*छत्तीसगढ़ी लोक जीवन मा प्रचलित रीति-रिवाज*
लोक जीवन मा प्रचलित रीति-रिवाज ल जाने के पहिली लोक जीवन अउ रीति-रिवाज का आय? यहू समझे के बात हावय। हम अपन जिनगी मा लोक अउ परलोक दूनो के गोठ सुनथन। लोगन मन कहिथें कि ए लोक ला नइ, ते परलोक ल सुधार ले। कुछ संसो कर। कुछु बने काज कर ले। जन सेवा कर ले। कोनो कहिथें कि परलोक ल कोन देखे हे? सबे इहें हावय। ए लोक ले बाहिर अउ कोनो लोक नइ हे। सबो संग मया दुलार अउ भाईचारा ले रहना चाही। अपन ले कखरो अनहित झन होवय, ए सोचना चाही। कुछु होवय, ए कहि सकथन कि जिहाॅं हम साॅंस लेवत हन, उही हर लोक आय। लोक के जीवन हर लोक जीवन आय। छत्तीसगढ़ के लोक जीवन के अध्येयता डॉ पीसी लाल यादव जी कहिथें कि 'गाॅंव का जीवन ही लोक जीवन है।' ए संदर्भ मा हजारी प्रसाद द्विवेदी जी के कथन प्रासंगिक हवय। उन कहें हें - लोक शब्द का अर्थ जनपद या ग्राम्य नहीं है, बल्कि नगरों और गांवों में फैली हुई वह समस्त जनता है, जिसके व्यावहारिक ज्ञान का आधार पोथियाॅं नहीं हैं।
डॉ सत्येंद्र जी के मुताबिक लोक मनुष्य समाज का वह वर्ग है, जो आभिजात्य संस्कार शास्त्रीयता और पांडित्य की चेतना से पूर्ण और अहंकार से शून्य है जो एक परम्परा के प्रवाह में जीवित रहता है।
परम्परा कोनो भी प्रथा ल पीढ़ी दर पीढ़ी आगू बढ़ाना आय। प्रथा या रीति-रिवाज लोक व्यवहार मा अपनाय गे वो मान्यता हरे, जेन ल आस्था अउ विश्वास संग नवा पीढ़ी आत्मसात करथे। अपना लेथे। गाॅंव मा चार मनखे जुरयाइन कि लोक ले जुरे कतको गोठ अपने अपन निकले ला धर लेथे। जइसे लोक व्यवहार, मान्यता, परम्परा, रीति-रिवाज, संस्कार अउ संस्कृति के गोठ। लोक व्यवहार ल निभावत मनखे एक दूसर संग उठथें-बइठथें। संग उठत-बइठत मन मिलथे। मन मिले ले विचार हर मिले ला धर लेथे। धीरे ले विचार हर विश्वास के पाग धराके धारणा मा बदल जथे। लोक व्यवहार लोक मान्यता के बाना धर लेथे। इही लोक मान्यता प्रथा के रूप ले लेथे। अउ ए प्रथा ह आगू चलके परम्परा के नाॅंव ले जाने जाथे। जेन लोक म स्थापित होके लोक परम्परा अउ रीति-रिवाज कहलाथे।
हमर लोक जीवन मा प्रचलित अइसन कतको परम्परा हावॅंय। जेन ल लोक अउ लोक जीवन तइहा ले निभावत आवत हें। व्याहारिक ज्ञान ले ही लोक परम्परा आगू बढ़थे। जौन लोक व्यवहार ले लोक मा आय हवॅंय।
हमर लोक जीवन मा दिन के शुरुआत ले परम्परा के दर्शन करे जा सकत हे। बेरा अपन अंजोर बगराय नइ पाय राहय कि दाई-माई मन ओकर स्वागत मा घर दुआर अउ मुॅंहाटी ल बहार के गोबर मा लीप भुइॅंया मं पधारत सुरुज नरायण के स्वागत करथें। जउन सकल संसार ल अपन ऊर्जा ले जीवन देथे। ज्ञानी ध्यानी मनखे मन असनान करत सुरुज देवता ल जल के अर्ध्य देथें। जौन ह लोक के पालन-पोषण अउ रक्षण करथे, लोक उही ल देवता मानथे। लोक प्रकृति के पुजारी होथे। बहरई अउ गोबर ले लिपई स्वच्छता के प्रतीक घलाव आय। अउ एकरे सँग यहू बात सार्थक होथे कि-
ऊवत अँगना बटोरिए, बूड़त दियना देय।
जा घर सुग्घर लक्छमी, रामचंद पगु लेय।।
स्वच्छता के महत्तम आज कखरो ले नइ छिपे हे। गोबर मं प्रतिरोधक गुण पाय जाथे। इही बात आय कि शुद्धता के प्रतीक माने गे हे, अउ गोबर ले चूल्हा लीपे के बादेच भोजन पकाय जाथे। कतको मन पूजा अउ पबरित काज के बखत वो ठउर ल गोबर ले लिपथें।
छत्तीसगढ़ मं पहुना के स्वागत मं एक लोटा पानी दे के परम्परा हे। जेकर पाछू बड़ वैज्ञानिक महत्तम हावय। सुरता करन या फिर गुनान करन, जब मनखे तिर आज सहीं मोटर गाड़ी नइ रहिन। आवागमन के साधन नइ रेहे ले रेंगत आवॅंय-जावॅंय। रेंगे मा थके-मांदे लोगन ल पिए के पानी देके के पहिली हाथ-गोड़ धोए बर पानी दे जावय। कहूॅं पहुना के स्वागत मा एक लोटा पानी नइ निकलै, त वो घर-परिवार के लोगन ऊपर लोक व्यवहार ल नइ जाने कहिके के अंगरी उठथे। बड़ घमंडी हे कहिथे।
लोक प्रकृति ले जुरे रहि के जिनगी बसर करथे। प्रकृति के कोरा म कतकोन गीत मुखरित होथे। इही लोकगीत लोक जीवन ल नवा ऊर्जा अउ उछाह के मौका देथे। यहू कहि सकथन कि लोकगीत लोक जीवन बर संजीवनी बूटी आय।
लोक जीवन मा आने-आने संस्कार अउ परब के गीत गाए के परम्परा हावय। सोहर गीत ले लेके बिहाव गीत, भोजली, जस गीत, गौरा-गौरी के गीत हे। जौन गीत लोक के आय। गीत मन मा आनंद हे, बड़का बात ए हावय कि ए जम्मो गीत के गायन मा सामूहिकता के दर्शन होथे। एहर लोक मं व्याप्त सामाजिकता ल रेखांकित करथे।
छत्तीसगढ़ के लोक मं मितानी बदे के जुन्ना परम्परा दिखथे। जेन मं नता-रिश्ता के मोती हर दू परिवार ल मया के सुतरी म अइसे जोरथे कि माला गुंथा जथे। मितान बदइया मन के सॅंघरा, दूनो के परिजन मन एक-दूसर ल अपना लेथें। फूल दाई, फूल ददा के संग मितानी के अंगना मा जम्मो पारिवारिक रिश्ता पुष्ट होथे। एकरे सँग वो भावना ला आत्मसात करे जाथे। जेमा कहे गेय हे---
प्रीत करे तो अइसे करे जइसे सूँत कपास।
जीते जीयत तन ढँके, मरे न छोड़ें साथ।।
ए मितानी मा महापरसाद, गजामूंग, जंवारा, भोजली ल ले दे के दूबी अउ फूल कान मा खोंच के मितानी परम्परा के शुरुआत होथे। ए मा मितान बदे के बेरा ए नइ देखे जाए कि मनखे कोन जात के आय। कोन धरम ल मानथे। बस मन के तार जुरगे त मितानी होगे। ए मितानी राम अउ सुग्रीव, के मितानी ले प्रेरित हे माने जा सकत हे। एक-दूसर ल सीताराम मितान कहि मेल भेंट करथे। एक-दूसर के नाॅंव नइ ले जाय।
छत्तीसगढ़ के लोक बर माता पहुॅंचनी/ जुड़वास बड़का परब आय। ए परब ल गाॅंव भर के मनखे शीतला दाई के शरणागति होके मनाथें। ए तिहार चउमास घरी के शुरुआत रहिथे। तब गाॅंव-गाॅंव मा डाॅक्टर बैद नइ रहिस। दवा दारू उपलब्ध नइ रहिस। अइसन म प्रकृति पूजक लोक लीम तरी अपन मंगलकामना अउ सुख सनात के मनौती करिन होही। इही तरा ए जुड़वास तिहार के शुरुआत होइस होही लगथे। लोक के आस्था अउ विश्वास के मूल मा गाॅंव के सियार मा बिराजे लोक देवता, महमाई, शीतला, सॅंहड़ा देव हावय। लोक हर जब कभू कुछ नवा करथे ए मन ल भजथे। खेती के शुरुआत मा अक्ती के दिन परसा पान के दोना म बीजहा धान चढ़ाथे तेकर पाछू खेत म बउत के बोहनी करथे।
अन्न ले पेट भरथे। शरीर के रक्षण अउ पोषण दूनो होथे। इही बात आय कि दाई-माई मन हॅंड़िया के भात/जेवन परोसे के पहिली ओकर नमन करथें। दू दाना धरती दाई ल अर्पित करथें। चूरे पके पाछू चूल्हा म अग्नी देवता ल घलाव समर्पित कर आभार प्रकट कर परोसथें।
लोक जीवन मा कुँआर महीना मा पितर देवता मन के पूजा अउ मान गउन के परम्परा हावय। ए परम्परा पूर्वज मन ल सुरता करे के एक बहाना आय अउ उॅंकर सौंपे धन दोगानी बर उनकर उपकार प्रकट करे के दिन बादर आय। मौसम के ध्यान धरन त पाथन कि ए समय खेती मा अतेक काम-बुता नइ राहय कि किसानी बिगड़े। अउ कतकोन बात ए परम्परा म शामिल हावय। महापुरुष मन के जयंती अउ पुण्य तिथि के बहाना उन ल सुरता एकरे एक रूप माने जा सकत हे।
छत्तीसगढ़ धान के कटोरा कहाथे। कातिक अगहन के महीना मा किसान के उछाह देखब बनथे। बियारा म धान के रास बनाथे। फूल ले ओला सजाथे। अउ जब बियारा ले धान घर के डेरौठी मा आथे, त पानी ओरछ के बड़ श्रद्धा भाव संग ओकर स्वागत करथे। मान देथे। अइसन एकर सेती कि एकर ले जिनगी के जम्मो सपना पूरा होथे।
कोठी मं धान हे, त मन आन हे। कातिक महीना के आए ले किसान के घर सुख-सनात अउ समृद्धि के पाॅंव परथे। कोठी धान ले भरे रहिथे। बेटी माई अउ समधी-सजन अउ हितवा-मितवा मन संग मिले के नेंत धरथे। मंड़ई के जोखा मड़ाथे। गाॅंव के सियान मन सुमता सुलाव कर दिन तिथि तय करथें। मॅंड़ई कोनो जाति-समाज विशेष के नइ भलुक पूरा गाॅंव के होथे। लइका सियान अउ जवान सबो मं उछाह देखे जा सकत हे। ए अलग बात हावय कि बहुत अकन धार्मिक अउ सांस्कृतिक महत्तम के मेला देश अउ राज मं घलव होथे।
छत्तीसगढ़ी लोकजीवन मं भांचा के स्थान भगवान सहीं तारनहारी माने जाथे। पौराणिक कथा अउ छत्तीसगढ़ के लोक मान्यता मं राम रचे-बसे हे। राम अपन चरित्र ले जनमानस मं भगवान के रूप मं स्थापित हें। राम छत्तीसगढ़ के भांचा ए। इही पाय के छत्तीसगढ़िया समाज मं भांचा के पांव परे के रिवाज हे। चाहे भांचा उमर मं बड़े होय ते छोटे, वंदनीय हे। तारनहारी हे। अंतिम संस्कार मं घलाव भांचा मन ले पांव रखे के नेग कराय जाथे। दान-दक्षिणा देहे के चलन हे।
लोक के दायरा बड़ व्यापक हे, जे मया दुलार के पाग मं बंधाए मिलथे। लोक परम्परा या रीति-रिवाज मन मं समाय सामाजिकता, पांडित्य अउ अहंकार ल छोड़ एक सूत्र मं बंधे रेहे के संदेशा बगराथे। फेर मनुख हे कि अहंकार मं फॅंस अपन नवा ढंग ले जिये के प्रयास करथे। जिहाॅं सुख सनात अउ शांति बर दिन रात भटकत रहिथे। लोक जीवन मं समरसता, सद्भाव, भाईचारा अउ उदारता अइसे घुले मिले रहिथे के साग मं नून। बस जरूरत हे कि रीति-रिवाज ल सही ढंग ले भॅंजान अउ मानत हुए सामाजिक बने रहे के उदिम करन। अरस्तू के बताए मनखे बने राहन। हमर भीतर के मनखेपन जिंदा रहे।
०००
पोखन लाल जायसवाल
पलारी (पठारीडीह)
जिला बलौदाबाजार-भाटापारा ऊ
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