। अउ बिहनिया ले ठुनठुन-ठुनठुन करत हाथ-गोड़ ला सेके बर अंगेठा के ऑंच ला सेंकइयाच-मन हा समझ सकथे। ठउँका ओतकी बेर भाप निकलत कहूँ ताते-तात चाहा मिल जाय तब तो अहहा..का पूछना हे। अठबज्जी अंगाकर अउ पताल चटनी के मितानी हा जम्हड़ा के कठिन परीक्षा घलव ले लेवय। झाला के आगू मा बैठके सिलपट्टी चटनी मा अंगाकर ला बोर-बोर के चुर्रूस-चुर्रूस खाय के मजा ला तो दाँते वाला हा बता सकथे।
मिंजत-मिंजत दू-तीन कोड़ियान के पाछू जब पैर के सबो दाना झर जाथे। तब आखिर मा वो सब्बो पैरा ला निकाल के पैरावट मा गाँज दिये जाथे।पैर निकाले के पाछू कुटऊर ( छोटे पैरा अउ धान के दाना के साँझर-मिंझर भाग) ला अलग डहर सकेल लिए जाथे। फेर दाब ला एक जगा सकेलत कुन बनाके ओसाय के काम करना पड़थे।कुटऊर अउ दाब के धान ला ओसाय मा पेरौसी (भूसा) हा उड़ाके अलग हो जाथे। अउ धान के सबो पोठ दाना उही कर माड़ जाथे। जेला एक जगा सकेल के अलग रख लेथें , इही हा रास कहलाथे। सही कहिबे ता इही रास के खातिर किसान-मन जाँगर-टोर मेहनत करथें।
काम के सहूलियत ला देखके कभू-कभू दाब के उपरे मा एक घाँव अउ पैर छिंचके मिंजाई करे के उदीम होथे। सही कहिबे ता इही रास अउ दाब के रखवाली करे बर झाला के महत्तम हे।
अपन काम-कमई के फल ला जब किसान हा अपन कोठार मा रास के ढेरी ( ढेर ) के रूप मा देखथे। तब उनकर तन-मन मा अनसम्हार खुशी के संग श्रद्धा के भाव भर जथे। ये रास हा किसान बर भगवान बरोबर पूजनीय हे। तेकर सेती येकर मान-गौन करे बर तरा-तरा के साज-सिंगार घलव करथे। कलारी ले सुग्घर ढंग ले किसम-किसम के आकृति बनावत "रास" ला गोंदा फूल ले सजा लेथे। किसान भाई-मन ग्रामीण संस्कृति के मुताबिक इही "रास" मा बोईर काटा अउ करिया चूरी पाटा चढ़ाथे।मने चूरी पाटा चढ़ा के मातृत्व सत्ता बर प्रतिकात्मक सम्मान के भाव समर्पित घलव करथें। कुछ क्षेत्र मा अलग-अलग नेंग-परम्परा प्रचलित हवय। जइसन कि आखरी पैर के मिंजाई करत कलारी मा पाँच जगा ले पैर ला निकाल के डोरी बर लेथें। फेर बैला के बुगई खन के (बाल नोचना) बरे डोरी मा फँसा के "रास" उपर मढ़ा दे जाथे।गोबर के लोंदी बना के ओला "रास" मा पूजा करे बर रख दिए जाथे। आखरी कोठार के दिन बैला-भैसा अउ धान फसल के प्रति मान सम्मान अउ आभार प्रकट करे बर किसान भाई-मन ला ये सब जतन करना पड़थे। ओकर बाद रास के धान ला कोठी मा ले जाय के पहिली किसान हा ओला नाप-जोख के देख लेना चाहथे। ओकर महिनत हा पाछू साल ले आगर हे ते खंगे हे।
किसान भाई मन रास के धान ला नापत-नापत बीस काठा धान मने एक खाड़ी (खंडी) बर एक मूठा धान ला बगल मा मढ़ा देथे। गिनती हा भुलाय झन कहिके बीस काठा बर एक ठन चिनहा रखे के परम्परा हे जेला "सरा" कहे जाथे। "रास " के सबो धान नपाय के बाद "सरा" के गिनती करे ले ये पता लग जथे कि धान के उपज कतका होय हे।धान ला चरिहा मा जोर के डोहारे के पहिली घर के मुँहाटी मा बहिनी-महतारी-मन पानी ओरछथे। फेर फूल-पान चघाके दीया बाती ले आरती उतारत अन्न के स्वागत करे जाथे। तेकर पाछू चरिहा के धान ला कोठी मा डाले के काम होथे। धान ला खेत ले कोठार तक अउ कोठार ले कोठी तक अमराय के ये श्रम साध्य यात्रा हा किसान के जिनगी के महत्वपूर्ण कड़ी आय।
मिंजई के झरती पैर मने आखरी कोठार के तैयारी..।कोड़ियाई ,पैर निकलई के बाद कोटेलत कुटऊर ला अलग अउ दाब ला अलग सकेल के कुन बनाय जाथे। फेर कुटऊर अउ कुन ला पंखा मा ओसा के माई खाँधा, पीला खाँधा अउ "रास" के ढेरी बना लेथें। इहाँ पीला अउ माई खाँधा ले मतलब कटकरहा अउ बोदराहा धान ले हे। जेला बाद मा फून-निमार के पोठ धान ला अलग कर लेथें। तेकर बाद "रास" मा हूम-धूप, दीया-बाती जला के अउ नरियर-चीला चढ़ा के पूजा-पष्ट करे जाथे। फेर ओला नाप-नाप के डोहारे के बूता होथें। जब "रास" के सबो धान हा कोठी मा समा जाथे। तब किसान भाई-मन के अंतस मा अपार खुशी के लहर दौड़ जथे।
किसान डहर ले जम्मों मिंजइया बनिहार-भूतिहार मन के सत्कार करे बर तेल-तेलई के प्रबंध करे जाथे। घर मा तस्मई, सोंहारी, बरा,भजिया जइसन छत्तीसगढ़ी पकवान बनथे। अड़ोस-पड़ोस के घर मा झरती कोठार के सेती तस्मई-सोंहारी भेज के खुशियाली मनाय जाथे।तहान किसान हा अपन घर मा सबो बनिहार-मन संग पँगत मा बैठके जेवन-पानी के आनंद उठाथें। आखिर मा रोटी-पीठा ला जोर के बनिहार मन के सम्मान सहित बिदाई घलव करे जाथे। छत्तीसगढ़ मा आखरी कोठार के ये समृद्ध परम्परा हा समरसता,भाईचारा अउ सामूहिकता के सबले बड़का उदाहरण आय। कोठार मा सिमचत अंगेठा के ऑंच मा जम्मों आगी के तपइया मन किसानी संस्कृति के हिस्सा आय।किसान-बनिहार संग सूपा,चरिहा, टुकनी, बाहरी, काठा, कटेला, कलारी, बेलन-गाड़ा, पंखा सबके सहभागिता बर कोठार हा नतमस्तक हो जथे। किसान भाई-मन सबके प्रति माथ नवा-नवा के आभार प्रकट करथें। खरही के सिरजई अउ मिंजई के उरकई (आखरी कोठार) तक किसानी के एक-एक ठन काम-बूता अउ परम्परा ला कोठार हा अपन झाला मा समोख के रख लेथे।
धान के बाद कोदो, कुटकी,तीली, राहेर , लाख-लाखड़ी, अरसी, चना अउ गहूँ के फसल ला सीध करे मा ये कोठार हा सदा-सदा ले सहभागी बनथे। आजकल थ्रेसर अउ हार्वेस्टर जइसन मशीन के उपयोग होय ले ये नेंग-जोग अउ परम्परा हा कमतियावत जरूर हे। फेर गरब के साथ इतना जरूर कहि सकथन कि अइसन संस्कार छत्तीसगढ़ के छोड़ दूसर जगा खोजे मा काँहचो नइ मिले। सचमुच मा सरी नेंग-जोग अउ परम्परा हा हमर कृषि संस्कृति के आत्मा आय।
महेंद्र बघेल डोंगरगांव
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