" मुसवा"
हमर गांव के कोतवाल हर हांका पारत राहय,सुनो सुनो मुसवा ले सावधान रहू हो---!मे दंग रहिगेंव अइसन काय बात (गोठ)होगे जेन कोतवाल ल मुनादी करे ल पड़त हे। में पूछेंव कोतवाल ल काय होगे भईया? कोतवाल बताइस मुसवा करोड़ो के धान ल खागे।अऊ कहूं जगा हमला कर सकत हे।दवा ल गोला बारूद कस छोंड़त हे तीहां ले ऊंकर कुछू उद (कुछ नई होवत हे)नी जलत हे।जइसे अमर होके आय हे। हां एकात कनिक मन ल कुछ असर हो सकत हे।जइसे करमचारी मन निलंबन के पाछू बहाल हो जथे।
पहिली के सियान मन काहय मुसवा के खाय ले कोठी के धान नी सिराय।फेर करोड़ो के धान ल कईसे खाईस होही। हां हो सकत हे ये मार्डन मुसवा होही। इक्कीसवीं सदी के। न खाऊंगा न खाने दूंगा सुने रेहेन फेर कईसे खाईस होही ये गुने के बात आय।हो सकत हे मन के बात ल मुसवा मन सुने नई रिहिस होही।यहू बात हो सकत हे ये मन जमगरहा संरक्षण (विशेष कृपा) वाले बड़े मुसवा मन होही।वो तो भला करे भगवान ये बात सिरिफ हमन ह (जनता)जानत हन। नही ते सरकार ल पता चल जही ते गुरुजी मन के सामत आ जही। गुरुजी मन के पोटा घला कांपत होही कहीं उन मन ल मुसवा पकड़े,गिने बर झिन लगा दिही। एक तो कुकुर मनखे (sir)मन ले ले देके निपटे हे। सरकार ह एक बात के बड़ मजा उड़ाथे जनता दरवाहा, मास्टर मन चरवाहा।
सिरतोन कहिबे त मुसवा मन बड़ हुंसियार हो गेहे। पहिली कपड़ा लत्ता ल कुतरे अब बड़े बड़े डराम ल कुतर देथे।जईसे लाईट केमरा एक्सन। मुसवा अऊ बिलई के गोठ करबे त पक्ष अऊ विपक्ष कस लागथे। मुसवा हर कुटुर- कुटुर खाथे अऊ बिलई माऊ माऊ नरियाथे।बिलई नरियाथे तभे पता चलथे मुसवा कदे कर हे।अऊ नरियाही काबर नही ये हर ऊंकर जनम सिद्ध अधिकार आय।
करोड़ो के घोटाला म मिले हे बेल,
चंदवा हर लगावत हे
चंपा के तेल।
कहिथे पहिली तेल निकाले के कला तेली मनकर राहय।अब ये कला सरकार के पेटेंट हो गेहे। चाहे सरकार कखरो राहय जनता के तेल निकना तय हे।
फेर सब बात के एक बात इही आय जब मुसवा भारी भरकम लम्बोदर ल उठा सकत हे त करोड़ो के धान ल घलो खा सकत हे।नानकून लड्डू के भोग लगाय ले जिनगी नी पहाय। नही ते बीता भर पेट बर मनखे मन अतिक हाय -हाय काबर करतिस।
फकीर प्रसाद
साहू फक्कड़
सुरगी
No comments:
Post a Comment