(लघुकथा )
नवा साल
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सीमा--सीमा --बिट्टू --दरवाजा खोलव ना-- राकेश ह आवाज देइस।
अरे कोन अच बाबू अतेक रात के आवाज देवत हस। 11बजगे हे तइसे लागत हे। अगोर खोलत हँव काहत सियनहा रामसुख हा आके दरवाज खोल देइस त सामने म वोकर दमाँद ह खड़े राहय।
राकेश हा पाँव परिस, तहाँ ले दूनों झन आके परछी म बइठगें। अतका बेर म वोकर पत्नी सीमा जेन साल भर होगे मइके म बइठे हे,सास रामप्यारी अउ तीन साल के बेटा बिट्टू ह तको जाग के आगें।
रामसुख हा पूछिस--कइसे आये हच बाबू?
काली नवा साल ये बाबू जी। बिट्टू, सीमा अउ आप मन से मिले बर आये हँव--राकेश कहिच।
"का नवा साल --पाछू बछर इही दिन आय न जब पी खाके सीमा संग मारपीट करे रहे।"
"वोकर मोला बहुत पछतावा हे बाबू जी। वो दिन के बाद दारू ल छुये तक नइ अँव।मोला क्षमा कर देवव।"
"हम कोन होथन क्षमा करइया। क्षमा माँगना हे त सीमा सो क्षमा माँग"--रामसुख हा आँसू ढारत खड़े बेटी सीमा ल देखत कहिस।
अचानक राकेश ह उठिस अउ सीमा के पाँव ल धरके मोला क्षमा करदे-- अइसन गलती अब कभू नइ करौं काहत आँसू ढारे ल धरलिस।
मोर गोड़ ल छोड़व अइसन काबर करत हव।मोला पाप झन लगावव।
तुहीं मन तो लेगे बर एको पइत नइ आयेव। मैं तो चल दे रहितेंव।
घडी ह रात के 12बजे बताये ल धरलिच।बस्ती कोती नवा साल के स्वागत म फटाका फूटे ल धरलिच। खुशी धरे नवा साल आगे।
चोवा राम वर्मा 'बादल '
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