Monday, 5 January 2026

खुश रहना सीख*. ब्यंग (टेचरही)

 *खुश रहना सीख*.         

                           ब्यंग (टेचरही)


         बिरबल के चतुराई मा एक ठन किस्सा आथे। राजा हर एक ठन बीस हाथ के डोरी (रस्सी) ला देवत कथे कि बिरबल ये रस्सी ला बेच के लान, अउ पइसा सँग डोरी ला घलो लानबे। चतुर बिरबल गरीबहा अबादी वाले झुग्गी बस्ती मा चल दिस। अउ लाइन से सब के घर मा डोरी ला लमा लमा के चिनहा पारे। पूछे मा कहय कि तुँहर जगा बढ़े हे नजायज हे येला टोरे बर परही। ये राजा के हुकुम हे। जनता तो आखिर जनता। प्राथमिक उपचार करत हाथ पाँव जोड़िन कि हमर घर ला बचाले साहेब। नइ मानिस तब चाहा पानी खरचा पानी बर चढ़ौतरी के बंदोबस्त करके रस्सी के चिनहा ला घुँचवा डारिन। आखिर मा चाहा पानी के रकम रस्सी के दाम ले सौ गुना आगे। जेकर ले राजा खुश। एती जनता खुश कि घर टूटे ले बाँचगे। सिपहसलार मन अपन चतुराई ले खुश। डोरी लमइया सहयोगी मन के जेब गरम ओहू खुश। अब भितरौंधी रहस्य ले अनजान जनता ये दावा करत हे कि ये धरती मा महामूर्ख दिवस होबे नइ करे। जे हर ईँखर मुर्खता के बड़का सबूत आय।

           हमर राज के अवतरण मा छत्तीस साल ले जादा के समय लगिस। नारा स्वालंबी आत्मनिर्भर अउ विकसित राज के रिहिस। इही खासियत ला सच करे बर एक झन हर जोगी डबरी के पार मा मचान बाँधिस।  जेला चाँउर वाले बाबा मेड़ पार आउ डबरी सबो ला पटवा दिस। अउ गरीबी रेखा वाले अतका राश कार्ड छपवाइस कि अमीर मन घलो कापरेटी के चाँउर बर लाइन मा लगगे। राजा अमीर ला गरीब बनाए के खुशी मनाइस। एती अमीर मन कापरेटी के चाँउर खा के खुश। एक झन हर गेंड़ी मा चढ़के बाँटी भँवरा खेल खेल के चिल्लाइस कि नशा मुक्त राज बनाबो। फेर का हे नशा मा खुदे अतका झूमिस अउ जेकर नशा मा गरजिस ते सबो नशा उतरगे। गउ असन सिधवा सिकल के आइस। वोला एके झन के नशा ले झुमई देखे नइ गिस। वोकर सोच होगे कि जम्मो राज के जनता नशा मा झूमय। सबो झूमही तभे खुशहाली तिहार मनाबो अइसे सोचके सरकारी ठेका वाले दुकान के गिनती मा बढ़वार कर दिस। जनता बर मया के एकर ले बड़े सबूत अउ का हो सकथे। अब तो सबो जनता खुश, जब जनता खुश तौ सरकार खुश। इँकर दिन रात के मिहनत आखिर जनता के खुशी बर ही तो होथे। सही मा जे गरीब हे अतका अमीर होगे कि चाँउर के पइसा ला भट्ठी मा दान करके देश सेवा बर अपन योगदान के खुशी मनावत हें। वोती राजा जी मन जनता के कमजोर कान ला पकड़े के सफलता मा खुशी मनावत हे। अइसन मा राजा एक जनम के राजा नहीं जनमो जनम के आरक्षित राजा रही। लोकतंत्र मा महिमा मंडन करके कुरसी सुरक्षित करवाने वाला चारनदास किसम के मिडिया टी बी वाले डिबेट मा सच के घेंच काटे बर चापलूस कम्पनी के छूरी धरके बइठे दिखथें। सच ला सच माने बर तइयार नइ दिखे। हम तो यहू देखत हावन कि जेकर विरोध मा ज्वालामुखी फूटे रिहिस वोहू मन असानी ले सत्तासीन होके खुशी मनावत हे। मनाही काबर नहीं आखिर तंत्र ला कब्जा करे के मंत्र जानथे।

      मनखे ये सोच के खुश रिहिन कि मनखे दोगला हो सकथे मशीन नइ हो सके। फेर मशीन ला मनखे हर ही तो बनाए हे का ? ठोस गोठ हे कि तँय वोट डाले हावस ये सच हे। फेर भरम बने रथे कि जेकर बर वोट डाले वोकर तक पहुँचिस कि नही। मन मा भरम राखे दुखी झन मना। खुशी ये मना कि तँय लोकतंत्र के निर्माण मा गवाही बने हवस। आगू के जनम मा इही देश मा आदमी जनम लेबे तब तो ठीक नइते प्रजा के खुशहाली बर कतका तंत्र अपनाए जाथे नइ जान पाबे। संविधान अउ गीता मा हाथ रखके किरिया खा, गऊ के पूछी धरके कसम खा चाहे गंगा जल पसर मा धरके वचन ले, कि सारा जीवन देश अउ जनता के नाम हवन हे। कसम खराब नइ जावे। काबर कि पारटी हर देश होथे अउ पारटी के ही सदस्य जनता। अइसन मा दुख कते मनाही। जेन मन जेकर खुशी मा निभगे वो बिरबल के खिचड़ी ला बरफ मा सेंक के पका सकथे। अइसन भागमानी मन खुशी मनाए बर तिहार के घोषणा कर सकथें। ये तिहार ला मौका मा बोनस के तिहार कहव चाहे तिहार के बोनस जेला खुशी खुशी मनाए मा ही समझदारी हे। बोनस के तिहार मा जीएसटी के का होही एला मत सोच। वोकर बर कोनो न कोनों कोती ले राजा साहेब रसता निकाल लेथे। अउ जब चुकता दुनियां खुशी मनावत हे तब तुम्हला खुशी मनाए मा कते दुख रसता काटत हे। जादा दुखी हावस तौ सुख घलो कभू आही। जेकर खुशी मनाये के तइयारी आजे ले कर। मस्तुरिया जी के गाना हे--

आही सुख आही रे, पीरा परा जाही रे।

       मन तो धीरज धरले तोर। 

    राजा के छप्पर फाड़ देवल सुख मा खुशी नइ हस तौ खुशी खुशी ससुरार मा जाके लमसेना रहि जा, कहाँ कइसे खुश रेहे जाथे पता लग जाही। 

आसारे खलु संसारे, सारे सुखम ससुरारम्। 

इही कारन हे कि भगवान मन घलो परम सुख बर ससुरार मा एक झन हा हिमालय मा जाके बसगे एक झन हा क्षीरसागर मा। तब तुँहला लमसेना बने मा का दुख हे। अच्छा तो ये हे कि हर हाल मा खुश रहना सीखव। आफत के होवय चाहे आमद के, तिहार मना। रेल सड़क दुर्घटना बाढ़ भूकंप असन आफत मा घलो कमइया मन चार पइसा कमाए के अवसर निकाल लेथें। ये बात कोरोनि काल हर सिखाके गेय हे। तहूँ मन तिहार मनावव। जेकर ले राजा ला घलो लगे कि जेमन बनाके इहाँ तक भेजे हें, आखिर वोला मँय खुश रखे मा सफलता के तिहार मनवा सकवँ। मेरे प्यारे देशवासियों देवियों एवं सज्जनों, कम से कम अतका सम्मान भरे संबोधन मा तो खुश रहना सीखव। भले आगू के हाना जुमला ला झन सुन ओइसे भी आगू के गोठ तुँहर लाइक  रहय नहीं । तुँहर असन मन आफत मा अवसर नइ खोज सखव तो जेन मन अवसर के लाभ लेके नाचत हे उँकर भीड़ मा जा अउ खुशी मना। फेर हर हाल मा खुश रहना तो सीख। 


राजकुमार चौधरी "रौना" 

टेड़ेसरा राजनांदगांव।

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